Mainpat Hut School: छत्तीसगढ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से 55 किलो की दूरी पर स्थित मैनपाट का नरकट जहा घास फूस से झोपडी तैयार कर नौनिहालों का भविष्य संवारा जा रहा है. इलाका पहाड़ों के बीच बसा है. आसपास के गांव के बच्चे इस झोपडीनुमा स्कूल में पढ़ाई करने आते हैं. 1997 मे शुरु हुआ नरकट में प्राथमिक शाला स्कूल लेकिन आज तक अधेरे में बच्चों का भविष्य आधुनिकता के इस दौर में आपको ऐसी तस्वीर कही देखने को नहीं मिलेगी लेकिन सरगुजा के मैनपाट से निकलती ये तस्वीर बेहद ही शर्मानाक है और शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है कि इतने सालों से आखिर क्यों इन बच्चो का भविष्य अंधेरे में है. यहां बच्चों के लिए न कमरे है, न ही पक्की छत, न ही मध्यान भोजन के लिए रसोई न ही खेल के कोई ग्राउंड यहां तक की बैठने के लिए टेबल तक नहीं है बच्चे जमीन में दरी बिछाकर बैठते हैं. कभी जब हवा पानी आता है तो घास फूस के छप्पर को उड़ा लेता है देखिए ये रिपोर्ट…
बारिश आते ही बढ़ जाती है परेशानी
हेडमास्टर जोहान तिर्की ने Local 18 को बताया कि बरसात के दिनों में सबसे ज्यादा परेशानी होती है. तेज बारिश और आंधी-तूफान में झोपड़ी की छत से पानी टपकने लगता है, चारों तरफ से पानी आने के कारण कमरा गीला हो जाता है. बच्चों के बैठने की दरी भी भीग जाती है और स्कूल का सामान सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाता है.
1997 से नहीं मिला स्कूल को पक्का भवन
हेडमास्टर के मुताबिक, स्कूल जब से शुरू हुआ है, तब से यहां पक्का भवन नहीं है. यानी वर्ष 1997 से ही बच्चे अलग-अलग अस्थायी व्यवस्थाओं में पढ़ते आ रहे हैं. शुरुआती दौर में कच्चे घर और कपड़े की व्यवस्था में कक्षाएं संचालित हुईं. बाद में अंधेरे कमरे में बच्चों को पढ़ाया गया और फिर वर्तमान में नरकट और प्लास्टिक से बनी झोपड़ी में स्कूल संचालित हो रहा है.
हर साल अपने खर्च से करनी पड़ती है मरम्मत
स्कूल की स्थिति ऐसी है कि हर साल बरसात से पहले इसकी मरम्मत करनी पड़ती है. हेडमास्टर ने बताया कि प्लास्टिक खरीदने से लेकर मजदूर लगाने और बल्ली आदि की व्यवस्था करने तक का काम करना पड़ता है. स्कूल खुलने से पहले झोपड़ी को किसी तरह तैयार किया जाता है, ताकि बच्चों को पढ़ाया जा सके.
पढ़ाई के लिए जगह कम, ब्लैकबोर्ड तक की परेशानी
जगह की कमी का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है. हेडमास्टर के अनुसार झोपड़ी में सामान रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है. ब्लैकबोर्ड जैसी बुनियादी चीजों के लिए भी जगह की समस्या होती है. बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाने और अलग-अलग गतिविधियां कराने में दिक्कत आती है. इसके बावजूद शिक्षक अपनी ओर से बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं.
अधिकारियों को कई बार दी गई जानकारी
हेडमास्टर ने बताया कि स्कूल भवन की समस्या के बारे में अधिकारियों को काफी पहले से जानकारी दी जाती रही है. जब भी भवनविहीन स्कूलों की जानकारी मांगी जाती है, स्कूल की स्थिति की जानकारी अधिकारियों को भेजी जाती है. उनके मुताबिक अधिकारियों की ओर से यह बताया गया है कि स्कूल भवन स्वीकृत हो चुका है और बरसात के बाद भवन निर्माण का काम शुरू हो सकता है.
17 बच्चों में मझवार, कोरवा और उरांव समाज के बच्चे
इस स्कूल में फिलहाल कुल 17 बच्चे पढ़ रहे हैं. इनमें ज्यादातर मझवार समाज के बच्चे हैं. इसके अलावा कोरवा और उरांव समाज के बच्चे भी यहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. इन बच्चों के लिए स्कूल की यह झोपड़ी ही पढ़ाई का एकमात्र सहारा बनी हुई है.
न रसोई की पर्याप्त जगह, न बच्चों के लिए सुविधाजनक कक्ष
स्कूल में मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है. भोजन पास के घर में तैयार किया जाता है और फिर बच्चों को स्कूल में लाकर खिलाया जाता है. गर्मी के मौसम में भी झोपड़ी के अंदर बच्चों को परेशानी होती है. पंखा लगाने तक के लिए पर्याप्त जगह नहीं है.
हेडमास्टर बोले- हमें सिर्फ अपना भवन चाहिए
जोहान तिर्की का कहना है कि स्कूल को फिलहाल किसी बड़ी सुविधा की जरूरत नहीं है. सबसे पहली जरूरत बच्चों के लिए एक सुरक्षित और पक्का भवन है. उनका कहना है कि पढ़ाई-लिखाई शिक्षक अपने स्तर पर कर रहे हैं, लेकिन भवन नहीं होने से बच्चों को पढ़ाने और स्कूल की व्यवस्थाएं संचालित करने में लगातार परेशानी होती है.