Opinion: प्रियंका गांधी जी! तय कर लें यूपी चुनाव 2027 में आपकी लड़ाई बीजेपी से है या अखिलेश यादव से

Opinion: प्रियंका गांधी जी! तय कर लें यूपी चुनाव 2027 में आपकी लड़ाई बीजेपी से है या अखिलेश यादव से


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में लोग उम्मीद लगाए हैं कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच जुबानी जंग देखने को मिलेगी, लेकिन यहां तो कहानी बिलकुल उलट है. विपक्षी खेमे में दोनों तरफ से कहा जा रहा है कि सपा और कांग्रेस गठबंधन में 2027 का चुनाव लड़ेंगे. लेकिन पिछले दो ढाई महीने से मीडिया में जो खबरें सुर्खियां बन रही हैं उसे देखकर तो यही लग रहा है मानो कांग्रेस पार्टी की लड़ाई बीजेपी से नहीं, समाजवादी पार्टी से है.

प्रियंका गांधी के जिम्मे है यूपी की कमान

संसद भवन में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच हुई मुलाकात के दौरान प्रियंका गांधी मौजूद थीं. उसके बाद से यह साफ हो गया था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से तमाम फैसलों में प्रियंका गांधी की ही चलेगी. इस मीटिंग के बाद जिस तरह से उत्तर प्रदेश से जुड़े कांग्रेस के कुछ नेता समाजवादी पार्टी पर हमलावर हुए उसके बाद इस खबर की पुरी तरह से पुष्टि हो गई. कांग्रेस की तरफ से जो भी नेता इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका में हैं वो सभी प्रियंका गांधी के करीबी माने जाते हैं.

प्रियंका के खास इमरान मसूद और राजेंद्र पाल गौतम की बयानबाजी

26 जून 2026 को आम आदमी पार्टी से आयातित राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. दिल्ली की सीमापुरी सीट से विधायकी जीतने के साथ वह अरविंद केजरीवाल की सरकार में मंत्री भी रहे. पेशे से वकील राजेंद्र पाल गौतम को जब कांग्रेस ने यूपी का प्रभारी बनाया तब यही लगा कि पार्टी दलित चेहरे को आगे कर अपने पुराने वोटबैंक को दोबारा हासिल करने के लिए एक मैसेज देने की कोशिश कर रही है. लेकिन राजेंद्र पाल गौतम ने जैसे ही लखनऊ में कदम रखे और अपना पहला बयान दिया उससे समझ में आ गया कि उन्हें दिल्ली से क्यों भेजा गया है. उन्होंने आते ही कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है, उसकी अपनी हैसियत है, इसलिए वह समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में आधे से कम सीटों पर लड़ने के लिए नहीं तैयार होंगे. इसके बाद वह लगातार इसी तरह की बयानबाजी कर रहे हैं. वह समाजवादी पार्टी के सामने जबरदस्ती कांग्रेस की औकात दिखाने के प्रयास में नजर आ रहे हैं.
यूपी कांग्रेस में राजेंद्र पाल गौतम और इमरान मसूद दो ऐसे नेता हैं जो सबसे ज्यादा सपा पर हमले कर रहे हैं.
राजेंद्र पाल गौतम की जुबान खुलने के बाद उनके साथ सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद भी शुरू हो गए. वह हर रोज किसी ना किसी मीडिया संस्थान की माइक पर समाजवादी पार्टी और खासकर अखिलेश यादव को निशाने पर लेने से नहीं चूकते हैं. सपा ने उनके दामाद शायान मसूद को सपा में ज्वाइन कराकर उन्हें जवाब देने की कोशिश की, लेकिन वह अभी तक नहीं रुके हैं. वह जिस मुखरता के साथ अखिलेश यादव के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, उसे देखकर कोई भी समझ सकता है कि पार्टी की तरफ से उन्हें सह मिल रहा है. इतना ही नहीं, ऐसा लगा कि राजेंद्र और इमरान के बयानों को देखकर अजय राय भी सपा पर इसी तरह के अटैक करने लगे. वह भी सपा से सम्मानजनक सीटों की डिमांड करने लगे.

उत्तर प्रदेश की राजनीति को जानने समझने वालों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि इमरान मसूद पूरी तरह से प्रियंका गांधी के खासमखास हैं. वहीं राजेंद्र पाल गौतम और इमरान मसूद की बयानबाजी एक ही सुर में होते देख यह भी साफ हो गया है कि दोनों प्रियंका गांधी से ही दिशा निर्देश ले रहे हैं.

