नई दिल्ली. शादियों का माहौल हो, घर का आंगन हो या सोशल मीडिया रील्स की दुनिया. एक अवधी लोकगीत अकसर हर किसी के होठों पर आ जाता है, बोल हैं ‘सइयां मिले लड़कइया, मैं का करूं…’. जब ‘लोकगीतों की मल्लिका’ मालिनी अवस्थी अपने चुलबुले अंदाज में ढोलक की थाप पर इसे गाती हैं तो पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट और ठहाकों से गूंज उठता है. लेकिन इस चुलबुलेपन, नाच-गाने और हंसी-ठिठोली के पीछे भारत के इतिहास का एक ऐसा काला पन्ना छिपा है, जिसे सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जिस गाने पर लोग झूम-झूमकर नाचते हैं, वह दरअसल एक मासूम दुल्हन की बेबसी, उसकी झुंझलाहट और ‘बाल विवाह’ का दर्द है.
यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारत के ग्रामीण इतिहास में रची-बसी ‘बाल विवाह’ की कड़वी सच्चाई का एक जीता-जागता दस्तावेज है. यह गीत मालिनी अवस्थी की बनाई हुई रचना नहीं, बल्कि लोक परंपरा से आया गीत है, जिसे उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं लंबे समय से गाती रही हैं.
लोकगीतों की ये है खासियत
पुराने दौर में महिलाएं खुलकर अपना अकेलापन या दर्द नहीं कह सकती थीं. ऐसे में हमारी लोक-संस्कृति ने महिलाओं को ‘गीतों’ का एक ऐसा माध्यम दिया, जिसके जरिए वे हास्य-व्यंग्य के लिफाफे में बंद करके अपना सबसे गहरा दर्द भी समाज के सामने रख देती थीं. जिस बात को सीधे कहना मुश्किल होता था, उसे गीत और हास्य के जरिए कह दिया जाता था. ‘सइयां मिले लड़कइया’ में भी यही अंदाज दिखाई देता है. महिला अपने पति की कम उम्र और समझदार न होने को लेकर शिकायत करती है. लेकिन इसके पीछे सवाल सिर्फ एक महिला के वैवाहिक जीवन का नहीं है. यह उस सामाजिक व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें लड़कियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती थी.
गीत के बोल और छिपा हुआ गहरा अर्थ
‘बारह बरस की मैं ब्याह के आई, सइयां उड़ावे कनकइया, मैं क्या करूं ‘ गीत के इस लाइन के साथ दुल्हन बताती है कि जब 12 साल की उम्र में उसकी शादी हुई, तो उसका पति इतना छोटा था और नासमझ था कि वह पत्नी पर ध्यान देने के बजाय पतंग उड़ाने में बिजी था. ‘पंद्रह बरस की मैं गौने पे आई, सइयां छुड़ावे मोसे बैया, मैं क्या करूं’ जब 15 साल की उम्र में उसका ‘गौना’ यानी दुल्हन का पति के घर जाना हुआ और प्यार की उम्मीद से आई थी, लेकिन पति की नादानी तो देखों हाथ पकड़ने के बजाय वो तो हाथ झटक रहा है. ‘सोलह बरस मोरी बाली उमरिया, अरे सइयां पुकारे मैया-मैया, मैं क्या करूं’ जब वह 16 साल की नवयौवना बन जाती है, तब भी पति अपनी पत्नी के पास आने या प्रेम जताने के बजाय डरकर अपनी ‘मां-मां’ चिल्लाने लगता है. इसलिए वो दुल्हन अपनी सखी से पूछती है ‘सइयां मिले लड़कइया, मैं का करूं?’ मुझे तो छोटे बच्चे जैसा पति मिल गया है, अब मैं अपनी जिंदगी का क्या करूं?
मालिनी अवस्थी ने राष्ट्रीय मंचों पर दी पहचान
पूर्वांचल और अवध के ग्रामीण अंचलों तक सीमित इस गीत को आधुनिक पीढ़ी और बड़े सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचाने का बड़ा श्रेय गायिका मालिनी अवस्थी को जाता है. उन्होंने कोका-कोला स्टूडियो, आईडिया जलसाऔर अपने कई लाइव कॉन्सर्ट में इस अवधी गीत को पेश किया. मालिनी अवस्थी जब इस गीत को गाती हैं, तो वे इसके साथ जुड़ी लोक-परंपरा और व्यंग्य को जीवंत कर देती हैं. हालांकि, वे खुद मानती हैं कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं होते, वे हमारे समाज के पुराने रीति-रिवाजों, संघर्षों और महिलाओं के दबे हुए अहसासों का आईना होते हैं.