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Play School vs Nursery Difference: ज्यादातर बच्चों की स्कूली शिक्षा प्ले स्कूल या नर्सरी से होती है. लेकिन क्या आप प्ले स्कूल और नर्सरी के बीच अंतर जानते हैं? बच्चे का एडमिशन करवाने से पहले समझिए किस उम्र में कहां मिलेगा दाखिला, ये डे-केयर से कैसे अलग हैं और स्कूल चुनते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
Play School vs Nursery Difference: बच्चे की स्कूल एजुकेशन प्ले स्कूल या नर्सरी से शुरू होती है
नई दिल्ली (Play School vs Nursery). बच्चे की उम्र 2.5-3 साल होते ही माता-पिता को उसके एडमिशन की चिंता सताने लगती है. स्कूली शिक्षा की शुरुआत आमतौर पर प्ले स्कूल से होती है. कुछ पेरेंट्स सीधे नर्सरी में एडमिशन दिला देते हैं. इसके साथ ही डे-केयर का ऑप्शन भी दिमाग में रहता है. पेरेंट्स के लिए फैसला ले पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता. हर जगह बच्चों की अर्ली लर्निंग को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं. सही जानकारी न होने की वजह से बच्चे को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है.
प्ले स्कूल, नर्सरी और डेकेयर में क्या अंतर है?
प्ले स्कूल, नर्सरी और डेकेयर, तीनों ही संस्थानों का काम बच्चों की देखभाल करना है. लेकिन उनके उद्देश्य बिल्कुल अलग हैं:
- प्ले स्कूल: यह जगह बच्चों के सोशल और इमोशनल डेवलपमेंट के लिए होती है. आमतौर पर यहां बैग या किताबों की जरूरत नहीं होती. बच्चे पेंटिंग, मिट्टी के खिलौने, म्यूजिक और ग्रुप एक्टिविटीज के जरिए शेयर करना और घुलना-मिलना सीखते हैं.
- नर्सरी: यह फॉर्मल स्कूलिंग का पहला कदम है. यहां बच्चों को तय रूटीन, अनुशासन और बुनियादी पढ़ाई (जैसे अक्षरों की पहचान और फोनेटिक्स) से रूबरू कराया जाता है.
- डेकेयर: यह एकदम सेफ स्पेस है. वर्किंग पेरेंट्स ऑफिस के घंटों के दौरान अपने बच्चों को यहां छोड़ देते हैं. यहां बच्चे सोते हैं, खाना खाते हैं और खेलते हैं. यह मुख्य रूप से केयरगिविंग सेंटर होता है.
बच्चे का एडमिशन किस उम्र में और कहां करवाएं?
अगर आप बच्चे के एडमिशन को लेकर कंफ्यूज्ड हैं तो जानिए किस उम्र में बच्चे का दाखिला कहां करवाना चाहिए:
- उम्र का हिसाब: आमतौर पर 1.5 से 2.5 साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जाता है, जबकि 3 साल की उम्र पार करते ही उन्हें नर्सरी में दाखिला दिलाया जाता है.
- एडमिशन क्यों जरूरी है: न्यूक्लियर परिवारों में बच्चे अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं. प्ले स्कूल या नर्सरी में जाने से बच्चे की ‘सेपरेशन एंग्जायटी’ (माता-पिता से दूर होने का डर) दूर होती है, वे बोलना जल्दी सीखते हैं और अपनी बात दूसरों के सामने रखना सीख जाते हैं.
स्कूल चुनते समय किन बातों का खास ख्याल रखें?
अपने नन्हे बच्चे को पहली बार घर से बाहर अकेले किसी भी स्कूल में भेजने से पहले इन 4 बातों की गहराई से जांच जरूर करें:
- सिक्योरिटी और हाइजीन: स्कूल का स्टाफ ट्रेन्ड होना चाहिए, वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हों और माहौल बिल्कुल चाइल्ड-फ्रेंडली हो.
- टीचर-स्टूडेंट रेशियो: एक टीचर के जिम्मे बहुत सारे बच्चे नहीं होने चाहिए. हर बच्चे पर पर्सनल ध्यान मिलना जरूरी है.
- सीखने का तरीका: पढ़ाई का भारी बस्ता या प्रेशर न हो, बल्कि एक्टिविटी-बेस्ड लर्निंग पर फोकस हो.
- दूरी: स्कूल घर से बहुत दूर न हो, वरना छोटा बच्चा रास्ते में ही थक जाएगा.