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Shahjahanpur Postal History: आज के समय में चिट्ठी भेजने के लिए डाकघर जाने की जरूरत कम ही पड़ती है, लेकिन एक दौर था जब दूर तक संदेश पहुंचाने के लिए ऊंटों और घोड़ों का सहारा लिया जाता था. शाहजहांपुर में भी डाक भेजने का यही पुराना तरीका था. यहां कचहरी के पास ऊंटों को रखने के लिए शुतुरखाना बनाया गया था और पुलिस थानों के सामने लाल डिब्बे लगाए जाते थे. बाद में तार सेवा शुरू हुई, जिससे जरूरी सूचनाएं भेजना आसान हुआ. इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के मुताबिक, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की संचार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए तार चौकियों को तोड़ दिया था.
शाहजहांपुर: विश्व डाक दिवस के मौके पर देशभर में डाक सेवाओं के योगदान को याद किया जा रहा है. शाहजहांपुर में भी डाक सेवाओं का अपना अनोखा इतिहास रहा है. कभी ऊंटों और घोड़ों के सहारे चिट्ठियां भेजी जाती थीं, तो कभी पुलिस थानों के सामने लाल डिब्बे लगाए जाते थे. समय के साथ डाक व्यवस्था में कई बदलाव आए और यह आम लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई. आज मोबाइल और इंटरनेट का दौर है, लेकिन सालों तक डाक और तार ही संदेश भेजने का सबसे भरोसेमंद जरिया हुआ करते थे.
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के अनुसार, भारत में आधुनिक डाक सेवा की शुरुआत 1852 में लॉर्ड डलहौजी के समय हुई थी. शाहजहांपुर में शुरुआती दौर में पुलिस ऊंटों के जरिए चिट्ठियां भिजवाती थी. इसके लिए वर्तमान कचहरी के पास ऊंटों को रखने की जगह यानी शुतुरखाना बनाया गया था. पुलिस स्टेशन के सामने संदेश डालने के लिए लाल डिब्बे भी लगाए जाते थे. उन्होंने बताया कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन की संचार व्यवस्था को ठप करने के लिए तार चौकियों को तोड़ दिया था. आज भले ही मोबाइल के दौर में इन सेवाओं का इस्तेमाल कम हो गया हो, लेकिन लंबे समय तक डाक और तार संचार के सबसे मजबूत माध्यम रहे हैं.
शेरशाह सूरी के समय भी थी डाक चौकियों की व्यवस्था
भारत में प्राचीन काल से ही संदेश पहुंचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जाते थे. शेरशाह सूरी के समय डाक चौकियों पर तेज दौड़ने वाले घोड़े तैयार रखे जाते थे, ताकि संदेश जल्द से जल्द पहुंचाए जा सकें. अंग्रेजों के शुरुआती दौर में स्थानीय जमींदारों को भी खास चिट्ठियां उनकी मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाती थी. शाहजहांपुर में कचहरी के पूर्वी हिस्से में ऊंटों का शुतुरखाना हुआ करता था. यहां से पुलिस ऊंटों के जरिए पत्रों को दूर-दराज के इलाकों तक भिजवाती थी.
खुदागंज से बीसलपुर चिट्ठी पहुंचने में लगता था लंबा रास्ता
शुरुआती दौर में शाहजहांपुर में डिस्ट्रिक्ट डाक सेवा काम करती थी. इसकी प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल थी. अगर किसी को पास के गांव खुदागंज से बीसलपुर चिट्ठी भेजनी होती थी, तो पत्र पहले शाहजहांपुर आता था. इसके बाद उसे बरेली और पीलीभीत के रास्ते बीसलपुर भेजा जाता था. बाद में इस व्यवस्था में सुधार किया गया और सभी डाक सेवाओं को मिलाकर केंद्रीय साम्राज्य डाक सेवा का रूप दिया गया. इससे पत्रों का आना-जाना पहले के मुकाबले आसान और तेज हो गया.
अंग्रेजों तक क्रांतिकारियों की पहुंचती थी खबर
शाहजहांपुर के कैंट क्षेत्र में स्थित मुख्य डाकघर का पुराना नाम हेडक्वार्टर ऑफ पोस्टल एंड टेलीग्राफ था. ब्रिटिश काल में फोन की सुविधा नहीं होने के कारण टेलीग्राम सूचनाएं भेजने का प्रमुख साधन था. अंग्रेज अफसर क्रांतिकारियों की गतिविधियों और उनके ठिकानों की जानकारी इसी केंद्र से कोलकाता भेजते थे. इसी वजह से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की तार चौकियों को तोड़कर नष्ट कर दिया था.
स्पीड पोस्ट ने बदली डाक सेवाओं की तस्वीर
समय के साथ डाक सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हुआ और स्पीड पोस्ट जैसी आधुनिक सुविधाएं शुरू की गईं. आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के कारण लोग टेलीग्राम जैसी सेवाओं को लगभग भूल चुके हैं. डाक विभाग की कई पुरानी सेवाएं भी अब सीमित हो गई हैं. इसके बावजूद करीब दो शताब्दियों तक डाक और तार सेवाओं ने लोगों को आपस में जोड़ने और देश के संचार तंत्र को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है.