युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि युद्ध का परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस जमीन पर खड़े हैं और वहां के भूगोल के लिए कितना तैयार हैं. पाकिस्तान ने दुनिया भर के ताने झेलने के बाद आखिरकार सऊदी अरब में अपने सेना तैनात कर दी है. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने दावा किया है कि एयरस्ट्राइक भी शुरू कर दी गई हैं. अभी भले ही उनकी बातों से कॉन्फिडेंस टपक रहा हो लेकिन यमन के हूती लड़ाकों से सामने होते ही पाकिस्तान की सेना को रिएलिटी चेक मिलेगा. ये सीधी जंग उन्हें इतिहास के सबसे भयावह सैन्य दलदल में धकेल देगी.
पाकिस्तानी सेना को नरक दिखाएंगे हूती लड़ाके
यमन और सऊदी अरब के बॉर्डर इलाकों का आड़ा-टेढ़ा भूगोल और जानलेवा मौसम पाकिस्तानी सैनिकों के लिए एक ऐसा नरक तैयार कर रहा है, जहां हूती विद्रोही उन्हें चुन-चुनकर निशाना बनाएंगे. ये पूरा मंजर पाकिस्तानी सेना को 1971 के उस काले इतिहास की याद दिला देगा, जब राजस्थान के थार रेगिस्तान में भारत के हाथों उन्हें अपनी सबसे शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी.
लोंगेवाला का सबक: जब रेगिस्तान बना था पाकिस्तानी सेना का कब्रिस्तान
इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तानी सेना अपने परिचित माहौल से बाहर निकलकर किसी अनजान और बेरहम इलाके में उतरी है, उसे भारी तबाही का सामना करना पड़ा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में राजस्थान के जैसलमेर में लड़ा गया लोंगेवाला का युद्ध है.
- 120 वीरों के सामने 2,000 सैनिक और 45 टैंक: 4 दिसंबर 1971 की रात पाकिस्तान की 51 इन्फैंट्री ब्रिगेड और 38 कैवोलरी रेजीमेंट के 2,000 से अधिक सैनिकों और 45 चीनी टाइप-59 टैंकों ने लोंगेवाला पोस्ट पर हमला बोला था. सामने 23 पंजाब रेजीमेंट के महज 120 भारतीय सैनिक मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की अगुवाई में डटे थे.
- टेरेन और रेत का शिकंजा: पाकिस्तानी जनरलों ने सोचा था कि थार का खुला रेगिस्तान टैंकों के लिए आसान रास्ता है, लेकिन वो रेत के टेरेन को समझने में नाकाम रहे. भारी-भरकम पाकिस्तानी टैंक और गाड़ियां बारीक रेत में धंस गए. संकरे रास्तों ने उनकी रफ्तार रोक दी.
- 200 से ज्यादा मौतें और 40 टैंक स्वाहा: रात भर भारतीय सैनिकों ने अपनी पोजिशन संभाले रखी और सुबह होते ही भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर विमानों ने उड़ान भरकर फंसी हुई पाकिस्तानी बख्तरबंद टुकड़ी को तहस-नहस कर दिया. उस जंग में पाकिस्तान के 200 से अधिक सैनिक मारे गए और लगभग 40 टैंक व 100 से ज्यादा गाड़ियां तबाही के मलबे में तब्दील हो गईं. पूरे 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 8,000 से 9,000 सैनिक मारे गए थे और 93,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था.
पाकिस्तानी सैन्य जनरलों की यही ओवरकॉन्फिडेंस और भूगोल को न समझ पाने की नादानी अब यमन के पहाड़ों और रेगिस्तान में दोहराई जाने वाली है.
यमन का खौफनाक टेरेन: हूतियों का अभेद्य किला, पाकिस्तानियों के लिए जानलेवा दलदल
यमन का भूगोल दुनिया के सबसे खतरनाक और मुश्किल युद्ध क्षेत्रों में से एक है. यहां का टेरेन ट्रेडिशनल सेनाओं के लिए एक काल चक्र की तरह काम करता है.
- नुकीले पहाड़ और गहरी गुफाएं: यमन के उत्तरी क्षेत्र सादा और सीमावर्ती इलाके नुकीली, खड़ी चट्टानों और संकरी घाटियों से भरे हैं. यहां न तो भारी टैंक जा सकते हैं और न ही बख्तरबंद गाड़ियां काम करती हैं. हूती विद्रोही इन पहाड़ों की दरारों और गुफाओं में बने गुप्त बंकरों को उंगलियों पर जानते हैं.
