दुनिया के सबसे रईस आदमी एलन मस्क इन दिनों तमतमाए हुए हैं. वजह है उनका सैटेलाइट इंटरनेट प्रोजेक्ट ‘स्टारलिंक’, जिसे वो भारत में रातों-रात शुरू करना चाहते हैं. मस्क चाहते हैं कि भारत सरकार उनके लिए लाल कालीन बिछाए, नियमों को ताक पर रख दे और उन्हें तुरंत स्पेक्ट्रम पकड़ा दे. जब भारत सरकार ने नियमों का हवाला देकर सुरक्षा जांच की बात कही, तो मस्क और उनके पैरोकारों को मिर्ची लग गई. अब वे भारत पर अनर्गल आरोप मढ़ रहे हैं. लेकिन उन्हें हुआवेई (Huawei) वाला इतिहास याद कर लेना चाहिए. करतूत ऐसी है कि चीन, अमेरिका तक ने उन पर बैन लगा रखा है.
तब बेचैन हो गए थे ट्रंप
याद कीजिए साल 2019 का वो वक्त. चीन की दिग्गज टेलीकॉम कंपनी हुआवेई दुनिया भर में अपना दबदबा बना रही थी. मोबाइल नेटवर्क से लेकर 5G तकनीक तक, हर जगह उसका डंका बज रहा था. लेकिन तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छूट रहे थे. ट्रंप प्रशासन को रात में सपने आते थे कि अगर अमेरिका के संचार नेटवर्क में हुआवेई के तार और उपकरण लग गए, तो चीनी सरकार अमेरिकियों की जासूसी करेगी. उनकी संवेदनशील जानकारी सीधे बीजिंग पहुंच जाएगी.
डर के मारे ट्रंप प्रशासन ने क्या किया?
मई 2019 में अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने हुआवेई को उठाकर अपनी एंटिटी लिस्ट यानी ब्लैकलिस्ट में डाल दिया. अमेरिकी कंपनियों को सख्त फरमान सुना दिया गया कि कोई भी हुआवेई को कोई तकनीक या पुर्जा नहीं बेचेगा. बात सिर्फ हुआवेई तक नहीं रुकी. एक और चीनी कंपनी ZTE की भी गर्दन नाप दी गई. अमेरिकी संघीय संचार आयोग (FCC) ने तो यहां तक कह दिया कि ये कंपनियां अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं. सरकारी पैसे से इनके उपकरण खरीदने पर बैन लगा दिया गया और जो उपकरण पहले से लगे थे, उन्हें भी उखाड़ फेंकने का आदेश दे दिया गया.
हुआवेई के अधिकारी चीखते रहे, जासूसी के आरोपों से इनकार करते रहे, लेकिन ट्रंप ने एक नहीं सुनी. क्यों? क्योंकि तर्क दिया गया कि कम्युनिकेशन नेटवर्क सिर्फ एक व्यापार नहीं है, यह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिकों के डेटा का मामला है.
तो भारत के लिए नियम अलग क्यों?
अब यही सवाल सीधे एलन मस्क से है. जब बात अमेरिका की आती है, तो किसी विदेशी कंपनी को नेटवर्क में घुसने से पहले आप सुरक्षा की 100 कसौटियों पर कसते हैं. उसे देश के लिए खतरा बताकर बैन कर देते हैं. लेकिन जब भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी और संप्रभुता की बात करता है, तो आप लोगों को दर्द क्यों होने लगता है?
स्टारलिंक और हुआवेई की तकनीक भले ही अलग हो. हुआवेई टावर और केबल के जरिए नेटवर्क बनाती है, जबकि मस्क का स्टारलिंक अंतरिक्ष से सीधे इंटरनेट धरती पर फेंकता है. लेकिन बुनियादी सवाल तो वही है ना! मस्क के हजारों सैटेलाइट भारत के आसमान में निचली कक्षा में मंडराएंगे. भारत के दूर-दराज के गांवों, सीमावर्ती इलाकों, सेना के ठिकानों के पास से डेटा गुजरेगा. ऐसे में डेटा की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? इंटरनेट ट्रैफिक किस रास्ते से जाएगा? अगर कल को कोई राष्ट्रीय संकट आता है, तो उस नेटवर्क पर कंट्रोल किसका होगा भारत सरकार का या अमेरिका में बैठे एलन मस्क का?
भारत कोई बनाना रिपब्लिक नहीं
एलन मस्क और उनके समर्थकों को यह भ्रम दिमाग से निकाल देना चाहिए कि भारत की नीतियां किसी विदेशी अरबपति के ट्वीट या अमेरिकी दबाव से तय होंगी. भारत सरकार के दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 9 अक्टूबर 2026 को बिल्कुल दो टूक शब्दों में कह दिया है कि स्टारलिंक हो या कोई और, किसी एक कंपनी को अलग नियमों के तहत कोई वीआईपी ट्रीटमेंट या छूट नहीं दी जाएगी. सबको निर्धारित सुरक्षा शर्तें पूरी करनी ही होंगी.
मस्क ने भारत में एंट्री में देरी को लेकर जो पक्षपात के बेतुके आरोप उछाले हैं, वो केवल उनकी हताशा दिखाते हैं. भारत का रुख एकदम साफ है: हमें तकनीक चाहिए. हमें दूर-दराज के इलाकों में इंटरनेट पहुंचाना है. सैटेलाइट इंटरनेट भारत के लिए बहुत उपयोगी है. लेकिन यह सब देश की सुरक्षा की कीमत पर नहीं होगा.