DIG की क‍िस करतूत ने उसे बना डाला ‘कैदी’, 4 साल धूल फांक रही एक श‍िकायत पर कैसे हो गया ‘खेल’

DIG की क‍िस करतूत ने उसे बना डाला ‘कैदी’, 4 साल धूल फांक रही एक श‍िकायत पर कैसे हो गया ‘खेल’


सौम्या कलासा

बेंगलुरु: एक डीआईजी ज‍िसका काम था कैद‍ियों पर नजर रखना और उनके भले के ल‍िएक काम करना था लेक‍िन उसकी एक करतूत ने ही उसे सलाखों के पीछे पहुंचा द‍िया है. असल में डीआईजी ने एक उम्रकैद की सजा पाने वाले कैदी को जेल से पहले ही र‍िहा कर द‍िया. इस कैदी को सलाखों के पीछे होना चाह‍िए था लेक‍िन वह करीब 8 साल से जेल से बाहर था. जब इस मामले की जांच हुई तो पाया क‍ि कर्नाटक जेल विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी (DIG) इस पूरे मामले के पीछे है ज‍िसके बाद पुल‍िस ने आरोपी डीआईजी को अरेस्‍ट कर ल‍िया है. डीआईजी पर आरोप है क‍ि उसने सुप्रीम कोर्ट के एक फर्जी आदेश पर के आधार पर उस कैदी को जेल से बाहर निकाल द‍िया था.

इस मामले में अब एम.सोमशेखर को गिरफ्तार किया गया है. वह फिलहाल कलबुर्गी में डीआईजी ऑफ प्रिजन्स के पद पर तैनात हैं. हालांकि, जब कैदी शंकर अराध्या को नवंबर 2018 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल से रिहा किया गया था, तब सोमशेखर जेल के चीफ सुपरिंटेंडेंट थे.

2018 में जेल से बाहर आया उम्रकैद का कैदी
शंकर अराध्या को बेंगलुरु के चिकपेट पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में नाबालिग बच्चे के अपहरण और फिरौती के लिए हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. जुलाई 2004 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. इसके बावजूद 13 नवंबर 2018 को शंकर जेल से बाहर आ गया. उसकी रिहाई के लिए एक ऐसा दस्तावेज पेश किया गया,जिसे सुप्रीम कोर्ट का आदेश बताया गया था. पुलिस का आरोप है कि यह आदेश असली नहीं था और इसे फर्जी तरीके से तैयार किया गया था.

फर्जी आदेश किसने बनाया?
जांच के मुताबिक, उस समय जेल के कन्विक्ट प्रिजनर सेक्शन में सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के तौर पर काम करने वाले श्रीकांत एस. ने कथित तौर पर यह फर्जी दस्तावेज तैयार किया था. इस दस्तावेज पर 2 नवंबर 2018 की तारीख थी और महज 11 दिन बाद शंकर को जेल से बाहर कर दिया गया. पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी दस्तावेज जेल तक कैसे पहुंचा और उसे सत्यापित किए बिना रिहाई की प्रक्रिया कैसे पूरी हो गई.

4 साल तक पड़ी रही शिकायत
इस पूरे मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया, जब जेल विभाग के अंदर से ही शिकायत सामने आई. पुलिस के मुताबिक, एक व्यक्ति ने शिकायत कर आरोप लगाया था कि शंकर को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जेल से रिहा किया गया है. लेकिन यह शिकायत करीब चार साल तक लंबित रही. बाद में प्रिजन एंड करेक्शनल सर्विसेज के DGP आलोक कुमार के पद संभालने के बाद इस शिकायत की जांच शुरू हुई. जांच के बाद बेंगलुरु सेंट्रल जेल के प्रभारी सुपरिंटेंडेंट ने 20 मई 2026 को परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई. यहीं से करीब आठ साल पुरानी रिहाई का मामला फिर से खुल गया.

जांच आगे बढ़ी तो शंकर भी पकड़ में आया
पुलिस के अनुसार, जेल से निकलने के बाद शंकर पहले बेंगलुरु में रहा और बाद में मैसूरु चला गया. उसे आखिरकार जुलाई 2026 में गिरफ्तार कर लिया गया. फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश तैयार करने के आरोप में श्रीकांत को भी गिरफ्तार किया गया. शंकर की पत्नी को भी इस मामले में गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.

अब DIG सोमशेखर पर जांच की आंच
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, पुलिस की नजर उस समय जेल के चीफ सुपरिंटेंडेंट रहे एम. सोमशेखर पर भी गई. पुलिस के मुताबिक, 2018 में जेल के कन्विक्ट प्रिजनर सेक्शन में काम करने वाले कर्मचारियों के बयान से संकेत मिला कि शंकर की रिहाई सोमशेखर के निर्देश पर हुई थी. जांचकर्ता अब यह पता लगा रहे हैं कि क्या उन्हें दस्तावेजों में मौजूद गड़बड़ियों की जानकारी थी और इसके बावजूद उन्होंने रिहाई की अनुमति दी थी.
सोमशेखर को 4 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया और उन्हें 9 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजा गया है.

शंकर को पहले भी मिलती थी ‘मेहरबानी’?
पुलिस जांच में शंकर को लेकर कुछ और सवाल भी सामने आए हैं. पुलिस के अनुसार, वह पहले पैरोल के दौरान फरार हो चुका था. इसके बावजूद 2018 में उसे तीन बार 15-15 दिन की पैरोल मंजूर की गई. जांचकर्ताओं ने इस बात को भी जांच के दायरे में रखा है कि जेल कर्मचारियों की ओर से उसकी पात्रता को लेकर प्रतिकूल टिप्पणियां होने के बावजूद उसे पैरोल कैसे मिली. एक फोन नंबर की कथित जांच भी पुलिस के रडार पर है. रिकॉर्ड के अनुसार, शंकर की जानकारी सत्यापित करने के दौरान सोमशेखर ने एक ऐसे नंबर पर संपर्क किया था, जिसे चंद्रा लेआउट पुलिस स्टेशन का बताया गया था. जांच में पुलिस को पता चला कि वह नंबर उस थाने का नहीं था.

अब सामने हैं कई बड़े सवाल
इस मामले में पुलिस अब पूरी कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रही है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुप्रीम कोर्ट का फर्जी आदेश जेल प्रशासन तक कैसे पहुंचा और उसकी सही तरीके से जांच किए बिना उम्रकैद के कैदी को जेल से बाहर कैसे जाने दिया गया. जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने से लेकर उसे जेल में इस्तेमाल करने और रिहाई की मंजूरी तक कौन-कौन लोग इस पूरी प्रक्रिया में शामिल थे. फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और मामले में सामने आए आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगी.

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