ओडिशा का ‘बबेइजोडा’ गांव, जो पिछले 15 सालों से है पूरी तरह कचरा-प्लास्टिक मुक्त! हर्ष गोयनका ने शेयर किया Video

ओडिशा का ‘बबेइजोडा’ गांव, जो पिछले 15 सालों से है पूरी तरह कचरा-प्लास्टिक मुक्त! हर्ष गोयनका ने शेयर किया Video


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‘बबेइजोडा’ 15 सालों से है कचरा-प्लास्टिक मुक्त! हर्ष गोयनका ने शेयर किया Video

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ओडिशा के एक छोटे से गांव बबेइजोडा ने स्वच्छता की ऐसी अद्भुत मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा आज पूरे देश में हो रही है. बिना किसी बड़े सरकारी बजट या फंड के केवल मजबूत सामुदायिक भावना के दम पर यह गांव पिछले 15 वर्षों से पूरी तरह कचरा-मुक्त और प्लास्टिक-मुक्त बना हुआ है. उद्योगपति हर्ष गोयंका इस गांव का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करने के बाद लोग इसकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. आइए आपको भी दिखाते और बताते हैं कि कैसा है ओडिसा का यह शानदार गांव.

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ओडिशा का यह छोटा सा गांव 15 साल से पूरे देश के लिए मिसाल बना हुआ है. (फोटो: @hvgoenka)

भुवनेश्वर. स्वच्छता को लेकर देश में अक्सर सरकारी अभियानों और करोड़ों के बजट की बात होती है, लेकिन असली बदलाव कहां से शुरू होता है? इसका जवाब ओडिशा के एक छोटे से गांव ‘बबेइजोडा’ ने दे दिया है. जी हां, मयूरभंज जिले का बबेइजोड़ा गांव आज अपनी साफ-सफाई और कम्‍युनिटी स्प्रिट के चलते पूरे देश के लिए प्रेरणा का केंद्र बच चुका है. यह एक ऐसा गांव हैं, जहां न सड़कों पर कूड़ा दिखाई देता है, न प्लास्टिक बिखरा मिलता है और न ही सार्वजनिक जगहों पर गंदगी नजर आती है. उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया पर इस गांव का एक वीडियो शेयर कर यहां के लोगों की सामुदायिक भावन को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.

  1. एक शिक्षक ने शुरू किया था अभियान: करीब 15 साल पहले गांव के स्थानीय शिक्षक मधुसूदन मरांडी ने अपने गांव को एक मॉडल विलेज बनाने का सपना देखा था. शुरुआत एक व्यक्ति की सोच से हुई, लेकिन धीरे-धीरे पूरा गांव इस मुहिम से जुड़ गया. ग्रामीणों ने सफाई की जिम्मेदारी मिलकर संभालने के लिए एक क्‍लब बनाया. गांव के लोग अपनी तरफ से पैसे जुटाए और इनका इस्‍तेमाल डस्‍टब‍िन, सीसीटीवी कैमरे और सोलर लाइट्स जैसी सुविधाएं को खरीदने में किया गया.
  2. दिन में तीन बार होती है सफाई: बबेइजोड़ा की सबसे खास बात इसकी डेली रुटीन है. गांव की महिलाएं दिन में तीन बार सड़कों और गलियों की सफाई करती हैं. इकट्ठा किया गया कचरा तय जगहों पर रखा जाता है, जिसे बाद में गांव के युवा इकट्ठा करते हैं. जैविक कचरे को अलग कर इसका इस्‍तेमाल कम्‍पोस्‍ट बनाने के लिए किया जाता है. गांव में हर 30 मीटर पर एक डस्‍टबिन लगाया गया है, जिससे लोगों को कचरा सड़क पर फेंकने का बहाना ही न मिले.
  3. प्लास्टिक पर है पूरी तरह से रोक: बबेइजोड़ा में स्‍वच्‍छता सिर्फ झाड़ू लगाने तक सीमित नहीं है. यहां प्‍लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक है. इसके अलावा स्‍मोकिंग, सार्वजनिक जगह पर थूकने और तम्‍बाकू या गुटका खाने को भी हतोत्साहित किया जाता है. गांव में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं. इसका मकसद खास तौर पर बाहर से आने वाले लोगों और टूरिस्‍ट पर नजर रखने के लिए किया जाता है है, ताकि कोई गांव में कूड़ा न फैलाए. नियम तोड़ने वाले से कचरा उठवाने या जुर्माना लगाने की व्यवस्था की जा सके.
  4. अपनी संस्कृति भी संवार रहा है गांव: बबेइजोड़ा की खूबसूरती सिर्फ उसकी साफ सड़कें नहीं हैं. गांव में करीब 70 संथाल परिवार रहते हैं और यहां के पारांपरिक मिट्टी के घरों की दीवारों पर महिलाओं की बनाई खूबसूरत पेंटिंग देखने को मिलती हैं. इन्हें स्थानीय तौर पर ‘भीत पोटाव’ कहा जाता है. खास बात यह है कि इन पेंटिंग में इस्तेमाल होने वाले रंग भी पूरी तरह से प्राकृतिक होते हैं. रंग को तैयार करने के लिए मिट्टी, पत्थर, पेड़ों की छाल और फूलों जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्‍तेमाल किया जाता है.





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