OPINION: ‘डोंट फॉरगेट’ कहकर जयशंकर ने बता दिया रूस ही भारत का असली यार, अमेरिका के सिर से उतारा चौधराहट का भूत

OPINION: ‘डोंट फॉरगेट’ कहकर जयशंकर ने बता दिया रूस ही भारत का असली यार, अमेरिका के सिर से उतारा चौधराहट का भूत


वॉशिंगटन के नीति निर्माता यह मानकर चल रहे थे कि वे जब चाहेंगे, भारत उनके पाले में आकर खड़ा हो जाएगा. अमेरिकी रणनीतिकारों को लगता था कि भारत अपने पुराने और परखे हुए दोस्त रूस से दूरी बना लेगा. म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के ताजा बयानों ने पश्चिमी दुनिया के इस भ्रम को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है. जयशंकर ने अमेरिका को एक ‘तन्हा सुपरपावर’ करार दिया है. इसके साथ ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी स्पष्ट कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड वार्ताएं एक ठहराव पर पहुंच चुकी हैं. यह स्थिति दिखाती है कि भारत अब किसी के दबाव में झुकने वाला नहीं है. नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों और रूस के साथ दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को सबसे ऊपर रखकर आगे बढ़ रही है.

शतरंज के खिलाड़ी वाली कूटनीति से बाहर निकल चुका है नया भारत

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी चर्चित किताब ‘द इंडिया वे’ की शुरुआत सत्यजीत रे की मशहूर फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से की थी. उस फिल्म में अवध के दो नवाब अपनी शतरंज की बाजी में इस कदर डूबे रहते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी उनके पूरे राज्य पर कब्जा कर लेती है. जयशंकर इस प्रसंग के जरिए यह समझाते हैं कि जब दुनिया में उथल-पुथल मची हो, तब खुद में मगन रहना किसी भी देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है.

भारत के जाने-माने रणनीतिकार जसजीत सिंह ने भारतीय नेतृत्व की पुरानी हिचकिचाहट को ‘पानीपत सिंड्रोम’ का नाम दिया था. इसका सीधा मतलब यह था कि जब तक संकट सिर पर न आ जाए, तब तक भारतीय नीतियां सिर्फ रक्षात्मक बनी रहती थीं.

आज भारत की विदेश नीति ने उस पुराने पानीपत सिंड्रोम को उखाड़ फेंका है. भारत अब विदेशी ताकतों की चालों का इंतजार नहीं करता, बल्कि अपनी चाल खुद तय करता है. पश्चिम की सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि वह पूरी दुनिया को अपने चश्मे से देखने का आदी रहा है. पश्चिमी देश चाहते थे कि यूक्रेन संकट के बहाने भारत भी मॉस्को से अपने सारे रिश्ते तोड़ ले. नई दिल्ली ने इस दबाव को नकारते हुए यह साबित कर दिया कि भारत अब किसी भी देश का पिछलग्गू बनकर नहीं रहेगा.

अमेरिका की धरती पर जयशंकर ने ‘डोंट फॉरगेट’ कहकर कौन सा इतिहास याद दिलाया?

म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान एस. जयशंकर ने दुनिया के सामने भारत और रूस के संबंधों की हकीकत बयां की. उन्होंने दो-टूक कहा कि दोनों देशों के बीच 1950 के दशक से ही बेहद मजबूत रिश्ते रहे हैं और उस इतिहास को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

यह बयान उन पश्चिमी देशों के चेहरे पर तमाचा था, जो भारत को इतिहास भूलने की नसीहत दे रहे थे.

  1. जयशंकर ने याद दिलाया कि जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा खतरा मंडरा रहा था, तब सोवियत संघ भारत के साथ चट्टान की तरह खड़ा था. उस दौर में अमेरिका और पश्चिमी देश भारत के पड़ोस में एक फौजी तानाशाही को खाद-पानी दे रहे थे.
  2. साल 1971 के मुक्ति संग्राम को कोई भी भारतीय कभी नहीं भूल सकता. उस वक्त अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना सातवां नौसैनिक बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था. अगर उस कठिन घड़ी में मॉस्को ने अपनी न्यूक्लियर सबमरीन न भेजी होती, तो आज उपमहाद्वीप का इतिहास कुछ और होता.
  3. कश्मीर के मुद्दे पर जब भी पश्चिमी देशों ने संयुक्त राष्ट्र में भारत को घेरने की कोशिश की, सोवियत वीटो ने हमेशा भारत की ढाल बनकर काम किया. इतिहास गवाह है कि संकट के समय रूस ने कभी भारत का साथ नहीं छोड़ा, जबकि अमेरिका ने हमेशा अपने स्वार्थ को प्राथमिकता दी.

