क्या उपेंद्र कुशवाहा के लिए ममता बनर्जी के ‘ऋतब्रत’ बनने जा रहे हैं माधव आनंद? रालोमो में सियासी उल्टाबाजी के संकेत मिल रहे

क्या उपेंद्र कुशवाहा के लिए ममता बनर्जी के ‘ऋतब्रत’ बनने जा रहे हैं माधव आनंद? रालोमो में सियासी उल्टाबाजी के संकेत मिल रहे


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RLM Rift Upendra Kushwaha vs Madhav Anand: क्या उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में माधव आनंद वही भूमिका निभाने की ओर बढ़ रहे हैं, जैसी कभी ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी में निभाई थी? यानी पार्टी के भीतर रहते हुए नेतृत्व के फैसलों पर सवाल, विधायकों और संगठन के एक हिस्से को साथ लाना और खुद अलग धुरी बनाने की कोशिश! बिहार में राष्ट्रीय लोक मोर्चा को लेकर ऐसा ही राजनीतिक दृश्य उभरने के संकेत मिल रहे हैं. आखिर माधव आनंद के इस बयान का क्या मतलब निकाला जाए कि- चार में से तीन विधायक एकसाथ तो टूट कैसी?

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रालोमो विधायक दल के नेता माधव आनंद और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा.

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी चुनाव में रालोमो के चार में से तीन विधायक- विधायक दल के नेता माधव आनंद,प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह और बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो- निर्दलीय उम्मीदवार रामपुकार सिन्हा के समर्थन में खड़े हैं. रामपुकार सिन्हा रालोमो के पुराने नेता हैं और उन्होंने एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार जेडीयू के आनंद पुष्कर के खिलाफ नामांकन किया है. माधव आनंद ने इस समर्थन को पार्टी से अलग होने का कदम मानने से साफ इनकार किया है. अब उनका तर्क है कि चार में से तीन विधायक एक साथ हैं, इसलिए इसे पार्टी में टूट कैसे कहा जा सकता है? दरअसल, यह कुछ कुछ ऐसा राजनीतिक दृश्य बन रहा है जैसा कुछ महीने पहले पश्चिम बंगाल में उभरा था जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में राजनीतिक भूचाल आया और ऋतब्रत बनर्जी ने बागी गुट बनाकर टीएमसी पार्टी पर ही अपनी दावेदारी पेश कर दी थी. ऐसे में सवाल यह कि क्या माधव आनंद अब उपेंद्र कुशवाहा के लिए ममता बनर्जी के ऋतब्रत बनर्जी बनने जा रहे हैं?

दरअसल, राष्ट्रीय लोक मोर्चा में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पार्टी टूट रही है या नहीं, बल्कि यह है कि आखिर पार्टी का मतलब किससे है? उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, लेकिन विधान परिषद चुनाव में पार्टी के चार में से तीन विधायक एक तरफ खड़े दिखाई दे रहे हैं. उनके विधायक दल के नेता माधव आनंद इस एकजुटता को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि साफ कहते हैं- “चार में से तीन विधायक एक साथ हैं, तो टूट कैसी?” उनका यही रुख रालोमो के मौजूदा सियासी घमासान का सबसे बड़ा राजनीतिक उलट-पलट का संकेत बन गई है. यानी माधव आनंद के बयान में सिर्फ पार्टी की टूट से इनकार नहीं है, बल्कि इसके पीछे यह संदेश भी पढ़ा जा रहा है कि पार्टी के भीतर संख्या बल किसके साथ है, यह बताना भी जरूरी है.

रालोमो के चार में से तीन विधायक- विधायक दल के नेता माधव आनंद, प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह और बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो- निर्दलीय उम्मीदवार रामपुकार सिन्हा के समर्थन में.

माधव आनंद का असली सियासी संदेश क्या है?

हालांकि, राजनीति की बारीकियों को समझें तो माधव आनंद सीधे उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ खड़े होने की बात नहीं कर रहे हैं. वह लगातार कह रहे हैं कि उपेंद्र कुशवाहा का सम्मान करते हैं और उनकी कोई निजी लड़ाई नहीं है. लेकिन उनकी बातों में पार्टी के भीतर नेतृत्व के फैसलों को लेकर असहमति साफ दिखाई देती है. वह कहते हैं कि शीर्ष नेतृत्व के कुछ फैसलों से कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना पैदा हुई और कई नेता-कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए. अब वह कार्यकर्ताओं का मान-सम्मान वापस दिलाने और पार्टी को फिर से मजबूत करने की बात कर रहे हैं. ऐसे में अब यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि माधव आनंद किस उम्मीदवार के साथ हैं. सवाल यह है कि क्या वह रालोमो के भीतर एक ऐसी धुरी खड़ी कर रहे हैं, जो पार्टी के फैसलों पर अपना दावा पेश कर सके?

रालोमो में पार्टी अध्यक्ष बनाम विधायकों का बहुमत

किसी पार्टी की औपचारिक कमान उसके अध्यक्ष के पास होती है, लेकिन विधायक दल के भीतर बहुमत भी अपनी अलग राजनीतिक ताकत रखता है. रालोमो के मामले में फिलहाल तस्वीर दिलचस्प है. पार्टी के चार विधायक हैं और उनमें से तीन एक ही राजनीतिक फैसले के साथ खड़े हैं. चौथी विधायक उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता हैं. ऐसे में माधव आनंद का “चार में से तीन” वाला तर्क सिर्फ संख्या बताने तक सीमित नहीं है. इसे इस संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है कि अगर पार्टी के भीतर बहुमत हमारे साथ है तो हमें अलग गुट क्यों माना जाए?

रालोमो के तीन विधायक पहले भी हुए थे नाराज

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब रालोमो में कुशवाहा और तीन विधायकों के बीच दूरी की चर्चा हुई हो. विधानसभा चुनाव के बाद जब एनडीए सरकार बनी थी, तब उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को रालोमो कोटे से मंत्री बनाया था. उस समय पार्टी के चार में से तीन विधायकों के नाराज होने और कुशवाहा से दूरी बनाने बात सुर्खियों में थी. हालांकि, बाद में संगठन में संतुलन बनाने की कोशिश हुई. माधव आनंद को विधायक दल का नेता और आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. उस समय माना गया कि पार्टी के भीतर पैदा हुआ असंतोष संभाल लिया गया है. लेकिन अब वही तीन विधायक एक बार फिर एक साथ दिखाई दे रहे हैं.

उपेंद्र कुशवाहा के सामने असली राजनीतिक चुनौती क्या?

हालांकि, पिछली बार की तुलना में इस बार फर्क यह है कि इस बार माधव आनंद की भाषा पहले से ज्यादा राजनीतिक है. वह सिर्फ किसी फैसले का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि कार्यकर्ताओं के सम्मान और पार्टी को “फिर से एकजुट” करने की बात कर रहे हैं. फिलहाल न तो माधव आनंद ने पार्टी छोड़ने की बात कही है और न तीनों विधायकों ने अलग दल या अलग गुट बनाने का ऐलान किया है. इसलिए इसे सीधे रालोमो की टूट कहना सही नहीं होगा. लेकिन दूसरी तरफ इसे केवल एमएलसी चुनाव तक सीमित कर देना भी मुश्किल है. क्योंकि माधव आनंद का “तीन विधायक हमारे साथ हैं तो टूट कैसी” वाला बयान पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन की बहस को सामने ला चुका है.



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