राजेंद्र पाल गौतम ने आते ही अजय राय के पीछे पड़े

राजेंद्र पाल गौतम जब से यूपी कांग्रेस प्रभारी बने वह पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के पीछे हाथ धोकर पड़ गए. वह लगातार दिल्ली को यही संदेश पहुंचाते रहे कि अजय राय की जगह किसी मुस्लिम या को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए. यहां जानकारी के लिए बता दूं कि अजय राय पूरी तरह से राहुल गांधी की पसंद रहे हैं. इस बात को समझने के लिए प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद अजय राय की एक हालिया तस्वीर से समझ सकते हैं, जिसमें वह राहुल गांधी की तस्वीर पर जमी धूल को अपने हाथों से पोछते दिखे थे.

राजेंद्र पाल गौतम अपने प्रयास में सफल हुए और अचानक अजय राय को हटाकर आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया. इस फैसले को देखकर यही लगा कि सेना युद्ध में उतरने को तैयार है और उसके सेनापति को ही बदल दिया जाए.

आराधना मिश्रा की नियुक्ति में भी प्रियंका का गेम प्लान

आराधना मिश्रा मोना वरिष्ठ राज्य सभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं. कांग्रेस की तरफ से इस खबर की फ्रेमिंग मीडिया में इस तरह से की गई कि सवर्ण व महिला प्रदेश अध्यक्ष, दलित प्रभारी और मुस्लिम कार्यकारी अध्यक्ष का कॉम्बिनेशन 2027 में कमाल कर देगी. इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अजय राय दबंग प्रवृति के नेता रहे हैं, इसलिए सपा के साथ सामंजस्य बिठाकर सीट शेयरिंग फाइनल करने में दिक्कत हो रही थी. आराधन मिश्रा मोना सौम्य स्वभाव और सॉफ्ट स्पोकिंग हैं इसलिए वह सपा के साथ बेहतर तालमेल बिठा पाएंगी. इसके साथ ही उनके पिता प्रमोद तिवारी का मुलायम सिंह यादव के दौर से ही पारिवारिक रिश्ते रहे हैं.

अजय राय को हटाकर प्रियंका गांधी की चहेती आराधना मिश्रा मोना को यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

अगर आप भी कांग्रेस की तरफ से फ्रेम की गई इस खबर को ही सही मान रहे हैं तो शायद गलत हैं. असल कहानी यह है कि प्रियंका गांधी के दिशा निर्देशों को अजय राय अक्षरश: नहीं मान रहे थे. याद कीजिए 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जब प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस अकेले लड़ने आई थी. लड़की हूं लड़ सकती हूं के नारे के साथ प्रियंका जितनी भी जगह जाती थीं उनके साथ आराधना मिश्रा मोना रहती थीं. यानी आराधना को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद प्रियंका गांधी के लिए यूपी में अपना एजेंडा चलाना ज्यादा सुटेबल हो गया है.

जहां तक सपा के साथ सीट शेयरिंग में सामंज्य बिठाने की बात है तो जब इमरान मसूद जैसे कड़क मिजाजी कार्यकारी अध्यक्ष हैं तो यह कितना सुचारू रूप से हो पाएगा यह तो आने वाले वक्त में दिखेगा. क्योंकि कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी इमरान मसूद की जुबान पर लगाम नहीं लग रहे हैं.

प्रियंका की वजह से चुप्पी साधे हुए हैं अखिलेश यादव?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इमरान मसूद और राजेंद्र पाल गौतम कुछ भी सपा से अनाप शनाप सीटों की डिमांड कर रहे हैं और अखिलेश यादव पर हमले भी करते जा रहे हैं. वहीं अखिलेश यादव संयम बरते हुए हैं. वह खुद इन बयानबाजी पर पूरी तरह चुप्पी बनाए हुए हैं. भले ही वह इकरा हसन समेत पार्टी के दूसरे सांसदों को जवाब देने के लिए आगे कर देते हैं, लेकिन खुद पूरी तरह चुप्प हैं. जब अखिलेश यादव ने कहा कि सीट बंटवारे का फॉर्मूला केवल जीत होगी. इसपर इमरान मसूद ने तड़ से कहा जब सीटें ही नहीं मिलेगी तो जीत कैसे मिलेगी. कांग्रेस नेताओं के इस रवैये पर अखिलेश यादव के संयम को देखकर ऐसा लग रहा है मानो वह भली भांति समझ रहे हैं कि प्रियंका गांधी पर्दे के पीछे से सारा खेल कर रही हैं.