वॉशिंगटन का पाखंड और कच्चे तेल का दोहरा खेल अब बेनकाब हो चुका है

विदेश मंत्री ने फिनलैंड के अपने भाषण में अमेरिकी पाखंड की धज्जियां उड़ा कर रख दी थीं. जब यूक्रेन का युद्ध शुरू हुआ, तब वॉशिंगटन खुद चाहता था कि भारत रूस से डिस्काउंटेड क्रूड ऑयल खरीदे ताकि ग्लोबल एनर्जी मार्केट में स्थिरता बनी रहे. अमेरिका को डर था कि अगर रूसी तेल बाजार से बाहर हो गया, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी.

जब भारत ने अपनी जनता की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर रूसी तेल का आयात बढ़ाया, तब उसी अमेरिका ने भारत पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. पश्चिमी मीडिया और वॉशिंगटन के नेताओं ने भारत पर प्रतिबंधों के उल्लंघन का आरोप लगाना शुरू कर दिया.

रूस से दोस्ती और अमेरिका की कमियों पर जयशंकर की दो टूक. (File Photo : PTI)

जयशंकर ने इस दोहरे चरित्र पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा था कि इसमें किसी बड़े नैतिक सिद्धांत का दिखावा बंद होना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ अपनी सहूलियत का खेल है, जब आपको फायदा हो तो सही और जब न हो तो गलत. जयशंकर ने साफ कहा कि हम सभी समझदार लोग हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि असली खेल क्या चल रहा है. इस साफगोई ने वॉशिंगटन की बोलती बंद कर दी. भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि 140 करोड़ भारतीयों के चूल्हे सस्ते ईंधन से जलेंगे, न कि पश्चिमी देशों के खोखले बयानों से.

‘ट्रेड वार्ताओं के ठहराव के बीच अमेरिका एक तन्हा महाशक्ति बन रहा’

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह कहना कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएं अब एक ठहराव पर आ चुकी हैं, गहरे संकेत देता है. डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की नीतियां पहले से ज्यादा लेन-देन वाली और अप्रत्याशित हो चुकी हैं. अमेरिका आज अपने आर्थिक प्रभाव और डॉलर की ताकत को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है.

वह अपने सहयोगियों पर मनमाने टैरिफ थोपता है और फिर उनसे पूरी तरह सरेंडर करने की उम्मीद रखता है. इसी व्यवहार के चलते अमेरिका आज वैश्विक मंच पर एक तन्हा महाशक्ति बनता जा रहा है. जिस नियम-आधारित व्यवस्था की वकालत कभी वॉशिंगटन खुद करता था, आज वह उसी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहा है.

दूसरी तरफ यूरोप का रुख देखिए, जिसने शुरुआती तल्खी के बाद अपनी सोच में बदलाव किया है. भारत ने यूरोप को साफ आईना दिखाया था कि उसकी समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं नहीं हो सकतीं. यूरोप ने धीरे-धीरे भारत की अहमियत को समझा और नई दिल्ली के साथ रक्षा और सुरक्षा समझौतों को आगे बढ़ाया. इसके उलट अमेरिका अपनी उसी पुरानी और अड़ियल मानसिकता में जकड़ा हुआ है. नतीजा यह है कि भारत अब अमेरिका की इस अस्थिरता को भांपकर अपनी रणनीतियों को नए सिरे से तैयार कर रहा है.

रक्षा तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा में रूस के बिना भारत का काम चलना फिलहाल नामुमकिन!

भारत और रूस का रिश्ता आज की सबसे बड़ी सामरिक जरूरत है. दोनों देशों के बीच का मिलिट्री और टेक्निकल सहयोग इतना गहरा है कि उसकी जगह कोई भी पश्चिमी देश नहीं ले सकता.

