किसानों की आत्महत्या देख नाना पाटेकर ने छोड़ा था स्टारडम, दूसरों के लिए बने जीने की मिसाल, आप भी लें सीख

किसानों की आत्महत्या देख नाना पाटेकर ने छोड़ा था स्टारडम, दूसरों के लिए बने जीने की मिसाल, आप भी लें सीख


Nana Patekar Donations and Social work : यह बात साल 2014-15 के आसपास की है. महाराष्ट्र के मराठवाडा और विदर्भ क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा था. लगातार बारिश न होने और सिंचाई के साधन न होने के कारण वहां के किसानों की फसलें पूरी तरह तबाह हो चुकी थीं. सिर पर भारी कर्ज, बैंक के नोटिस और साहूकारों के ताने-इन सब से तंग आकर सैकड़ों किसानों ने मौत को गले लगाना शुरू कर दिया था. जब ये दिल दहलाने वाली खबरें टेलीविजन और अखबारों की सुर्खियों में आ रही थीं, तो मुंबई की चकाचौंध और स्टारडम की दुनिया में रह रहे नाना पाटेकर के भीतर कुछ टूट रहा था.

एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद साझा किया था कि वे इन घटनाओं को देखकर अंदर से सुन्न हो चुके थे. उन्हें लगा कि सिर्फ फिल्मों में अभिनय करके तालियां बटोर लेना ही काफी नहीं है, जब देश का पेट पालने वाला ‘अन्नदाता’ ही दम तोड़ रहा हो, तो एक कलाकार होने के नाते उनकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है.

स्टारडम छोड़ जमीन पर उतरे नाना

बिना किसी कैमरे की फ्लैशलाइट या पब्लिसिटी स्टंट के, नाना पाटेकर ने मुंबई का एसी कमरा छोड़ा और सीधे उन प्रभावित गांवों में पहुंच गए. जब उन्होंने किसानों की विधवाओं, भूखे बच्चों और उजड़े हुए घरों को अपनी आंखों से देखा, तो उनका दिल पसीज गया.
उन्होंने किसी से मदद की उम्मीद करने के बजाय खुद पहल की. शुरुआत में उन्होंने अपनी नई कार खरीदने के लिए जो पैसे बचाए थे, वे और अपनी निजी जमा पूंजी निकालकर पीड़ित परिवारों तक पहुंचाई. उन्होंने हर दुखी परिवार को आर्थिक संबल देने के साथ-साथ यह अहसास कराया कि वे इस आपदा में अकेले नहीं हैं.

‘नाम फाउंडेशन’ की नींव

व्यक्तिगत मदद का दायरा सीमित था, जबकि दर्द बहुत बड़ा था. इसी सोच के साथ सितंबर 2015 में उन्होंने अपने साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (Naam Foundation) की स्थापना की. इसके बाद उन्होंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा (मीडिया सूत्रों के मुताबिक, अपनी कमाई का 90 प्रतिशत हिस्‍सा)और अपना अनमोल वक्त किसानों के कल्याण और गांवों को फिर से आबाद करने के लिए समर्पित कर दिया. फिल्मों से मिलने वाले पारिश्रमिक का एक बड़ा हिस्सा वे चुपचाप इस नेक काम में दान करने लगे.

बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर.

हमारे लिए क्या है सीख
नाना पाटेकर की जिंदगी से दान का सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि दान सिर्फ पैसे देने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी क्षमता के मुताबिक किसी के काम आना भी है. हर व्यक्ति करोड़ों रुपये दान नहीं कर सकता, लेकिन छोटी-छोटी मदद भी किसी की जिंदगी आसान बना सकती है.

जिम्मेदारी का अहसास:
समाज के प्रति हमारी भी कुछ जवाबदेही है. अपनी सुख-सुविधाओं से बाहर निकलकर यदि हम किसी की थोड़ी सी भी मदद कर सकें, तो जीवन का असली मकसद पूरा हो जाता है.

कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंदों के लिए रखें
अपनी आमदनी का छोटा-सा हिस्सा नियमित रूप से किसी भरोसेमंद संस्था, जरूरतमंद परिवार, शिक्षा या इलाज के लिए दिया जा सकता है. रकम छोटी हो, लेकिन मदद लगातार होनी चाहिए.

सिर्फ पैसे नहीं, समय भी दान करें
किसी बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना, बच्चे की पढ़ाई में मदद करना या किसी जरूरतमंद की बात सुन लेना भी मदद का बड़ा रूप है. आपके पास पैसा कम है तो समय और हुनर जरूर साझा कर सकते हैं.

दिखावे से बचें
दान का मकसद सोशल मीडिया पर तस्वीरें या तारीफ पाना नहीं, बल्कि किसी की परेशानी कम करना होना चाहिए. इसलिए मदद करते समय सामने वाले की गरिमा और निजता का भी ध्यान रखें.

जरूरत समझकर मदद करें
हर किसी को एक जैसी मदद की जरूरत नहीं होती. किसी को राशन चाहिए, किसी को इलाज, किसी बच्चे को फीस या किसी किसान को खेती से जुड़ी सहायता. इसलिए पहले जरूरत समझें, फिर मदद करें.

उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि दिल में अगर दूसरों के लिए दर्द हो, तो हर व्यक्ति एक ‘रियल हीरो’ बन सकता है.(File Image)

छोटी शुरुआत करें
दान करने के लिए बड़ी रकम का इंतजार न करें. महीने में 100, 500 रुपये या अपनी क्षमता के अनुसार कोई भी राशि अलग रखकर शुरुआत की जा सकती है.

नाना पाटेकर ने हमें सिर्फ बेहतरीन फिल्में ही नहीं दीं, बल्कि यह भी सिखाया कि कैसे एक आम इंसान अपनी संवेदनशीलता और मजबूत इच्छाशक्ति से दूसरों की जिंदगी में उम्मीद की एक नई किरण जगा सकता है. उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि दिल में अगर दूसरों के लिए दर्द हो, तो हर व्यक्ति एक ‘रियल हीरो’ बन सकता है.

डिस्क्लेमर: यह लेख नाना पाटेकर के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जीवन, सामाजिक कार्यों और किसानों की मदद से जुड़े उनके प्रयासों पर आधारित है. इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य पाठकों को प्रेरित करना और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करना है. किसी भी संस्था को दान देने से पहले उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से जांच जरूर करें.



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