बालाघाट के जगला गांव में 2 महीने में 4 बच्चों की मौत, न इलाज मिला, न मुआवजा, न लिस्ट में नाम

बालाघाट के जगला गांव में 2 महीने में 4 बच्चों की मौत, न इलाज मिला, न मुआवजा, न लिस्ट में नाम


Balaghat Baiga: “एक कच्चा मकान, मकान में गिनती के तीन कमरे और तीनों कमरे इस तरह की उसमें एक बल्ब से काम चल जाए. नजर जब घर की रसोई पर पड़ी, तो गिनती के चार बर्तन एक में सब्जी और एक में भात. एक गुंडी थी, जिसमें पानी रखा हुआ था. खाना भी चूल्हे में था. गैस की टंकी एक कोने में रखी थी, जो सालों पहले भरी आई पहले इस्तेमाल के बाद से खाली पड़ी जस की तस थी.”

यह घर उस लोकेश का था, जिसे राहुल गांधी ने अपनी गोद में उठाया था. लोकेश उस बैगा समुदाय से आता है, जो इन दिनों पूरे देश में चर्चा में था. लोकेश की बहन नीलम की मौत अब से ठीक दो महीने पहले हुई थी. लेकिन सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि और चार बच्चों का नाम सरकार की सूची में दर्ज ही नहीं है. ग्रामीण कहते हैं कि सभी की मौत समय पर इलाज न मिलने की वजह से हुई है. लोकल 18 ने नीलम के परिजनों से मुलाकात की…

सतपुड़ा की पहाड़ियों के दर्रों में बसा गांव सिस्टम से रहा अंजान
बालाघाट से करीब 95 किलोमीटर दूर सतपुड़ा की पहाड़ियों में टोलों मंजरों में बसा गांव जगला में भी मौतें हो रही थी. पहली मौत 22 मई को 16 दिन अंकित की मौत हुई. सरकारी महकमें में किसी को जानकारी तक नहीं थी कि किसी मासूम की मौत हुई है. वहीं, बीते दो महीने में ही चार बच्चों की मौत की गूंज भी बहरे सिस्टम के कानों को नहीं खोल सकी. ऐसे में उन तमाम दावों की पोल खुलने लगी, जिसे जनसंपर्क विभाग के माध्यम से स्थानीय मीडिया तक पहुंचाया जा रहा था. दो साल की निलम धुर्वे की मौत हुई फिर 30 अगस्त को सरस्वती और फिर 1 सितंबर को महीने भर के बिसतू की मौत हुई.

ऐसे में सरकारी तंत्र के उन दांवों पर सवाल उठते हैं, जो दावा करते हैं  कि 57 गांवों स्वास्थ्य विभाग का सर्वेक्षण और उपचार अभियान चलने का दावा किया जा रहा है. जगला गांव कुंडेकसा, बोंदारी सहित सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों से महज 25 किलोमीटर की दूरी पर है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग उन गांवों तक क्यों नहीं पहुंचा. ऐसे में सवाल तो उठना लाजमी है कि स्वास्थ्य विभाग जनता को चूना लगा रहा है.

नीलम की मौत से उठे स्वास्थ्य विभाग की गंभीरता पर सवाल
लोकल 18 ने नीलम की मां बमनीन बताती है कि निलम की काफी लंबे समय से तबीयत खराब हो रही  थी. ऐसे में उन्होंने झोलाछाप डॉक्टर के पास इलाज कराया था. इस दौरान उनके हजारों रुपए खर्च किए लेकिन आराम नहीं मिला. इसके बाद निलम को 23 जुलाई को बैहर लेकर गए लेकिन वहां एक दिन रखने के बाद जिला अस्पताल लेकर गए. वहां पर वह सात दिनों तक भर्ती रही. ऐसे में वहां पर भी बच्ची ठीक नहीं हुई तो नीलम को उसके माता-पिता ने घर ला लिया. दो दिन तक घर में तड़पने के बाद नीलम की मौत हो गई. ऐसे में सवाल जिला अस्पताल प्रशासन पर उठता है कि अगर निलम की तबीयत इतनी खराब थी, तो उसे छूट्टी क्यों दी गई. नीलम की मां बमनीन ने बताया कि उसे भी लाल चकत्ते आए थे. मुंह पर छाले थे. बुखार भी था और निमोनिया के भी लक्षण थे.

मुआवजा तो दूर सरकारी रिकॉर्ड में नाम तक नहीं
अगर सरकारी अस्पताल से मरीज की छुट्टी होती है, तो क्या स्थानीय अमला उनकी निगरानी क्यों नहीं रखता यह सवाल अब भी बना है. दो अगस्त को दो साल दो महीने की निलम की मौत हो गई. जब बैगा बच्चों का मामला सतपुड़ा की घाटियों से निकलकर मुख्य धारा में चर्चा में आया, तो सरकार ने मुआवजे का ऐलान कर दिया. फिर उन बच्चों की मौतों का हिसाब तय हुआ. पहले 20 हजार रुपए फिर दो लाख आखिरी में चार लाख रुपए देकर सरकार ने अपनी पीठ थपथपा ली. लेकिन नीलम और कई बच्चों के नाम पर मुआवजा तो दूर मृत बच्चों की सूची में नाम तक नहीं था. ऐसे में लोकल 18 ने जगला गांव की आशा कार्यकर्ता से बात की लेकिन उन्होंने कैमरे पर बात करने से इनकार कर दिया. उन्होंने इतना जरूर कहा कि यहां पर बीमार बच्चों और मृत बच्चों की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई गई लेकिन उन्होंने क्यों ध्यान नहीं दिया हमें नहीं पता.

नीलम के भाई लोकेश राहुल ने उठाया गोद में
साल भर का लोकेश अपनी मां के साथ राहुल गांधी से मिला. राहुल ने उन्हें आश्वासन दिलाया कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे. इस दौरान लोकेश को राहुल ने गोद में भी उठाया, जिसकी तस्वीर अब इंटरनेट पर वायरल है. राहुल ने पीड़ितों से मुलाकात के बाद कहा कि ऐसा लगता है कि यहां कोई सरकार ही नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे को वह लोकसभा में भी उठाऊंगा.

सरकारी रिकॉर्ड में 32 तो विधायक 45 से ज्यादा मौतों का दावा
सरकार शुरु से ही मौतों से इनकार कर रही थी और आंकड़ों पर सवाल रहे. ऐसे में अब तक 32 बच्चों का नाम ही सरकारी सूची में है. वहीं, क्षेत्रीय विधायक संजय उइके ने 45 से ज्यादा मौतों का दावा किया है. हाल ही में उन्होंने मृत बच्चों की सूची जारी की है. इसके बाद से प्रशासन ने इसका न खंडन किया है और नहीं ही कोई संशोधित आंकड़ा सार्वजनिक किया है.



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