पलामू. दुर्गा पूजा का पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की परंपरा और विधि-विधान की अपनी अलग ही पहचान है. देशभर से लोग बंगाल की पूजा देखने पहुंचते हैं. वहीं झारखंड के पलामू जिले में भी बंगाली परंपरा की झलक देखने को मिलती है. मेदिनीनगर शहर के कोयल नदी तट पर स्थित दुर्गा बाड़ी में पिछले 112 वर्षों से बंगाली पद्धति से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है. यहां हर साल स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा और पूजा की परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है.
1914 में रंका भवन से शुरू हुई थी पूजा
दुर्गा बाड़ी पूजा समिति के अनुसार वर्ष 1914 में छहमुहान स्थित रंका भवन में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी. वहीं वर्ष 1926 तक यहीं पूजा आयोजित होती रही. इसके बाद वर्ष 1927 में बंगाली समाज के लोगों को कोयल नदी के किनारे स्थान मिला, जहां दुर्गा बाड़ी में बंगाली पद्धति से पूजा की परंपरा शुरू हुई. तब से लेकर आज तक यह परंपरा लगातार चली आ रही है. यहां पूजा के साथ कई ऐसी परंपराएं भी कायम हैं, जो इसे अन्य पूजा पंडालों से अलग पहचान देती हैं.
एक चाल में तैयार होती है मां की प्रतिमा
पुजारी देवी प्रसाद बनर्जी ने बताया कि दुर्गा बाड़ी में मां दुर्गा की प्रतिमा एक चाल की परंपरा के अनुसार तैयार की जाती है. इसमें मां दुर्गा के साथ माता लक्ष्मी, माता सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश एक ही संरचना में विराजमान होते हैं. इस वर्ष करीब 12 फीट ऊंची प्रतिमा तैयार की जा रही है. प्रतिमा निर्माण की जिम्मेदारी पाल परिवार के लोग संभालते हैं. पूजा की शुरुआत के समय ही पूर्वजों द्वारा पाल परिवार को यहां बसाया गया था, जिसके बाद से यह परिवार लगातार प्रतिमा निर्माण की परंपरा निभाता आ रहा है.
प्राकृतिक सामग्री से बन रही मूर्ति
वे आगे बताते हैं कि इस वर्ष प्रतिमा को पर्यावरण अनुकूल तरीके से तैयार किया जा रहा है. प्रतिमा निर्माण में चिकनी मिट्टी, बांस, लकड़ी और रस्सी का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें रासायनिक रंग या अन्य कैमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. प्राकृतिक सामग्री से तैयार होने वाली यह प्रतिमा पूजा की पुरानी परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है.
बंगाल से आएगी ढाक की टीम, पहली बार महिला ढाक वादक
दुर्गा बाड़ी की पूजा में पश्चिम बंगाल से ढाक वादकों की टीम बुलाने की परंपरा रही है. इस बार महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से महिला ढाक वादकों की टीम को बुलाया जा रहा है. पलामू में यह पहली बार होगा, जब महिला ढाक वादकों की टीम दुर्गा पूजा के दौरान अपनी प्रस्तुति देगी. ढाक की थाप के बीच पूजा के दौरान महिलाएं और श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से नृत्य भी करते हैं.
षष्ठी से शुरू होगी पूजा, संध्या आरती में जुटेंगे श्रद्धालु
उन्होंने कहा कि दुर्गा बाड़ी में दुर्गा पूजा की शुरुआत षष्ठी तिथि से होगी. प्रतिदिन विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और संध्या आरती का आयोजन किया जाएगा. अष्टमी और नवमी के मिलन काल में विशेष पूजा आयोजित होती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. इस दौरान ढाक की थाप के बीच महिलाएं और श्रद्धालु नृत्य करते हैं. यहां बलि देने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है.
अष्टमी-नवमी को नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम
पूजा के दौरान धार्मिक आयोजन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. सप्तमी और अष्टमी की शाम करीब सात बजे से नाटक, नृत्य और भजन का आयोजन होगा. अष्टमी, नवमी और दशमी के अवसर पर भी विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की परंपरा रही है. नवमी के दिन श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया जाएगा.
दुर्गा बाड़ी में मां काली की भी विशेष आराधना
बता दें कि दुर्गा बाड़ी परिसर में मां काली का मंदिर भी है. वर्ष 1996 में यहां मां काली की प्रतिमा स्थापित की गई थी. तब से देवी प्रसाद बनर्जी यहां पुजारी के रूप में पूजा-अर्चना करा रहे हैं. प्रत्येक अमावस्या को मां काली की विशेष पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है. दुर्गा पूजा के दौरान भी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ जुटती है.
बंगाली परंपरा आज भी है जीवंत
कोयल नदी के किनारे स्थित दुर्गा बाड़ी में 112 वर्षों से चली आ रही पूजा की परंपरा आज भी उसी धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप में आगे बढ़ रही है. एक चाल की प्रतिमा, बंगाली विधि-विधान, ढाक की थाप, अल्पना कला, पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमा निर्माण यहां की पूजा को खास बनाते हैं. यही वजह है कि दुर्गा पूजा के दौरान मेदिनीनगर ही नहीं, आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.