PDT Achary on CEC removal And Supreme Court: देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई शुरू हो गई. शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह करने का फैसला किया है. इसके साथ ही इस मामले में केंद्र सरकार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. मामला बहुत जटिल है क्योंकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. मौजूदा व्यवस्था में सामान्य परिस्थितियों के बीच किसी भी आयुक्त को केवल महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है. लेकिन, मौजूदा परिस्थितियां असामान्य है. आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट सीईसी को हटाने का आदेश दे सकता है. इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमने संविधान के जाने-माने जानकार और लोकसभा सचिवालय के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी से बातचीत की. यहां पढ़िए इस बातचीत के अंश…
नॉर्मल कंडीशन में सुप्रीम कोर्ट देश के मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी को उनके पद से नहीं हटा सकता, क्योंकि सीईसी एक संवैधानिक पद है. मगर अभी जो स्थिति बन रही है, उसमें सुप्रीम कोर्ट के क्या अधिकार हैं और सीईसी के क्या पावर हैं?
देखिए, सुप्रीम कोर्ट का जहां तक अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट सीईसी यानी चीफ इलेक्शन कमिश्नर को हटा नहीं सकता. दूसरी बात यह है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर को सिर्फ पार्लियामेंट ही हटा सकती है और ये महाभियोग के जरिए ही किया जा सकता है. तीसरी बात ये है कि इनके अप्वाइंट और कार्यकाल वगैरह से जुड़ा जो कानून है 2023 में उसे संसद ने पास किया था. उसके सेक्शन-16 में ये लिखा गया है कि इनके खिलाफ कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस नहीं किया जा सकता. यह बात उनके कार्यकाल तक ही नहीं बल्कि उसके बाद भी लागू होती है. उनके काम से संबंधित किसी भी मामले में आप कोई भी क्रिमिनल और सिविल केस नहीं लगा सकते. किसी भी कोर्ट के पास ये अधिकार नहीं है. ऐसा कानून में कहा गया है. तो इन चीजों के रहते मुझे पता नहीं सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा.
अगर सीईसी के फैसले संविधान सम्मत नहीं साबित हुए तो क्या होगा?
ये बात सुप्रीम कोर्ट को देखना है कि संविधान या कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं. लेकिन, ये सब मिस कंडक्ट में आता है क्योंकि मिस कंडक्ट एक ग्राउंड है जिसके आधार पर उनको इम्पीच किया जा सकता है. तो जब संविधान यह कहता है कि इसको महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है तो इसका मतलब कि दूसरा कोई जरिया या माध्यम है नहीं.
क्या सुप्रीम कोर्ट सुझाव के तौर पर सरकार से सीईसी को हटाने को कह सकता है
सुप्रीम कोर्ट कुछ इस तरह से कह सकता है लेकिन, पता नहीं सुप्रीम कोर्ट आगे क्या कहेगा. जहां तक मेरी कानून की जानकारी है उसके मुताबिक उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि इसमें इम्पीचमेंट ही किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट का डायरेक्टली इस पर क्या रोल है, इसके बारे में तो अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.
क्या यह अपने तरह का यूनिक केस है
हां, वो देखना है और पिटीशन भी देखना है. मैंने देखा नहीं है. पिटीशन पढ़ने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. तभी बताया कहा जाएगा कि उसमें सुप्रीम कोर्ट क्या-क्या कर सकता है. अब तो इस वक्त जहां तक कानून का सवाल है, वो तो यही पोजीशन है.
सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है… ऐसी स्थिति में क्या वह कुछ कर सकता है?
हां, यह स्थिति तो है. इसमें बस इतना ही है कि हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में यह लिखा है किसी भी केस में, किसी भी केस जो उनके सामने आता है, उसमें कम्प्लीट जस्टिस करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई भी आदेश निकाल सकता है. यह हमारे कॉन्स्टिट्यूशन का एक प्रोविजन है. मेरे ख्याल से आर्टिकल 142 में सुप्रीम कोर्ट के पास पावर है कि किसी भी केस में वो कम्प्लीट जस्टिस यानी पूर्ण रूप से न्याय करने के लिए जो भी कदम उठाना चाहे, जो भी आर्डर निकालना चाहे, वो सुप्रीम कोर्ट कर सकता है. मतलब सुप्रीम कोर्ट को लगे कि क्या उचित है उस संदर्भ में, वो वैसा कर सकता है.
क्या इससे सीधे यह सरकार से टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है?
हां, वही है, वही है. अभी तक हमारे सामने तो कोई केस तो है नहीं.