NHTS Report: सौ बात की एक बात ये कि सब खबरों के बीच एक बहुत बड़ी खबर पर लोगों का ध्यान उतना नहीं गया जितना शायद जाना चाहिए था. सरकार ने पहली बार एक सर्वे किया है जिससे ये पता चलता है कि देश में काम पर लोग कैसे जाते हैं. नेशनल हाउस होल्ड ट्रैवल सर्वे, NHTS, जुलाई 2025 से जून 2026 तक लगभग बीस लाख लोगों से बात की, गांवों और शहरों दोनों में. और नतीजा क्या निकला? वही जो शायद सबकी आंखों के सामने है लेकिन किसी को दिखाई नहीं दे रहा. ज़्यादातर लोग अपने ही वाहन से काम पर जाते हैं देश में. सिर्फ़ 15% लोग बस, ट्रेन, मेट्रो, ऑटो वगैरह जैस पब्लिक ट्रांसपोर्ट से काम पर जाते हैं. ऑटो और ई-रिक्शा जैसे प्राइवेट ट्रांस्पोर्ट को हटा दो तो बस, ट्रेन, मेट्रो वगैरह से तो 9% लोग ही चल रहे हैं. ज़्यादातर लोग काम पर कैसे जाते हैं? स्कूटर या बाइक से 43% लोग जाते हैं और अपनी कारों से 3% लोग जाते हैं काम पर. यानी 46% लोग, मतलब आधे से थोड़े कम लोग तो अपने ही वाहन से चल रहे हैं. और बाक़ी 28% जाते हैं पैदल. जी, याद रखिये सर्वे गांवों, क़स्बों, शहरों सबका है. इसलिए पैदल काम पर जाने वालों की प्रतिशत 28% है. अगर सिर्फ़ शहरों का देखें तो 53% स्कूटर या बाइक से चलते हैं, और 6% लोग कार से चलते हैं. पैदल जाते हैं 14% शहरों में. लेकिन असली ख़बर ये है कि बस, ट्रेन, मेट्रो जैसे बड़े साधनों से सिर्फ़ 9% लोग ही काम पर जा रहे हैं.
बड़ी ख़बर इसलिए क्योंकि दुनिया में कई शहर इस तरह के सिस्टम को भुगत चुके हैं. सब अपनी ही बाइक या कार से चलेंगे तो कितनी ही सड़कें बना लो कम ही पड़ने वाली हैं. अभी कुछ दिन पहले दिल्लीवालों ने फिर देख लिया इस तरह की प्लानिंग ने शहर का क्या हाल बना रखा है. एक एलिवेटेड रोड है दिल्ली में बारापुला फ़्लाईओवर. कॉमनवेल्थ खेलों के टाइम बनी थी ताकि रिंग रोड पर गाड़ियों का लोड कम हो. उसका तीसरा फ़ेज़ 12 साल से बन रहा था किसी ना किसी वजह से अटक रहा था. अभी कुछ दिन पहले खुला और ये बताया गया कि इससे 40 मिनट का रास्ता 20 मिनट में पूरा हो जाएगा. लेकिन हालत ये हैं कि अब उस पर एक घंटे से ज़्यादा लग रहा है. क्यों? क्योंकि तीन तरफ़ के रास्ते जाकर एक जगह एक में मिल रहे हैं तो जाम ही लगा रहता है. ट्रैफ़िक पुलिस तो बाक़ायदा सोशल मीडिया पर लिख रही है कि इस रास्ते के बदले कहीं और से निकल जाओ. कहीं और से निकल जाओ? अभी कुछ दिन ही हुए हैं इसको खुले हुए.
