पटना. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू की ऐसी हालत कभी नहीं रही. जेडीयू के स्थापना काल से ही पार्टी पर नीतीश कुमार का एकाधिकार रहा. उनके अलावा पार्टी के नेताओं को बोलने का कभी अधिकार नहीं मिला. क्षेत्रीय पार्टियों में जेडीयू इसी वजह से अलग माना जाता था. सांसद-विधायक से लेकर संगठन से जुड़े तमाम नेता वहीं बोलते, जो नीतीश की लाइन होती. गजब का दलीय अनुशासन होता था. ऐसा अनुशासन राष्ट्रीय पार्टियों में भी भाजपा को छोड़ किसी में नहीं था. पर, अब जेडीयू की स्थिति वैसी नहीं रही. खासकर, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री छोड़ कर राज्यसभा जाने के फैसले के बाद से यह हाल हुआ है.
नीतीश की उम्र और सेहत का असर
सच तो यही है कि पहले नीतीश कुमार पार्टी की गतिविधियों को लेकर पहले जितने सक्रिय रहते थे, अब वैसी बात नहीं रही. यह इसी से साफ हो जाता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के बावजूद जेडीू में कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की जरूरत पड़ी. नीतीश ने राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बना कर तमाम तरह के फैसलों की जवाबदेही उन्हें सौंप दी. हालांकि नीतीश कुमार के इस फैसले का कोई नकारात्मक प्रभाव पार्टी पर नहीं प़ड़ा. संजय झा ने एनडीए का नेतृत्व रने वाली पार्टी भाजपा के साथ न सिर्फ बेहतर तालमेल स्थापित किया, बल्कि पार्टीह हित को भी सर्वोपरि रखा. 29 जू2024 को संजय झा कोकर्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. तब यह माना गया कि बिहार का सीएम रहने के कारण दोहरी जिम्मेवारी वे निभाना उनके लिए संभव नहीं है. पर, नीतीश पहले भी सीएम के साथ पार्टी के अध्यक्ष रहे, लेकिन उन्हें कभी कार्यकारी अध्यक्ष की जरूरत महसूस नहीं हुई.
संजय झा कभी सर्वस्वीकार्य नहीं रहे
यह भी सच है कि संजय झा की नियुक्ति को जेडीयू के नेताओं ने कभी खुले मन से कबूल नहीं किया. पर, उनकी नियुक्ति नीतीश कुमार ने की थी, इसलिए अपनी असहजता लोगों को मन मेंही छिपा कर रखनी पड़ी. नीतीश कुमार के सीएम पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने के पीछे जेडीयू में संजय विरोधी नेताओं ने उनकी कुटिल चाल मानी. कभी खुल कर तो कभी दबी जुबान उनकी आलोचना होने लगी. इसका मुखर रूप तब सामने आया, जब जेडीयू के गुस्साए नेताओं और समर्थकों ने पार्टी दप्तर में तोड़-फोड़ की और संजय झा के साथ केंद्रीय मंत्री ललन सिं के खिलाफ नारेबाजी की. चूंकि जेडीयू का जनाधार लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) वोटरों पर टिका है, इसलिए संजयझा निशाने पर रहे. नीतीश कुमार ने भी यह सब देखा-जाना, लेकिन खामोश रहे.
पहले छोटन सिंह ने अनुशासन तोड़ा
जेडीयू में अनुशासन तोड़ने की शुरुआत अरवंद कुमार सिंह उर्फ छोटन सिंह से हुई. वे पार्टी के पूर्व महासचिव रह चुके थे. उनकी दल विरोधी गतिविधियों से तंग आकर आखिरकार उन्हें 6 साल के लिए प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी से निष्कासित कर दिया. छोटन सिंह की नाराजगी यह थी कि नीतीश कुमार के करीब होने के बावजूद उन्हें संगठन में कोई जिम्मेवारी नहीं मली थी. इससे खफा होकर वे राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के आवास पर पहुंचे. वहां उनकी जेडीयू के बड़े नेताओं से तीखी बहस भी हुई. वे पार्टी विरोधी बानबाजी भी करने लगे थे. दलीय कार्यक्रमों से भी उन्होंने दूरी बना ली. आखिरकार पार्टी ने उनकी इन हरकतों से आजिज आकर निष्कासन जैसे कड़े फैसले का रास्ता अपनाया.
