चित्रकूट के मानिकपुर में है शबरी आश्रम, जहां आदिवासी समाज की है गहरी आस्था, राम के साथ जुड़ी हैं कई कथाएं, जानें

चित्रकूट के मानिकपुर में है शबरी आश्रम, जहां आदिवासी समाज की है गहरी आस्था, राम के साथ जुड़ी हैं कई कथाएं, जानें


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Chitrakoot News: जब भगवान राम चित्रकूट आए थे तब उनका प्रेम आदिवासियों के प्रति भी काफी बढ़ गया था. और माता शबरी भगवान श्रीराम की परम भक्त थीं. वह लंबे समय तक श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करती रहीं. जब भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ उनके आश्रम पहुंचे, तो शबरी उनको देखकर खुश हो गई. लेकिन प्रभु श्री राम को खिलाने के लिए उसके पास कोई भी चीज नहीं थी. तभी सबरी ने प्रभु श्री राम को को बेर खिलाए थे.

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चित्रकूटः धर्मनगरी चित्रकूट को भगवान श्रीराम की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है.मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अपने वनवास का साढ़े ग्यारह वर्ष का समय चित्रकूट में बिताया था, यहां के जंगल, पहाड़ और धार्मिक स्थल रामायण की कई कथाओं से जुड़े हैं. इन्हीं कथाओं में माता शबरी और भगवान श्रीराम के बेर खाने का प्रसंग भी बेहद खास माना जाता है.

प्रेम से खिलाए बेर भक्ति देखकर भावुक हुए भगवान

मान्यता के अनुसार जब प्रभु श्री राम चित्रकूट आए थे तब उनका प्रेम आदिवासियों के प्रति भी काफी बढ़ गया था. और माता शबरी भगवान श्रीराम की परम भक्त थीं. वह लंबे समय तक श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करती रहीं. जब भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ उनके आश्रम पहुंचे, तो शबरी उनको देखकर खुश हो गई. लेकिन प्रभु श्री राम को खिलाने के लिए उसके पास कोई भी चीज नहीं थी. तभी सबरी ने प्रभु श्री राम को को बेर खिलाए थे. वह प्रत्येक बेर को चखकर देखती थीं कि कहीं वह खट्टा तो नहीं है और फिर मीठा बेर भगवान को देती थीं, इसे जूठा बेर कहा जाता है.भगवान श्रीराम ने शबरी के भक्ति प्रेम को देखते हुए बेर भी खाए थे. तबसे आदिवासियों को प्रभु श्री राम का वंशज भी कहा जाता है.

आदिवासियों की जुड़ी है सबरी आश्रम से आस्था

वही इस संबंध में आदिवासी समाज से आने वाले राजन कोल ने लोकल 18 को जानकारी में बताया कि शबरी भगवान श्री राम की बहुत बड़ी भक्त थी. और वह काफी समय तक तप की थी. इसके पीछे की कहानी यह है कि जब शबरी की शादी होनी थी. उस समय प्रचलन था कि जानवरों की बलि दी जाती थी. शबरी को यह अच्छा नहीं लगा. इसलिए वह वनवास को पहुंच गई थी. जब वह वनवास काल में पहुंची तब वह भगवान श्री राम की आराधना करती रही. और लगातार उसने पूरा समय भगवान श्री राम की तप पर बिताया था. पाठा क्षेत्र में जो सबरी आश्रम बना है उसकी भी आस्था आदिवासियों से जुड़ी है. वहां लोग उनकी पूजा अर्चना करते है.सबरी और श्री राम के प्रति आज भी आदिवासी समाज में प्रेम है. आज भी आदिवासी समाज के लोग शबरी के नाम से जाने जाते हैं.

मतंग ऋषि सबरी को बता के गए थे कि राम आएंगे

वही सबरी आश्रम के पुजारी अच्छे लाल ने लोकल 18 को जानकारी में बताया कि शबरी मां मृतंग ऋषि की शिष्या थी. उन्होंने शबरी को कहा था कि मैं तो नहीं रहूंगा लेकिन आप प्रभु श्री राम का जाप करती रहना.आपको श्री राम के दर्शन जरूर होंगे. उसी के तहत हमारे चित्रकूट के मानिकपुर में शबरी नाम से आश्रम बना हुआ है, जिसमें प्रभु श्री राम,लक्ष्मण और शबरी की प्रतिमा मौजूद है. उनका कहना है कि आज भी बड़ी श्रद्धा के साथ आदिवासी समाज हो या अन्य समाज उनके दर्शन पूजन के लिए आते हैं. पहले इस आश्रम में आदिवासी और प्रभु श्री राम का दरबार होता था.



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