जब पाकिस्तान का उच्चायुक्त बना स्विट्जरलैंड, 6 साल तक इस्लामाबाद का रहा आंख-कान, क्या था मामला?

जब पाकिस्तान का उच्चायुक्त बना स्विट्जरलैंड, 6 साल तक इस्लामाबाद का रहा आंख-कान, क्या था मामला?


स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ परमेलिन भारत दौरे पर हैं. सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण ट्रेड डील साइन हुईं. यह परमेलिन की एक साल में दूसरी भारत यात्रा है. बरसों से भारत और स्विट्जरलैंड के रिश्ते हमेशा मजबूत रहे हैं. मगर क्या आप जानते हैं कि इसी स्विटजरलैंड ने भारत में कभी पाकिस्तान के उच्चायुक्त की भूमिका निभाई थी. एक दो नहीं बल्कि पूरे 6 साल तक वह इस्लामाबाद की आंख और कान बनकर रहा था.

यह 1971 का दौर था, जब भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह खदेड़ दिया था. युद्ध के बाद दोनों देशों ने अपने-अपने राजनयिकों को वापस बुला लिया था. ऐसे में दोनों देशों के बीच पुल का काम स्विट्जरलैंड ने किया था. भारत-पाक के बीच प्रोटेक्टिंग पावर के तौर पर काम करते हुए स्विट्जरलैंड ने बंद पड़े दूतावासों की संपत्तियों और दस्तावेजों की सुरक्षा की थी और फंसे राजनयिकों की सकुशल वापसी की जिम्मेदारी उठाई थी. भारत में वह पाकिस्तान के हाईकमीशन की भूमिका में था, तो पाकिस्तान में भारत के हाईकमीशन की जिम्मेदारी निभा रहा था.

क्या था पूरा मामला?

3 दिसंबर 1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ तो उसके तीन दिन के बाद 6 दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी थी. इसके बाद पाकिस्तान ने भारत से राजनयिक संबंध खत्म करने का फैसला किया. भारत ने भी अपना हाईकमीशन बंद कर दिया. हालांकि राजनयिक संबंध टूटने का यह मतलब कतई नहीं होता कि दूसरे देश की संपत्ति, दस्तावेज और वहां मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए. इसे ही संभालने के लिए प्रोटेक्टिंग पावर की व्यवस्था बनाई गई है.

ये तब एक्टिव होता है जब किन्हीं दो देशों के बीच राजनयिक संबंध टूट जाते हैं, तब तीसरा देश दोनों देशों के हाईकमीशन की देखरेख करता है. उस समय भारत और पाकिस्तान ने इसके लिए स्विट्जरलैंड पर सहमति जताई थी. प्रोटेक्टिंग पावर का प्रावधान सबसे पहले 1949 में जिनेवा कन्वेंशन में हुआ था. इसके बाद 1961 के विएना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेंशस के आर्टिकल 45-46 और 1963 भी इसे तब बेहद जरूरी बताया गया था जब दो देशों के बीच राजनयिक संबंध खत्म हो चुके हों.

क्या करता था स्विट्जरलैंड?

प्रोटेक्टिंग पावर के तौर पर स्विट्जरलैंड ने दोनों देशों में स्थित अपने दूतावास में इंटरेस्ट्स सेक्शन बनाए थे. इस्लामाबाद स्थित स्वित दूतावास में भारत का काम देखा जाता था और दिल्ली स्थित स्विस दूतावास में पाकिस्तान के मामले देखे जाते थे. यानी दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत बंद थी, लेकिन स्विट्जरलैंड के जरिए सूचनाएं यहां से वहां पहुंचाई जा सकती थीं. सबसे बड़ी चुनौती दूतावासों की सुरक्षा को लेकर थी. दरअसल किसी भी दूतावास में महत्वपूर्ण दस्तावेज, सरकारी रिकॉर्ड और संपत्तियां होती हैं. ऐसे में स्विस दूतावास ने दोनों देशों के कमीशन की निगरानी और सुरक्षा की, ताकि जब संबंध दोबारा बहाल हों तो उन्हें दस्तावेज सुरक्षित मिल सके.

स्विट्जरलैंड ने ही निकलवाया था राजनयिक का परिवार

1971 के युद्ध का एक बड़ा मानवीय असर यह भी था कि दोनों देशों के कई राजनयिक और उनके परिवार दूसरे देश में फंस गए थे. कई कर्मचारी निगरानी में थे और उनकी आवाजाही सीमित थी. ऐसे में उनकी सुरक्षित वापसी बेहद मुश्किल थी. स्विट्जरलैंड ने दोनों पक्षों से बातचीत कर राजनयिकों और उनके परिवारों को सुरक्षित बाहर निकाला.

शिमला समझौते में भी थी स्विट्जरलैंड की भूमिका

1971 का युद्ध खत्म होने के बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच कई बड़े सवाल अनसुलझे थे. 1972 में शिमला वार्ता से पहले स्विट्जरलैंड के माध्यम से दोनों देशों के बीच कई तरह के राजनयिक संदेशों को पहुंचाने का काम स्विट्जरलैंड ने ही किया था. 1972 में शिमला में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो की मुलाकात में दोनों देशों में समझौता हुआ था. पाकिस्तानी सेना के सरेंडर के बाद भारत के पास 93 हजार से ज्यादा युद्धबंदी थे. स्विट्जरलैंड ने दोनों देशों के बीच कांसुलर संपर्क बनाए रखने में मदद की थी.

1976 में खत्म हुआ स्विट्जरलैंड का मिशन

धीरे-धीरे भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार आया और जुलाई 1976 में जब दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य हुए तो दोनों देश फिर से हाईकमीशन खोलने पर सहमत हुए. हवाई संपर्क, रेल और सड़क यातायात भी सामान्य किया गया. इसके बाद स्विट्जरलैंड ने दोनों देशों को जिम्मेदारी वापस सौंप दी.



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