कांग्रेस की तरफ से हो रहे हमलों पर अखिलेश यादव पूरी तरह चुप हैं.

प्रियंका गांधी की ये हरकत इसलिए भी हैरान करती है, क्योंकि 2022 में वह यूपी में खुद जोर लगाकर देख चुकी हैं. कांग्रेस ने 403 में 399 सीटों पर प्रत्याशी खड़े कर केवल दो सीटें जीत पाई. रायबरेली और अमेठी को अपना गढ़ होने का दावा करने वाली कांग्रेस को यहां एक भी सीट नहीं आई. प्रियंका गांधी की ओर से हर संभव दमखम लगाने के बाद भी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस को केवल 2.34% वोट मिले थे. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में जब राहुल गांधी ने खुद मोर्चा संभाला और अखिलेश यादव के साथ मिलकर सीट शेयरिंग और कैंपेन कि प्लानिंग की तो बीजेपी को 240 सीटों पर रोकने में अहम रोल निभाया. सपा ने 37 और कांग्रेस के छह सांसद जीते, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी पर्दे के पीछे जो कर रही हैं वह कहीं इस गठबंधन को बिहार की तरह मुकाबले से ही बाहर ना कर दे.

सहयोगियों के बीच भरोसा खोती जा रही कांग्रेस

कांग्रेस का यही रवैया बिहार चुनाव 2025 में भी देखने को मिला था. नॉमिनेशन की आखिरी तारीख तक सीट शेयरिंग फाइनल नहीं हो पाया, जिसके चलते पांच सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी फ्रेंडली फाइट का नाम देकर भिड़े, रिजल्ट क्या हुआ सबके सामने है. उसके बाद से तेजस्वी यादव इतने ज्यादा नाराज दिख रहे हैं कि उसके बाद हुए एमएलसी चुनावों में कांग्रेस से बात किए बिना ही अपनी पार्टी के प्रत्याशी उतारते जा रहे हैं. अभी भी आठ सीटों पर हो रहे एमएलसी चुनाव में चार सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस के प्रत्याशी आमने सामने हैं.

कांग्रेस ने यही हरकत 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी कर चुकी है. सपा ने उन्हें 105 सीटें दी, लेकिन उन्होंने 114 सीटों पर प्रत्याशी खड़े कर दिए. इस वजह से चुनाव में माहौल ही नहीं बन पाया कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन भी है. 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को उलझाए रखा और आखिर में कोई भी सीट देने से इनकार कर दिया.

इस वजह से हरियाणा में भी कांग्रेस लगातार तीसरी बार सरकार बनाते बनाते रह गई. इसी साल हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी जब प्रचार करने पहुंचे तब उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार में भ्रष्टाचार और खराब लॉ एंड ऑर्डर के मुद्दे पर खूब हमले किए. दूसरी तरफ बीजेपी को अपने इन्हीं हमलों को वोटरों के सामने सही साबित करने का मौका मिल गया, क्योंकि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस के साथ तृणमूल भी है.

तमिलनाडु में डीएमके हार गई तो झट से कांग्रेस नई नवेली टीवीके के साथ सरकार में शामिल हो गई. इसके साथ ही इंडिया गठबंधन से एक मजबूत प्लेयर बाहर हो गई. जबकि 2014 के बाद से डीएमके एक ऐसी सहयोगी रही जो हर मुद्दे पर कांग्रेस के साथ मुखरता के खड़ी रही. इन तमाम फैसलों को देखकर तो यही लगता है कि कांग्रेस अपने स्वार्थ में खुद ही अपने सहयोगियों के बीच भरोसा खोती जाएगी. सांगठनिक रूप से देश के ज्यादातर बड़े राज्यों में पूरी तरह कमजोर हो चुकी कांग्रेस सहयोगियों के साथ मिलकर अपनी जमीन मजबूत करने के बजाय उन्हें दबाने और सताने में ही ऊर्जा खर्च करने में लगी है. खास बात यह है कि वह ऐसा तब कर रही है जब उसकी लड़ाई नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली बीजेपी से है.



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