आनंद मोहन ने खूब हड़बोंग मचाया
पूर्व सांसद आनंद मोहन भले जेडीयू के आधिकारिक नेता नहीं हैं, लेकिन उनके बेटे चेतन आनंद और पत्नी लवली आनंद जेडीयू के टिकट पर ही चुनाव जीते हैं. लवली सांसद हैं तो चेतन विधायक बने हैं. चेतन आनंद को कैबिनेट में मंत्री पद न मिलने से आनंद मोहन इतने खफा हुए कि उन्होंने जेडीयू के खिलाफ हल्ला बोल के अंदाज में बयानबाजी शुरू कर दी. यहां तक कि उन्होंने विधानसबा चुनाव में टिकट बेचने का आरोप तक लगा दिया. उन्होंने सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर के कार्यक्रमों में आरोप लगाया कि जेडीयू में अब योग्यता की जगह पैसों का बोलबाला है. करोड़ों रुपए लेकर पहले टिकट और बाद में मंत्री पद बेचे गए हैं. उनके इन आरोपों पर जेडीयू कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें पुत्र मोह में अंधा यानी धृतराष्ट्र तक बता दिया. आनंद मोहन का गुस्सा अब भी बरकरार है, लेकिन जेडीयू ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई इसलिए की क वे पार्टी के आधिकारिक सदस्य ही नहीं हैं. अलबत्ता नीतीश कुमार की कृपा से उन्हें जेल से आजादी जरूर मिली है.
अनंत सिंह का दल विरोधी आचरण
पटना स्नातक क्षेत्र से जेडीयू के एमएलसी प्रत्याशी नीरज कुमार के खिलाफ विधायक अनंत सिंह की बगावत पार्टी के भीतर नया बखेड़ा है. जेडीयू का होते हुए भी अनंत सिंह जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी की मदद कर रहे हैं. उसके लिए यात्राएं निकाल कर रहे, प्रचार कर रहे और कूटनीतिक तौर पर नीतीश और उनके मंत्री बेटे निशांत का नाम भी ले रहे. यानी जल में रह कर मगरमच्छ से बैर. यह ानते हुए भी नीतीश कुमार ने ही अपने हाथों नीरज कुमार को उम्मीदवारी का सिंबल दिया है. उनके समर्थन में पूरा एनडीए खड़ा है. अनंत सिंह का यह आचरण सीधे-सीधे नीतीश कुमार के फैसले को चुनौती है. इससे जेडीयू की अंदरूनी स्थिति को समझा जा सकता है. यह भी कि नीतीश कुमार के तेवर और दबदबा पहले जैसा नहीं रहा. पार्टी में असहमति के कारण जार्ज फर्नांडीस और शरद यादव जैसे जेडीयू के संस्थापक सदस्यों को नीतीश कुमार ने झटके में किनारे कर दिया था. पर, अनंत सिंह पर अभी तक उन्होंने चुप्पी साध रखी है. जेडीयू के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद अनंत सिंह को भी किनारे लगाया जा सकता है.
JDU में पहले जैसी एकता बची कहां?
जेडीयू की अंदरूनी स्थिति अब उजागर होने लगी है. उम्र और सेहत की वजह से नीतीश कुमार पहले जैसे प्रभावशाली नहीं रहे. यह अलग बात है कि जेडीयू बिहार में विधायकों-सांसदों के मामले में भाजपा के बराबर दिखती है, लेकिन लगातार टूट रहा अनुशासन उसे कहां ले जाकर खड़ा करेगा, समझना मुश्किल नहीं है. संजय झा पार्टी का नाम जेडीयू (जनता दल- यूनाइटेड) से बदल कर जनतादल- नीतीश करने का प्रस्ताव दे चुके हैं. इस पर भी आम सहमति नहीं बन पा रही है. लव-कुश समीकरण के आधार वाला जेडीयू में इस वर्ग के नेताओं को तवज्जो न मिलना भी पार्टी के भीतर असंतोष का कारण बन रहा है. पार्टी फिलवक्त राष्ट्रीय स्तर पर संजय झा और ललन सिंह के कब्जे में है तो राज्य स्तर पर विजय चौधरी जैसे नेता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. नीतीश इनकी सलाह के बगैर कोई निर्णय नहीं लेते. बार-बार कोशिश के बावजूद आरसीपी सिंह की वापसी में अवरोध, मनीश वर्मा का नेपथ्य में जाना और लव-कुश समाज की अपेक्षा के अनुरूप निशांत को सीएम या डेप्युटी सीएम न बनाने के पीछे संजय झा और ललन सिंह को ही जिम्मेवार ठहराने की कोशिश हो रही है. नीतीश खामोश हैं. ऐसे में जेडीयू की स्थिति कहीं से भी अच्छी नहीं दिख रही.