Baba Neem Karauli : ‘जब बच्चों की आत्माओं ने खाया भंडारा’, जानिए कैसे कब्रिस्तान को तीर्थ बना गए बाबा नीम करौली? 

Baba Neem Karauli : ‘जब बच्चों की आत्माओं ने खाया भंडारा’, जानिए कैसे कब्रिस्तान को तीर्थ बना गए बाबा नीम करौली? 


हल्द्वानी. बाबा नीब करौली महाराज को एक चमत्कारिक और अलौकिक शक्तियों वाला संत माना जाता है. लोग उन्हें राम भक्त हनुमान के अवतार के रूप में भी देखते हैं, लेकिन बाबा की चमत्कार की कहानियां ऐसे ही नहीं बनीं. दावा किया जाता है कि असल में लोगों ने उनके चमत्कारों के साक्षात महसूस किया. कहते हैं कि बाबा ने अपने चरण जहां-जहां रखें उन जगहों का कायाकल्प हो गया. इन्हीं जगहों में शामिल है नैनीताल के करीब पड़ने वाला मनोरा पर्वत. मान्यता है कि इस पर्वत पर जब से बाबा के चरण पड़े इस पहाड़ी पर अक्सर होने वाला भूस्खलन हमेशा के लिए रुक गया. इस पहाड़ी से जुड़ा एक भयंकर डर भी धीरे-धीरे लोगों के मन से गायब हो गया. बड़ा सवाल ये है कि आखिर वो कौन सा डर था, जिसे बाबा ने मनोरा पहाड़ी को हनुमानगढ़ में तब्दील कर दूर किया.

कब रखी नींव
नैनीताल के हनुमानगढ़ मंदिर की स्थापना बाबा नीम करौली महाराज ने 1950 के दशक की शुरुआत में की थी. बाबा ने यहां सबसे पहले एक छोटी हनुमान प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा 15 जुलाई 1952 को कराई. इसके बाद 16 जून 1953 को यहां हनुमान जी की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई. स्थानीय लोग बताते हैं कि इस स्थान पर पहले बच्चों का कब्रिस्तान था, जहां संक्रामक बीमारियों से मृत बच्चों को जमीन में गाढ़ देते थे. कब्रिस्तान होने की वजह से स्थानीय लोग इस घने जंगल वाले इलाके में रात को छोड़िए, दिन के समय भी जाने से डरते थे. इस जगह के बारे में सोचकर ही लोग डर जाते थे. बाबा ने इसी जगह को हनुमान जी के मंदिर और अपने आश्रम के रूप में विकसित किया. आज लाखों श्रद्धालु हर साल आते हैं.

इसी जगह को क्यों चुना
बाबा नीब करौली महाराज जब कुमाऊं पर्वतीय इलाकों में आए तो मनोरा पीक यानी मनोरा पर्वत की प्राकृतिक खूबसूतती ने उन्हें आकर्षित किया. मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत की ‘उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास’ नाम की किताब में इस बात का जिक्र मिलता है कि बाबा नीब करौरी ने 16 जून 1953 को एक हनुमान मंदिर की स्थापना की. यह मंदिर नैनीताल से लगा हुआ है और नैनीताल हल्द्वानी मोटर मार्ग पर हनुमान गढ़ के रूप में प्रसिद्ध है. भगवान शिव और राम सभा के मंदिर वहां बाद में जोड़े गए.

भयंकर भूस्खलन, बन गया घना जंगल
प्रो. अजय रावत के मुताबिक नैनीताल में अंग्रेजों की बसावट के समय तीन क्षेत्र प्रमुख रूप से हुआ करते थे. दुर्गापुर, अमृतपुर और कृष्णापुर. अमृतपुर को इलाका है जहां आज हनुमागढ़ी से लेकर ऑब्जरबैट्री कैंपस है, लेकिन अंग्रेजों के दौर इस इलाके में भयंकर भूस्खलन हुआ था. जहां बाद में बेहद घना जंगल बन गया. यहां जंगली जानवरों की आवाजाही भी बढ़ गई. उस दौर से गंभीर, संक्रामक रोगों से मरने वाले छोटे-छोटे बच्चों को दफनाने का भी सिलसिला शुरू हो गया. ऐसे में इस घने जंगल को लोग संशय या डर की दृष्टि से देखने लगे. 16 जून 1953 को बाबा द्वारा यहां हनुमान मंदिर की स्थापना के बाद से ही इस इलाके की दशा और दिशा दोनों बदल गई. हालांकि बाद में बाबा का ज्यादा समय भूमियाधार, कैंची और काकड़ीघाट में ही बीता.

