एक तरफ केंद्रीय मंत्री और मुंगेर के सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह हैं जो नीतीश कुमार के बेहद करीबी नेताओं में गिने जाते हैं. दूसरी तरफ मोकामा के अनंत सिंह, जिन्हें इलाके में लंबे समय से प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे के तौर पर देखा जाता है. एक दौर ऐसा भी था जब दोनों के राजनीतिक हित आमने-सामने थे और टकराव का दौर था. लेकिन, आज की सियासत में तस्वीर काफी अलग है. …तो आखिर ऐसा क्या बदला कि कभी दूरी रखने वाले दोनों नेता एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आने लगे?
अनंत सिंह का राजनीतिक सफर नीतीश कुमार के करीब आने से शुरू हुआ. 1990 के दशक में वे और उनके बड़े भाई दिलीप सिंह उर्फ ‘बड़े सरकार’ का अपने क्षेत्र में बहुत प्रभाव रहा. इसी दौर में नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से अपने उभार के प्रयास में लगे थे. यानी यह दौर नीतीश कुमार के भी सियासी संघर्ष का था. यही वो समय था जब नीतीश कुमार की मदद में दिलीप सिंह और अनंत सिंह नीतीश कुमार की मदद करते रहे. समय बीतता गया और वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने नीतीश कुमार का खुलकर समर्थन किया था. इसके बाद 2005 में अनंत सिंह पहली बार जेडीयू के टिकट पर मोकामा से विधायक बने. उस चुनाव में उन्होंने लोजपा के उम्मीदवार नलिनी रंजन शर्मा को हराया था. उस कालखंड में ललन सिंह खुद जेडीयू के वरिष्ठ नेता थे और नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे. इस दौर में अनंत सिंह और ललन सिंह के रिश्ते भी काफी सहज रहे.
दोनों के बीच सहज रिश्ते का एक कारण यह भी रहा था कि दोनों ही स्वजातीय (भूमिहार) भी हैं और मोकामा-मुंगेर बेल्ट में प्रभाव रखते हैं. नीतीश कुमार के नजदीकी के कारण उनकी राजनीतिक ताकत भी आगे बढ़ी. इसके बाद वर्ष 2006 में अनंत सिंह के बड़े भाई फजो सिंह की हत्या होने पर नीतीश कुमार और ललन सिंह दोनों नदवां गांव गए और अंतिम संस्कार में शामिल हुए, इससे अनंत सिंह को राजनीतिक समर्थन मिला. वर्ष 2010 में भी अनंत सिंह जेडीयू टिकट पर दोबारा विधायक चुने गए. इस पूरे दौर यानी 2005-2015 में अनंत सिंह नीतीश-ललन खेमे के साथ थे. ललन सिंह पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में उनके साथ जुड़े रहे.
अनंत सिंह के खिलाफ थे ललन, फिर बने साथ के साथी
2015 में रिश्तों में आई थी बड़ी दरार
इस कहानी के तार करीब एक दशक पीछे जुड़ते हैं. वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले अनंत सिंह जेडीयू में थे. उसी दौर में बाढ़ अनुमंडल क्षेत्र में पुटुस यादव हत्याकांड में गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मोकामा से चुनाव लड़ा था. तब जेडीयू ने उनके सामने नीरज कुमार को मैदान में उतारा था. अनंत सिंह उस समय जेल में थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने नीरज कुमार को करीब 18 हजार वोटों से हरा दिया. चुनाव परिणाम में अनंत सिंह को 54,005 और नीरज कुमार को 35,657 वोट मिले. यहीं से अनंत सिंह और जेडीयू के एक हिस्से के बीच राजनीतिक दूरी की कहानी और गहरी हुई. वक्त बीतता गया और बाद के वर्षों में भी नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच तल्खी बनी ही रही.
2019 में मुकाबला सीधे मुंगेर तक पहुंचा
इसके बाद आया वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव जो इस रिश्ते के दूसरे बड़े पड़ाव की तरह था. मुंगेर से जेडीयू के टिकट पर ललन सिंह मैदान में थे और अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी कांग्रेस के टिकट पर उनके खिलाफ चुनाव लड़ रही थीं. यानी मुकाबला अब मोकामा से निकलकर मुंगेर लोकसभा तक पहुंच चुका था. नतीजे में ललन सिंह ने नीलम देवी को 1,67,937 वोटों से हराया. उस समय अनंत सिंह और ललन सिंह के राजनीतिक रास्ते अलग-अलग थे. यही वजह है कि आज दोनों की नजदीकी को समझने के लिए 2019 की वह तस्वीर भी याद रखना जरूरी है.
2015 में दुश्मनी, 2024 में साथ और 2026 में फिर परीक्षा!
