तमिलनाडु के तट से 2 Km दूर समुद्र में 12 मीटर अंदर इतिहास का राज, पूम्पुहार रहस्य में क्या-क्या मिला

तमिलनाडु के तट से 2 Km दूर समुद्र में 12 मीटर अंदर इतिहास का राज, पूम्पुहार रहस्य में क्या-क्या मिला


Kaveripoompattinam Port City in Sea: भारत के दक्षिणी हिस्से में चोल वंश के राजाओं के शासन काल के दौरान के प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह पूम्पुहार के पास समुद्र तल में खोज चल रही है. तमिलनाडु में पूम्पुहार तट की मुख्य धरती से करीब 2 किलोमीटर पूर्व की तरफ समुद्र तल की खोज कर रहे आर्कियोलॉजिस्ट्स को मिट्टी के ऐसे बर्तन मिले हैं, जिनके पश्चिम एशिया से जुड़े होने की संभावना है. इनमें एक खास टॉरपीडो जार यानी बेलनाकार बर्तन के अवशेष भी शामिल हैं. ये इलाका पुराने जमाने का कावेरीपूम्पट्टिनम है, जो अब वक्त के साथ बदलकर पूम्पुहार हो गया है.

यह प्राचीन बंदरगाह शहर के दूर-दराज के समुद्री व्यापार संबंधों के नए सबूत प्रदान करते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये अवशेष बंगाल की खाड़ी में आंशिक तौर पर डूब चुके चोल काल के ऐतिहासिक बंदरगाह कावेरीपूमपट्टिनम की खोज के लिए पानी के अंदर तीसरे फेज की खोज के दौरान पाए गए हैं. यह खोज समुद्री तट से करीब दो किलोमीटर दूर और पानी के अंदर 10 से 12 मीटर की गहराई में हुई.

यह खोज कावेरीपूमपट्टिनम को लेकर एक नया सुराग मुहैया कराती है, जो चोल साम्राज्य का एक प्रसिद्ध बंदरगाह था. अब ये बंगाल की खाड़ी में डूबा हुआ है. टॉरपीडो जार की बात करें तो ये एक खास तरीके का बर्तन होता है जो हिंद महासागर में होने वाले लंबी दूरी के व्यापार से जुड़ा हुआ है. पुरातत्व टीम ने स्थानीय और विदेशी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, 60 से 65 सेंटीमीटर डायमीटर वाले रिंग वेल्स के अवशेष और समुद्र के तल पर कुछ स्ट्रक्चर भी बरामद की हैं.

राज्य पुरातत्व विभाग इस खोज अभियान को इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर चला रहा है. विभाग का ऐसा कहना है कि अब तक खोज के कुल काम का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा हो पाया है. ऐसे टॉरपीडो जार का इस्तेमाल कई शताब्दियों तक किया जाता रहा है, इसलिए यह समझना काफी अहम है कि ये टुकड़े पूमपुहार कब पहुंचे थे. पूमपुहार के घाट पर पहले की गई एक खुदाई में रेडियोकार्बन डेटिंग के अनुसार 300 ईसा पूर्व के आसपास का समय सामने आया था.

रामानाथपुरम जिले के अलगांकुलम में हुई आर्कियोलॉजिकल खुदाई में भी भूमध्यसागरीय व्यापार से जुड़े सैकड़ों मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले हैं. वहीं पुडुचेरी के पास स्थित अरिकामेडु से भूमध्यसागरीय दुनिया के साथ भारत के शुरुआती संपर्कों के महत्वपूर्ण सबूत मिले हैं. यह ताजा खोज पुरातत्वविदों को यह समझने में मदद कर सकती है कि यह प्राचीन बस्ती कितनी दूर तक फैली हुई थी और पूमपुहार का कितना बसा हुआ इलाका अब समुद्र के नीचे समा चुका है.

पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि काफी पहले सुनामी और लगातार हो रहे समुद्री कटाव की वजह से यह इलाका धीरे-धीरे पानी में डूबता चला गया. इसका उदाहरण वनागिरी का ‘एल्लईअम्मन मंदिर’ है, जो साल 1991 तक प्रयोग में था, लेकिन आज वह तट से 100 मीटर अंदर तक समंदर के पानी में जा चुका है. यहां जो टॉरपीडो जार म‍िले हैं, उनका इस्तेमाल प्राचीन काल में फारस की खाड़ी के व्यापार नेटवर्क में शराब और अन्य सामानों को लाने-ले जाने के लिए किया जाता था.

चोल राजवंश के समय भारत की तूती बोलती थी. इस राजवंश ने 9वीं सदी से 13वीं शताब्‍दी तक दक्षि‍ण भारत में राज क‍िया था. साउथ ईस्ट एशिया में सुमात्रा, मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया के इलाकों में श्रीविजय नाम का साम्राज्य हुआ करता था. चोलों ने अपनी भव्य नौसेना के दम पर उन्हें मात दे दिया था. चोल की विजयगाथा श्रीलंका से लेकर म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया तक के इलाकों में फैली. इनके समय में प्रशासनिक ढांचा और द्रविड़ कला अपने चरम पर पहुंची.



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