जितनी सड़कें बन रहीं, उतनी गाड़ियां बढ़ रहीं
कहीं और से तो पहले भी जा ही रहे थे, तो फिर ये बनाया क्यों था? हर शहर का यही हाल है. जितनी सड़कें बना दी जाती हैं उससे ज़्यादा गाड़ियां सड़कों पर आ जाती हैं. इसका कोई अंत नहीं दिख रहा. कोई कह देता है कि भाई साहब लोग ही इतने हैं क्या कर सकते हैं? कर तो सकते हैं. दुनिया में एक शहर ने बिल्कुल कमाल कर के दिखाया था 20 साल पहले. वहां भी यही हाल था. दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल. सोल ने 1980 और 1990 के दशक में वही गलती की थी जो आज कई भारतीय शहर कर रहे हैं. गाड़ियां ही गाड़ियां बढ़ती चली गई थी वहां. 1986 में शहर में 5 लाख गाड़ियां थी, 1990 तक 10 लाख पार कर गई, और 1995 तक 20 लाख हो गईं. सड़क पर 72% गाड़ियां लोगों की अपनी प्राइवेट गाड़ियां हो गईं. कारें और बाइक वगैरह.
जाम से निपटने के लिए सड़क बनाएं या तोड़ें? सियोल ने 20 साल पहले चुना दूसरा रास्ता, बदली शहर की पूरी तस्वीर (फाइल फोटो)
साउथ कोरिया भी झेल चुका भारत जैसा हाल
करोड़ों डॉलरों का पेट्रोल डीज़ल फूंक रही थीं और प्रदूषण का तो पूछो मत. पब्लिक हर बार यही मांग करती थी कि और सड़कें बनाओ, और सड़कें बनाओ, और पुल बनाओ, और पुल बनाओ. सड़कें बनती गईं, भीड़ बढ़ती गई. ये हालत हो गई कि शहर के बीच से नदी बहती थी. जैसे दिल्ली में यमुना बहती है. कोरिया वालों ने नदी के ऊपर 6-लेन का एक्सप्रेसवे बना दिया. रोज़ उसपर 2 लाख गाड़ियां दौड़ने लगीं. लेकिन फिर जाम होने लगे. गाड़ियां इतनी बढ़ गईं. दक्षिण कोरिया ने अपनी गाड़ियां भी बनानी शुरू कर दी थीं ह्युंडई वगैरह. तो सब लोगों के पास गाड़ी होने लगी. लेकिन जितनी गाड़ियां उतना ही जाम भी बढ़ने लगा. सरकार कहती रही कि बस से चलो, ट्रेन से चलो, मेट्रो से चलो. लेकिन सब अपनी गाड़ी ही लेते जा रहे थे और मांग करते जा रहे थे कि और एक्सप्रेसवे बनाओ, और फ़्लाईओवर बनाओ.
भारत में क्या है तरीका
भारत में वही तो हाल है. लेकिन यहां तो ये भी है कि लोग बाइक या गाड़ी इसलिए भी लेते जा रहे हैं क्योंकि और तरीक़ा ही क्या काम पर जाने का. नहीं तो घर से निकलो, ई-रिक्शा या ऑटो पकड़ो, फिर बस पकड़ो. बस कहीं छोड़ेगी, दूसरी बस पकड़ो, फिर वहां से ई-रिक्शा पकड़ो और काम पर पहुंचो. और हर प्वाइंट पर इंतज़ार करते रहो धूल और गर्मी और उमस में. तो लोग स्कूटर ले लेते हैं, पैसा आता है तो कार ले लेते हैं. अब बात सिर्फ़ शो-ऑफ़ की नहीं रह गई है. अपनी गाड़ी ना हो तो कई जगह तो आप काम पर पहुंच ही नहीं सकते. यूपी जैसे राज्य में ही देख लो. इतना सारा टैक्स यूपी को नोएडा से आता है. लेकिन नोएडा में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए इतने बड़े एरिया में तो कोई साधन ही नहीं. कई जगहों पर तो बस चलती ही नहीं. कुछ जगह मेट्रो है तो वो इतनी भरी हुई रहती है कि आपको अपनी बाइक अपनी गाड़ी चाहिए ही चाहिए. और ये मजबूरी अब हमारे सारे शहरों में हो गई है.