  • अमेरिका भारत को हमेशा सिर्फ एक खरीदार की तरह देखता है. वह पुरानी तकनीक महंगे दामों पर बेचना चाहता है और उस पर कड़ी शर्तें भी लगाता है. इसके बिल्कुल उलट, रूस ने भारत के साथ हमेशा असली तकनीक साझा की है. ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल का साझा प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
  • एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के सौदे के वक्त अमेरिका ने भारत पर सीएएटीएसए प्रतिबंध लगाने की धमकियां दी थीं. भारत ने उन धमकियों को रद्दी की टोकरी में डालते हुए रूस से यह मिसाइल सिस्टम खरीदा. आज इसी सिस्टम की बदौलत भारत का एयरस्पेस पूरी तरह सुरक्षित है. भारतीय नौसेना को न्यूक्लियर सबमरीन लीज पर देने वाला दुनिया में अकेला देश रूस ही रहा है. सुखोई-30 लड़ाकू विमान और टी-90 टैंक आज भी भारतीय सेना की रीढ़ बने हुए हैं.
  • तमिलनाडु में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट रूस के सहयोग से ही लगातार बिजली पैदा कर रहा है. जब भारत पर पश्चिमी देशों के कड़े परमाणु प्रतिबंध लगे थे, तब भी रूस ने भारत के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को जिंदा रखा था. स्पेस रिसर्च और क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन की तकनीक में भी मॉस्को ने हमेशा भारत का हाथ थामा है. ऐसे में रूस से दूर जाने का मतलब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना होगा.

पश्चिमी विश्लेषक अक्सर यह कुतर्क देते हैं कि रूस अब पूरी तरह चीन पर निर्भर हो चुका है, इसलिए भारत को उससे किनारा कर लेना चाहिए. यह सोच पूरी तरह बचकानी और जमीनी हकीकत से कोसों दूर है.

सच्चाई यह है कि अगर भारत रूस से अपने संबंध तोड़ लेता है, तो रूस के पास चीन की गोद में बैठने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा. यूरेशिया के पूरे इलाके में मॉस्को और बीजिंग का एकाधिकार हो जाएगा, जो सीधे तौर पर भारत के सामरिक हितों को चोट पहुंचाएगा.

भारत की रूस में मजबूत मौजूदगी ही चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकती है. रूस खुद भी कभी यह नहीं चाहेगा कि वह पूरी तरह से बीजिंग पर आश्रित हो जाए. मॉस्को नई दिल्ली को एक मजबूत और स्वतंत्र ग्लोबल पावर के रूप में देखता है. इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री रूट जैसी परियोजनाएं इस बात का सबूत हैं कि दोनों देश मिलकर एक नया आर्थिक नक्शा तैयार कर रहे हैं. यह साझेदारी यूरेशियाई संतुलन को बनाए रखने के लिए सबसे बड़ी गारंटी है.

विदेश मंत्री एस जयशंकर (फाइल फोटो : PTI)

यूक्रेन संकट पर पश्चिमी दबाव को दरकिनार कर भारत रहा निष्पक्ष

यूक्रेन संघर्ष के शुरू होने के बाद से ही पश्चिमी देशों ने भारत पर भारी दबाव बनाया कि वह रूस की सार्वजनिक निंदा करे. भारत ने इस दबाव के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया. भारत का रुख हमेशा यह रहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता और शांति केवल कूटनीति से ही संभव है.

जयशंकर ने म्यूनिख में फिर दोहराया कि भारत दोनों पक्षों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है. भारत ने ब्लैक सी के रास्ते जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, अनाज निर्यात और न्यूक्लियर प्लांट्स की सुरक्षा जैसे बेहद संवेदनशील मसलों पर मध्यस्थता की है.

  • भारत ने साबित कर दिया कि वह किसी पश्चिमी कैंप का मोहरा नहीं है. भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के दम पर एक सच्चा शांतिदूत बनकर उभरा है. मॉस्को ने भी भारत की इस निष्पक्ष और संतुलित भूमिका का हमेशा सम्मान किया है. भारत ने न केवल अपनी तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखा, बल्कि अपनी संप्रभुता का परचम भी पूरी दुनिया में लहराया.
  • कूटनीति की दुनिया में एक पुरानी कहावत है कि वक्त बदलने पर साथी भी बदल जाते हैं. भारत और रूस का रिश्ता इस कहावत का सबसे बड़ा अपवाद है. शीत युद्ध के दौर से लेकर आज की मल्टीपोलर दुनिया तक, इस दोस्ती ने हर बड़े इम्तिहान को पास किया है.
  • अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन वे हमेशा अमेरिकी घरेलू राजनीति और ट्रंप जैसे नेताओं की सनक के शिकार रहेंगे. वहां आज जो समझौता होता है, कल नई सरकार आने पर उसे रद्दी का टुकड़ा बना दिया जाता है.

भारत अब शतरंज की बिसात पर मोहरा नहीं, बल्कि बाजी पलटने वाला वजीर बन चुका है. इस बिसात पर रूस भारत का वह परखा हुआ साथी है, जिसके दम पर भारत आने वाले दशकों में दुनिया की महाशक्ति बनने की राह पर बेखौफ आगे बढ़ रहा है.



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