सामान लेकर आ गया ट्रक
प्रो. अजय रावत अपनी किताब में स्थानीय निवासी और बाबा के अनन्य भक्त भुवन बिष्ट के हवाले से हनुमानगढ़ी में स्थापित हनुमान जी की मूर्ति के पीछे घटी एक घटना भी बताते हैं. वे लिखते हैं, ‘मंदिर प्रतिष्ठा समारोह के सम्पन्न होने पर भंडारे के आयोजन का कार्यक्रम होना था, लेकिन इसकी कोई तैयारी नहीं की गई थी. जब केवल दो दिन रह गए, नैनीताल में अतिवृष्टि के कारण सभी सड़कें बंद हो गईं. ऐसी विषम परिस्थिति में धसकते मलबे और खिसकती चट्टानों की स्थिति में मंदिर धार के शीर्ष पर स्थित था. यह असंभव था कि सूखा राशन और सब्जियां वहां पहुंचाई जा सकें. अचानक वर्षा रुकी और बाबा जी ने आयोजकों से कहा कि नीचे जाओ. धार (पहाड़ी) के नीचे जहां एक ट्रक खड़ा है. कार्यकर्त्ता असमंजस से खड़े रहे. फिर अनमने भाव से जब वे नीचे पहुंचे तो पाया कि जैसा बाबा जी का आदेश हुआ था, उन्होंने सूखे राशन, सब्जियों और घी आदि से भरा हुआ ट्रक वहां खड़ा देखा. वहां सहायक भी थे. वे लोग आश्चर्यचकित और हतप्रभ रह गए. सारा सामान भक्तों और सहायकों की पीठ पर रखा गया. वह रास्ता इतना दुर्गम था कि लोग रेंगते हुए उस फिसलन भरे रास्ते से आगे बढ़े. जैसे ही राशन मंदिर परिसर में पहुंचा कि वर्षा फिर शुरू हो गई.’

पानी से बनाया घी
भुवन बिष्ट आगे कहते हैं, ‘प्रतिष्ठापन के पवित्र समारोह में प्रसाद लेने बड़ी संख्या में भक्तजन पहुंचे थे. थोड़ी देर बाद भोजन का मुख्य माध्यम घी समाप्त होने को आ गया और भक्तगणों की भीड़ लगातार स्थल की ओर उमड़ती जा रही थी. भंडारे के इंतजाम में लगे लोग घबरा गए और बाबा नीब करौली महाराज के पास उन्हें घी की कमी के बारे में बताने गए. बाबा ने सहायकों से कुछ कनस्तर पानी के भरकर लाने के लिए कहा और अपनी तर्जनी उंगुली से उन्हें छू दिया. पानी घी में बदल गया, उसी से भोजन बना और पूड़ियां तली गईं.’

अब किसी को डरने की जरूरत नहीं
बाबा पर गहन शोध करने वाले रिसर्चर और डॉक्यूमेंट्री मेकर कुणाल माधव मिश्रा कहते हैं कि उन्होंने एक मुलाकात के दौरान बाबा के बेहद करीबी गुरुदत्त शर्मा से हनुमानगढ़ के बारे में पूछा था. गुरुदत्त शर्मा ने बताया था कि स्थानीय लोग मानते थे कि ये जंगल बेहद डरावना है. यहां बच्चों के रोने और चीखने की आवाजें आती हैं. गुरुदत्त शर्मा ने कुणाल माधव मिश्रा को उस भंडारे का आंखों देखा हाल बताया था, जो बाबा ने हनुमानगढ़ में हनुमान जी के मंदिर स्थापना के समय किया था. गुरुदत्त शर्मा ने बताया था कि इस भंडारे में अचानक से हजारों बच्चे भंडारे का प्रसाद लेने पहुंच गए थे. भंडारे के प्रबंधन में लगे लोग ये देख हैरान रह गए कि आखिर इतने बच्चे कहां से आए गए. बाबा हल्के से मुस्कुराए और उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि इस जगह मौजूद बच्चों की सारी आत्माएं मुक्त हो गईं. सारे बच्चों ने हनुमानजी का प्रसाद ग्रहण कर लिया, अब किसी को डरने की जरूरत नहीं.



Source link