बागेश्वर: पहाड़ों में खेती करने वाले परिवारों के लिए कुछ औजार ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल पीढ़ियों से होता आ रहा है. इन्हीं में से एक है दराती, जिसे कहीं दरांती तो कहीं हंसिया भी कहा जाता है. खेत में फसल काटनी हो, पशुओं के लिए घास लानी हो या छोटी झाड़ियों को हटाना हो, दराती आज भी पहाड़ी गांवों में काम आती है. यह सिर्फ खेती का औजार नहीं है, बल्कि पहाड़ के ग्रामीण जीवन और पुराने तौर-तरीकों से भी जुड़ी हुई है.
स्थानीय जानकार हिमांशु बताते हैं कि दराती जैसे मुड़े हुए धारदार औजारों का इस्तेमाल काफी पुराने समय से होता आया है. शुरुआत में ऐसे औजार पत्थर और हड्डियों से बनाए जाते थे. बाद में लोहे का इस्तेमाल शुरू हुआ तो ये औजार ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले बन गए. आज भी पहाड़ के कई गांवों में दराती का इस्तेमाल रोजमर्रा के कामों में किया जाता है.
अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम से पहचान
उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में दराती को अलग नामों से जाना जाता है. कुमाऊं में इसे दरांती, दरांत, दाथुली या आंसी कहा जाता है. वहीं गढ़वाल में दराट और कोड़ा जैसे नाम भी सुनने को मिलते हैं. आमतौर पर दराती में लोहे की मुड़ी हुई धार और लकड़ी का हत्था होता है. जिस काम के लिए इसका इस्तेमाल होना है, उसी के हिसाब से इसकी धार और आकार में भी थोड़ा बदलाव देखने को मिलता है.
घास काटने से लेकर फसल की कटाई तक आती है काम
पहाड़ों में दराती का सबसे ज्यादा इस्तेमाल घास काटने के लिए होता है. ग्रामीण महिलाएं जंगल, खेत की मेड़ और घास वाले इलाकों से पशुओं के लिए चारा काटने में इसका इस्तेमाल करती हैं. गेहूं, जौ, मंडुवा, झंगोरा जैसी फसलों की कटाई में भी दराती लंबे समय से काम आती रही है. इसके अलावा खेतों से खरपतवार हटाने, छोटी झाड़ियों की सफाई करने और पशुओं के लिए हरी घास काटने में भी यह काफी काम की होती है. कई परिवार सूखी घास और छोटी टहनियां काटने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते हैं. पहाड़ों के ढलान वाले और सीढ़ीदार खेतों में बड़े कृषि उपकरण चलाना आसान नहीं होता. ऐसे में दराती से काम करना ज्यादा सुविधाजनक रहता है.
पहाड़ी महिलाओं के साथ हमेशा रहने वाला औजार
पहाड़ी महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी में भी दराती का खास महत्व रहा है. घास या लकड़ी लेने जंगल जाते समय महिलाएं इसे अपने साथ लेकर चलती रही हैं. पहाड़ के कठिन रास्तों और जंगलों में यह उनके काम का जरूरी औजार रही है. दराती जरूरत पड़ने पर सुरक्षा के काम भी आ सकती है, लेकिन जंगली जानवरों से बचाव के लिए इस पर निर्भर रहना सही नहीं है. जंगल या वन क्षेत्र में जाते समय जरूरी सावधानी रखना जरूरी है.
गांव के लोहारों की कारीगरी से भी जुड़ी है दराती
दराती बनाने की परंपरा पहाड़ के पुराने लोहे के काम से भी जुड़ी हुई है. गांवों में स्थानीय लोहार लोहे को भट्ठी में गर्म करते थे. इसके बाद हथौड़े और निहाई की मदद से उसे आकार देकर धारदार औजार बनाया जाता था. इस तरह दराती सिर्फ खेती में काम आने वाला औजार नहीं रही, बल्कि गांव के लोहारों की मेहनत और कारीगरी की पहचान भी बनी. पहले गांव के लोग अपनी जरूरत के कई औजार स्थानीय लोहारों से ही बनवाते थे.
त्योहार और धार्मिक मान्यताओं में भी है जगह
दराती का इस्तेमाल सिर्फ खेत और जंगल तक सीमित नहीं रहा है. घी संक्रांत यानी ओलगिया पर्व से जुड़ी लोक परंपराओं में लोहारों द्वारा अपने जजमानों को औजार देने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है. नैनीताल जिले के फतेहपुर गांव में स्थित दराती मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में भी दराती चढ़ाने की परंपरा बताई जाती है. यहां पशुधन की सुरक्षा और मनोकामना से जुड़ी आस्था के तहत दराती चढ़ाने की मान्यता प्रचलित है.
मशीनों के दौर में भी नहीं छूटा पुराना साथ
आज खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ गया है और काम करने के तरीके भी बदल रहे हैं. इसके बावजूद उत्तराखंड के पहाड़ों में दराती का इस्तेमाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. खेतों से लेकर जंगल और घर के छोटे-मोटे कामों तक यह आज भी लोगों के काम आती है.