2024 में पहली बार तस्वीर बदली
फिर आया 2024 का लोकसभा चुनाव. ललन सिंह एक बार फिर मुंगेर से जेडीयू के उम्मीदवार थे. इस बार अनंत सिंह उनके खिलाफ नहीं, बल्कि उनके समर्थन में खड़े दिखाई दिए. जेल से 15 दिन की पैरोल पर बाहर आए अनंत सिंह ने ललन सिंह के लिए चुनाव प्रचार किया और उनके पक्ष में रोड शो भी किए. यही वह वक्त था जब दोनों के रिश्ते में दिखाई देने वाला सबसे बड़ा बदलाव सामने आया. जिस राजनीतिक धुरी पर कभी दोनों आमने-सामने थे, उसी धुरी पर अब अनंत सिंह ललन सिंह के साथ खड़े थे. दरअसल, मुंगेर लोकसभा क्षेत्र में मोकामा भी शामिल है, इसलिए मोकामा की राजनीति और अनंत सिंह का प्रभाव ललन सिंह के लिए स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण था. अनंत सिंह ने जोर लगाया तो राजनीति के धरातल पर उसका प्रभाव भी साफ-साफ दिखा. वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव में ललन सिंह ने फिर मुंगेर से जीत दर्ज की.
2025 में ललन सिंह ने संभाली अनंत की सियासी लड़ाई
सियासी रिश्तों में बदलाव की कहानी आगे बढ़ी तो करीबी और भी बढ़ती जली गई. फिर आया वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव ने इस बदलते रिश्ते को और साफ कर दिया. अनंत सिंह जेडीयू के उम्मीदवार थे, लेकिन चुनाव से पहले दुलारचंद यादव हत्याकांड के मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इससे पहले वह अगस्त 2025 में जेल से बाहर आए थे और जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके थे. अनंत सिंह के जेल जाने के बाद ललन सिंह मोकामा में उनके समर्थन में चुनाव प्रचार करने पहुंचे. उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से अनंत सिंह के पक्ष में वोट करने की अपील की. जब चुनाव परिणाम आए तो कठिन चुनौतियों के बीच अनंत सिंह ने बहुत बड़ी जीत प्राप्त की. साफ है कि वर्ष 2019 में जिस रिश्ते की तस्वीर में दोनों पक्ष अलग-अलग दिखाई दे रहे थे और दो ध्रुवों पर खड़े थे, वर्ष 2025 तक वही सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी. अब ललन सिंह अनंत सिंह के राजनीतिक समर्थन में मैदान में थे.
नीरज के साथ संजय, अनंत के साथ ललन… दोनों तरफ खामोशी क्यों?
2026 में पुराना विवाद फिर लौटा, लेकिन रिश्ते नहीं बदले
2026 में कहानी फिर एक पुराने मोड़ पर पहुंच चुकी है. पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जेडीयू ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया. ललन सिंह ठहरे खांटी जेडीयू के नेता क्योंकि वे पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं. उनका जदयू से कितना लगाव है यह सहज ही समझा जा सकता है. लेकिन, सियासत दूरी के एक किनारे खड़े थे अनंत सिंह जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर नीरज कुमार की उम्मीदवारी का विरोध किया. बात इतनी भर होती तो ठीक उन्होंने नीरज कुमार के खिलाफ जन सुराज समर्थित उम्मीदवार अनुज सिंह के समर्थन की बात कही. इससे दोनों के बीच पुरानी राजनीतिक तल्खी फिर सामने आ गई.
लेकिन इस बार एक फर्क था. अनंत सिंह और नीरज कुमार की लड़ाई को पार्टी ने केवल दो नेताओं का व्यक्तिगत विवाद मानकर छोड़ने के बजाय इसे सुलझाने की जिम्मेदारी ललन सिंह को दी. जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने भी इसकी पुष्टि की थी. इसके बाद नीतीश कुमार की ललन सिंह से मुलाकात भी हुई. यहीं से ललन सिंह और अनंत सिंह के मौजूदा रिश्ते को समझने की असली कुंजी मिलती है.
आखिर दोनों के रिश्ते क्यों बदले?
इसका जवाब किसी एक मुलाकात में नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरण में छिपा है. मोकामा और मुंगेर का क्षेत्रीय समीकरण, अनंत सिंह का स्थानीय प्रभाव, भूमिहार राजनीति में उनकी पकड़ को लेकर बनी धारणा और जेडीयू की अपनी राजनीतिक जरूरतें- इन सबने समय के साथ समीकरण बदले हैं. 2015 से शुरू हुई तल्खी 2024 में सुलह के रास्ते 2026 में ‘सियासी स्नेह’ के बंधन में बंध चुके लगते हैं.
अब जब अनंत और नीरज के बीच विवाद फिर सामने आया, तो उसे सुलझाने की जिम्मेदारी भी ललन सिंह को मिली. यानी कहानी सिर्फ दुश्मनी से दोस्ती की नहीं है. यह बिहार की राजनीति में बदलते हितों, क्षेत्रीय कारकों और पार्टी की जरूरतों के साथ बदलते रिश्तों की कहानी है.साफ है कि राजनीति में रिश्ते सिर्फ बीते कल से तय नहीं होते, आने वाली जरूरतें भी उन्हें नया आकार देती हैं.