- ‘हिट एंड रन’ का खूनी खेल: हूती विद्रोही पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर बैठकर घात लगाते हैं. नीचे संकरी घाटियों में आगे बढ़ रहे अनजान सैनिकों पर ऊपर से हमला करना उनके लिए बच्चों का खेल है. पाकिस्तानी सैनिक जब तक समझ पाएंगे कि गोली कहां से चली, तब तक आधी टुकड़ी साफ हो चुकी होगी.
- कट जाएगी सप्लाई लाइन: इन बीहड़ पहाड़ों में खाना, पानी और गोला-बारूद पहुंचाना नामुमकिन जैसा है. हूती विद्रोही मुख्य रास्तों पर IED और एंटी-टैंक मिसाइलें लगाकर रसद की गाड़ियों को उड़ा देंगे. रसद कटते ही सैनिक बिना गोली-बारूद और पानी के पहाड़ों में तड़पने के लिए मजबूर हो जाएंगे.
पाकिस्तानी सैनिकों के मनोबल और शरीर तोड़ देगा यमन का मौसम
- 50 डिग्री की भट्टी: दिन के समय यमन और सऊदी रेगिस्तान का तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इतने भयानक तापमान में बुलेटप्रूफ जैकेट, भारी हथियार और हेलमेट पहनकर पहाड़ों पर चढ़ना ही सैनिक को आधा मार देता है. हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से सैनिक तड़प-तड़प कर दम तोड़ने लगेंगे.
- रात में हाड़ कंपाने वाली ठंड: रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाकों में सूरज ढलते ही पारा अचानक गिर जाता है. दिन में 50 डिग्री झेलने के बाद रात में जमा देने वाली ठंड सैनिकों को शारीरिक रूप से अपाहिज बना देती है.
- रेतीले तूफान : यमन में अचानक उठने वाले रेतीले तूफान विजिबिलिटी को बिल्कुल शून्य कर देते हैं. ऐसे मौसम में न तो आधुनिक ड्रोन काम करते हैं, न रडार और न ही जेट विमानों से हवाई सहायता मिल सकती है. जब तकनीक फेल होगी, तब हूती विद्रोही अंधेरे और धूल की आड़ में कत्लेआम मचाएंगे.
सऊदी पर अटैक के बाद डांस करते हूती लड़ाके (फोटो ग्रैब- @AngelVazquez40/X Video)
हूती विद्रोही: फौज के सामने ‘अदृश्य शिकारी’
पाकिस्तानी सेना को मैदान में आमने-सामने की लड़ाई लड़ने की ट्रेनिंग मिली है. लेकिन हूती विद्रोही कोई सेना नहीं हैं.
- नियम-कानून ताक पर रखने वाले दुश्मन: हूती सैनिक कोई सैन्य वर्दी नहीं पहनते. वो आम चरवाहों या स्थानीय नागरिकों के कपड़ों में घूमते हैं. जब तक बाहरी सैनिक पहचान पाएं कि कौन नागरिक है और कौन दुश्मन, हूती हमला करके गायब हो चुके होते हैं.
- सस्ते ड्रोन और मिसाइल तकनीक: हूतियों के पास सुसाइड ड्रोन, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) और आधुनिक माइन्स का बड़ा नेटवर्क है. वो पहाड़ों में छिपे रहकर करोड़ों डॉलर के सैन्य उपकरणों को एक पल में नष्ट करने की क्षमता रखते हैं.
- स्थानीय समर्थन का न होना: पाकिस्तानी सैनिकों के लिए स्थानीय भाषा, संस्कृति और रास्ते पूरी तरह अनजान होंगे. स्थानीय आबादी हूतियों के साथ खड़ी है, जिसका मतलब है कि हर मोड़ पर पाकिस्तानी सैनिकों के लिए एक नया जाल बिछा होगा.
इतिहास दोहराने की कगार पर पाकिस्तान
इतिहास इस बात की गवाही देता है कि वियतनाम में अमेरिका और अफगानिस्तान में सोवियत संघ व अमेरिका की असफलता का सबसे बड़ा कारण वहां का दुर्गम टेरेन और गुरिल्ला युद्ध ही था.
1971 में राजस्थान के लोंगेवाला की रेत में जब पाकिस्तानी टैंक धंसे थे, तो उनके पास भागने का कोई रास्ता नहीं था. अब अगर पाकिस्तान मक्का रक्षा समझौते के तहत यमन के मोर्चे पर अपने सैनिकों को झोंकता है, तो हूती विद्रोहियों का खतरनाक नेटवर्क, यमन के नुकीले पहाड़, 50 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी और रात के रेतीले तूफान मिलकर वही इतिहास दोहराएंगे. पाकिस्तानी सैनिकों के लिए ये लड़ाई सिर्फ हूतियों से नहीं होगी, बल्कि प्रकृति और भूगोल के उस खौफनाक चक्रव्यूह से होगी जिसमें फंसकर उनका बचना लगभग नामुमकिन है.