डिप्लोमेसी में दोस्ती हमेशा अपने इंट्रेस्ट के हिसाब से चलती है. अब साउथ कोरिया को ही ले लीजिए. साउथ कोरिया अमेरिका का पार्टनर है. यूक्रेन जंग में वह हमेशा पश्चिमी देशों के साथ खड़ा दिखा. रूस को कोसता रहा. लेकिन अब वही साउथ कोरिया रूस को डीजल सप्लाई कर रहा है. द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई और अगस्त 2026 में साउथ कोरिया के पोर्ट से रूस को 1.76 लाख टन से ज्यादा फ्यूल भेजा गया. इसमें ज्यादातर डीजल था. खास बात, इस माल को रूस ले जाने वाले सात टैंकरों में से तीन ऐसे थे, जिन पर ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन ने प्रतिबंध लगा रखा है.
गार्जियन ने बंदरगाहों के रिकॉर्ड और जहाजों की आवाजाही के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इसके मुताबिक जुलाई-अगस्त में सात टैंकरों ने साउथ कोरिया और रूस के बीच 14 बार ट्रैवल किया. साउथ कोरिया के कई बंदरगाहों से इन जहाजों पर 1.76 लाख टन से ज्यादा फ्यूल लादा गया और फिर इसे रूस के पूर्वी इलाकों तक पहुंचाया गया. रूस के व्लादिवोस्तोक जैसे बंदरगाहों पर सप्लाई की गई.
सबसे ज्यादा चर्चा Layla नाम के टैंकर की है. इस जहाज पर पश्चिमी देशों ने पाबंदियां लगा रखी हैं. लेकिन यह साउथ कोरिया के उल्सान पोर्ट से रूस के व्लादिवोस्तोक तक दो बार गया. करीब 57 हजार टन डीजल इसमें भरकर ले जाया गया. दिलचस्प बात यह है कि दूसरी यात्रा में जहाज ने साउथ कोरियाई अधिकारियों को अपनी मंजिल जापान के निगाता बंदरगाह की बताई, लेकिन बाद में वह रूस के व्लादिवोस्तोक पहुंचा.
एक जहाज ने जापान बताया, पहुंच गया रूस
दूसरा मामला Astoria टैंकर का है. इस रूसी झंडे वाले जहाज पर भी ऑस्ट्रेलिया समेत कुछ देशों के प्रतिबंध हैं. इसने 1 अगस्त को साउथ कोरिया के उल्सान से करीब 11 हजार टन फ्यूल लादा. रिकॉर्ड में इसकी मंजिल जापान बताई गई, लेकिन जहाज बाद में व्लादिवोस्तोक पहुंच गया.
तीसरा मामला Chongchon का है. यह जहाज साउथ कोरिया के किसी बंदरगाह में गया ही नहीं. उसने साउथ कोरिया के योसु बंदरगाह के पास समुद्र में दूसरे जहाज से करीब 26 हजार टन फ्यूल लिया. इसके बाद वह रूस की तरफ चला गया. यानी फ्यूल को एक जहाज से दूसरे जहाज में ट्रांसफर किया गया. ऐसे ट्रांसफर से माल की असली उत्पत्ति और उसकी आवाजाही को ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है.
रूस को अचानक इतनी जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल, रूस की अपनी रिफाइनरियां इस समय दबाव में हैं. यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस की कई रिफाइनरियों का काम प्रभावित हुआ है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक जून में रूस का रिफाइनरी उत्पादन 20 साल से ज्यादा समय के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. इसी दौरान रूस का डीजल उत्पादन सालाना आधार पर करीब 30% कम रहा. यानी रूस के पास कच्चा तेल होने के बावजूद उसे उससे बनने वाले तैयार पेट्रोलियम उत्पादों, खासकर डीजल, की कमी का सामना करना पड़ा. ऐसे में उसे बाहर से फ्यूल मंगाना पड़ा.
अगस्त में भारत के बाद सबसे बड़ा सप्लायर बना साउथ कोरिया
इसका असर रूस के आयात के आंकड़ों में भी दिखा. Kpler के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में रूस ने समुद्र के रास्ते करीब 3.68 लाख टन पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए. यह जुलाई के मुकाबले सात गुने से ज्यादा था और यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद किसी एक महीने में सबसे ज्यादा आयात बताया गया है. इसमें अकेले दक्षिण कोरिया ने करीब 1.12 लाख टन, यानी लगभग 31% फ्यूल दिया. इस मामले में वह भारत के बाद रूस का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री सप्लायर रहा.
सांकेतिक तस्वीर
फिर भी दक्षिण कोरिया का कानून नहीं टूटा?
गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, इन फ्यूल शिपमेंट से साउथ कोरिया के अपने कानून का उल्लंघन होता हुआ दिखाई नहीं देता. साउथ कोरिया ने रूस पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, उनका बड़ा हिस्सा औद्योगिक मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहनों जैसे सामान पर लागू होता है. फ्यूल निर्यात उसी तरह प्रतिबंधित नहीं है.
साउथ कोरिया ने कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध खत्म करने की कोशिशों का समर्थन करता है और अपने निर्यात नियंत्रणों को सख्ती से लागू कर रहा है. लेकिन पश्चिमी देशों के प्रतिबंध वाले जहाजों का उसके बंदरगाहों से फ्यूल लेकर रूस पहुंचना सवाल जरूर खड़े करता है.