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Chamgadar Tapu Haridwar: गंगा की अविरल धारा और हर की पौड़ी के आध्यात्मिक वैभव के बीच हरिद्वार की धरती पर कई ऐसे कोने मौजूद हैं, जिनकी दास्तान आज भी कौतूहल जगाती है. आधुनिकता की दौड़ में जहां कंक्रीट के पुल तन गए और घने जंगल मैदानों में तब्दील हो गए, वहीं एक नाम आज भी लोकस्मृति में जस का तस दर्ज है ‘चमगादड़ टापू’. न अब वो घने पेड़ रहे, न दिन के उजाले में लटकते हजारों चमगादड़, मगर किस्सों की जुबानी यह इलाका आज भी अपनी सदियों पुरानी पहचान को सीने से लगाए खड़ा है.
Chamgadar Tapu Haridwar: धर्मनगरी हरिद्वार के गंगा घाटों और ऐतिहासिक रास्तों के बीच कई ऐसे स्थान हैं, जिनके नाम सुनते ही हर किसी के मन में गहरा कौतूहल जाग उठता है. हर की पौड़ी के पास एक बड़ा मैदान आज भी आम बोलचाल की भाषा में चमगादड़ टापू के नाम से जाना जाता है. समय बदलने के साथ इस जगह की भौगोलिक स्थिति भी बदल चुकी है और समय के साथ हुए विकास से पूरी जगह का नक्शा बदल गया है. परिंदे उड़ गए, जंगल कम हो गए लेकिन कई दशकों पुराना नाम चमगादड़ टापू आज भी अमर है. आखिर कैसे पड़ा इस जगह का नाम चमगादड़ टापू? चलिए जानते हैं धर्मनगरी के जानकारों की जुबानी…
ब्रिटिश काल, घने जंगल और चमगादड़ों का बसेरा
हरिद्वार के वरिष्ठ पत्रकार रत्नमणि डोभाल के अनुसार ब्रिटिश काल और आजादी के शुरुआती दौर में यह पूरा क्षेत्र गंगा किनारे का था और चारों ओर केवल घना जंगल था. उस समय चौड़ी सड़कें और कंक्रीट पुलों का जाल नहीं था बल्कि बस आवागमन के लिए एक पगडंडी थी. बड़े-बड़े पेड़ों के कारण यह पूरा इलाका चमगादड़ों का बसेरा था.
दिन के समय में बड़े पेड़ों के ऊपर हजारों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके दिखाई देते थे. चमगादड़ों को पेड़ों पर उल्टा लटका देखकर स्थानीय लोगों और राहगीरों की आम बोलचाल की भाषा में यह स्थान चमगादड़ टापू बन गया था. समय बदलने के साथ आज यहां पर पेड़ों की संख्या कम हो गई लेकिन इस जगह का नाम आज भी वही है.
विकास की आंधी और अमर रह गई पहचान
हरिद्वार के स्थानीय निवासी राजीव भट्ट बताते हैं कि उस समय में हरिद्वार के चारों ओर घने जंगल थे. गंगा के किनारे का पूरा स्थान घने जंगलों से घिरा हुआ था. इस स्थान पर कई प्रकार के पेड़ थे जिन पर चमगादड़ उल्टे लटके हुए दिन में दिखाई देते थे. इस स्थान पर चमगादड़ों की संख्या बहुत अधिक थी. राजीव भट्ट बताते हैं कि विकास कार्यों के लिए धीरे-धीरे पेड़ काटना, मेला लैंड का विस्तार होना, पार्किंग बनना आदि के लिए विकास हुआ जिस कारण पेड़ों की संख्या तो कम हुई लेकिन चमगादड़ उड़कर कहीं और चले गए.
चमगादड़ भले ही यहां से चले गए हों लेकिन पुराने समय से इसका नाम आज भी अमर है जैसे हरिद्वार में अन्य जगहों के नाम बदलेंगे लेकिन बोलचाल की भाषा में आज भी उन्हें उनके पुराने नाम से ही जाना जाता है. आधुनिकता की इस आंधी के बीच जंगल का मैदान बना तो चमगादड़ उड़ गए मगर जगह का नाम आज भी अनूठे नाम से अपनी ऐतिहासिक गवाही दे रहा है.