पटना में लगी ऐसी ‘घड़ी’, जो हर डेढ़ सेकंड में बताती है भारत और बिहार की कितनी है आबादी, ऐसे करती है काम

पटना में लगी ऐसी ‘घड़ी’, जो हर डेढ़ सेकंड में बताती है भारत और बिहार की कितनी है आबादी, ऐसे करती है काम


पटना. आपने घड़ी में घंटे, मिनट और सेकंड बदलते तो खूब देखे होंगे, लेकिन पटना में एक ऐसी डिजिटल घड़ी लगी है, जिस पर समय नहीं, बल्कि भारत और बिहार की बदलती आबादी दिखाई देती है. इस पॉपुलेशन क्लॉक में हर कुछ पल में आंकड़ा बदलता नजर आता है. इसे देखकर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पटना में बैठकर पूरे भारत और बिहार की आबादी का हिसाब कैसे लगाया जा रहा है? क्या देशभर में होने वाले जन्म और मृत्यु का आंकड़ा इसी घड़ी तक पहुंचता है?

दरअसल, इसके पीछे एक खास सॉफ्टवेयर और जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों की गणना काम करती है. सबसे पहले आपको यह बता दें कि पटना में यह पॉपुलेशन क्लॉक, पटना साइंस कॉलेज के सांख्यिकी विभाग में लगी है. इसी डिपार्टमेंट के अंदर पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर की भी स्थापना हुई है, जो बिहार, झारखंड और बंगाल की जनसंख्या पर नजर रखती है.

सॉफ्टवेयर के जरिए चलता है आबादी का हिसाब
पीआरसी यानी पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर की रिसर्च इन्वेस्टिगेटर डॉ. खुशबू बताती हैं कि इस पॉपुलेशन क्लॉक को 2024 में स्थापित किया गया था. इसमें एक विशेष सॉफ्टवेयर लगाया गया है. यह सॉफ्टवेयर जन्म दर और मृत्यु दर से जुड़े वार्षिक आंकड़ों के आधार पर आबादी में होने वाले बदलाव की गणना करता है.

यानी यह घड़ी देशभर में किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु की सूचना उसी वक्त हासिल करके संख्या नहीं बदलती, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों से हर दिन और प्रति सेकंड आबादी में होने वाले अनुमानित बदलाव की गणना करती है. इसी के आधार पर स्क्रीन पर आबादी का आंकड़ा लगातार बदलता रहता है.

हर डेढ़ सेकंड पर बदलता है आंकड़ा
पीआरसी के डायरेक्टर और सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अमित कुमार ने बताया कि इस डिजिटल बोर्ड के ऊपरी हिस्से में भारत की आबादी, जबकि नीचे बिहार की आबादी दिखाई जाती है. हालांकि, आजकल बिहार की आबादी वाले सेक्शन में कुछ तकनीकी गड़बड़ी आ गई है. इसीलिए वह शो नहीं हो रहा है. इसकी सूचना दे दी गई है. इसमें हर डेढ़ सेकंड में एक संख्या बढ़ती है.

सिर्फ संख्या देखने की चीज नहीं, नीति बनाने में भी उपयोगी
पॉपुलेशन क्लॉक पर बदलती संख्या महज लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए नहीं है. पीआरसी के रिसर्च इन्वेस्टिगेटर डॉ. शालेंदु सौरव बताते हैं कि जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल पॉलिसी मेकिंग, संसाधनों की योजना और जनसांख्यिकीय लाभांश जैसे विषयों में किया जाता है. किसी क्षेत्र में कितनी आबादी है और वह किस तरह बदल रही है, इसका सीधा संबंध वहां उपलब्ध संसाधनों की जरूरत से है. आबादी के हिसाब से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आवास समेत कई क्षेत्रों में योजनाएं तैयार करने में जनसांख्यिकीय आंकड़ों की भूमिका होती है.

बिहार-झारखंड में पहली पॉपुलेशन क्लॉक, पीआरसी है बड़े काम की
यहां मौजूद पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित नहीं है. यहां स्वास्थ्य और सामाजिक विषयों से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर भी शोध किया जाता है. रिसर्च इन्वेस्टिगेटर डॉ. जितेंद्र ने बताया कि वर्तमान में टीबी, जबकि इससे पहले एचआईवी, किडनी और स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे विषयों पर भी आंकड़े जुटाकर शोध कार्य किए गए हैं.

उन्होंने आगे बताया कि पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर की शुरुआत मूल रूप से जनसांख्यिकीय शोध से जुड़े कार्यों के लिए हुई थी, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर पब्लिक हेल्थ, जनसांख्यिकी और सामाजिक विज्ञान से जुड़े विषयों तक किया गया है.

तीन राज्यों पर रहता है रिसर्च का फोकस
पटना में स्थापित पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर का काम केवल बिहार तक सीमित नहीं है. इसका कार्यक्षेत्र बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक फैला है. इन राज्यों में स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों और सरकारी योजनाओं से संबंधित समस्याओं पर शोध किया जाता है. इसके लिए मौजूदा स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान कर प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं. प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद उनके आधार पर वार्षिक कार्ययोजना तैयार करके शोध किया जाता है.

पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर दूसरे संस्थानों के साथ शोध परियोजनाओं पर काम करने के लिए भी तैयार है. विशेषज्ञों के अनुसार, स्वास्थ्य, जनसंख्या और जनसांख्यिकी से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, स्वास्थ्य संस्थानों तथा फंडिंग एजेंसियों के साथ सहयोग किया जा सकता है.



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