साउथ कोरिया ने कैसे किया कमाल
दक्षिण कोरिया के सोल में भी यही हाल था. तो जब वो नदी के ऊपर ही एक्स्प्रेसवे बना दिया सरकार ने और वो भी भर गया गाड़ियों से तो सरकार ने बोला कि बस. ये तो सिस्टम ही बदलना पड़ेगा. तो उन्होंने क्या किया? पहले तो सड़क में बस कॉरिडॉर बनाए. ये दिल्ली में भी ट्राय हुआ था लेकिन इतना हल्ला हो गया था कि शीला दीक्षित की सरकार के ख़िलाफ़ ये भी मुद्दा बन गया था कि आइडिया सही से लागू नहीं किया. ख़ैर, सोल ने सड़कों में बसों के लिए अलग कॉरिडॉर बनाए. कि इनमें सिर्फ़ बसें चलेंगी. और बजट का इतना ज़्यादा पैसा बसें ही बसें ख़रीदने में लगा दिया कि कई एक्सपर्ट ने कहा कि इतनी बसों में चढ़ेगा कौन? मेट्रो में सारा बजट लगा दिया और बसों में पैसा लगा दिया और मिनी बसों में पैसा लगा दिया जो हर मोहल्ले की हर गली तक जाती थीं. लेकिन लोग तो अपनी गाड़ियों से चलने की आदी हो चुके थे. तो सरकार ने क्या किया? उन्होंने फ़्लाईओवर बनाए नहीं. जो बने हुए थे वो तोड़ दिये. जी हां, तोड़ दिए.
बारापूला फेज-3 फ्लाईओवर पर जाम की तस्वीर (फाइल फोटो)
एक्सप्रेसवे को तोड़कर कैसे लोगों को समझाया
नदी के ऊपर एलिवेटेड रोड बनाकर 6-लेन का एक्सप्रेसवे बनाया था, वो तोड़ दिया. तो ये कर दिया कि बस से चलोगे तो जल्दी पहुंचोगे क्योंकि बस तो अपनी अलग सड़क पर चल रही है. उस बस कॉरिडॉर में आपकी गाड़ी जा ही नहीं सकती. तो अपनी गाड़ी से जाओगे तो लेट हो जाओगे. और बस और मेट्रो इतनी ज़्यादा कर दीं कि भीड़ की परेशानी ना हो. और बस स्टैंड या मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए हर गली से मिनी बस. और सबसे बड़ी चीज़ जो सोल ने की वो ये कि टिकट बस की या मिनी बस की या ट्रेन की या मेट्रो की नहीं रखी. टिकट रखी एक जगह से दूसरी जगह की. पॉयंट टू पॉयंट. मतलब अगर आपको मुंबई में जैसे बोरिवली से कोलाबा जाना है तो चाहे जैसे जाओ, टिकट बोरिवली से कोलाबा की है. यानी हर वाहन की अलग टिकट नहीं लेनी. उससे क्या हुआ कि अलग-अलग लाइन में लगने का भी चक्कर नहीं. और घर से दफ़्तर तक या जहां भी आपका काम है वहां तक आप पहुंच सकते हो एक ही टिकट में.
और आखिरकार बदल गई दक्षिण कोरिया की तकदीर
पार्किंग की कोई चिंता ही नहीं. नतीजा ये हुआ कि देखते-देखते 64% लोग पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से चलने लगे. यानी हर तीन में दो लोग बस से मेट्रो से काम पर जाने लगे. ये हालत है कि जहां पहले सड़कें होती थीं, वहां आज सोल में पार्क हैं और बच्चे खेलते हैं वहां. नदी जो बिलकुल मर चुकी थी उसके उपर एक्सप्रेसवे बना दिया था वो आज सोल की शान है और उसके साफ़ पानी में मछलियां तैरती हैं और उसके किनारे की हरियाली से प्रदूषण ग़ायब हो चुका है. कुछ ही सालों में सोल की कायापलट दी गई एक फ़ैसले से. कि लोगों की अपनी शानदार गाड़ी हो ये तरक़्क़ी की विकास की निशानी नहीं है. ये विकास की निशानी नहीं कि बस से चलने वाले कितने लोग अब कार से चलते हैं. विकास की निशानी ये है कि कार से चलने वाले कितने लोग अब बस से चल रहे हैं. सौ बात की एक बात.