सही समय पर मिट्टी चढ़ाने और संतुलित पटवन से बढ़ेगा आलू का उत्पादन, पलामू के किसानों के लिए खास सलाह

सही समय पर मिट्टी चढ़ाने और संतुलित पटवन से बढ़ेगा आलू का उत्पादन, पलामू के किसानों के लिए खास सलाह


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पलामू में आलू की खेती: दो बार मिट्टी चढ़ाने से बढ़ेगा उत्पादन और मुनाफा

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पलामू में आलू की खेती शुरू हो गई है. बेहतर उत्पादन के लिए दो बार मिट्टी चढ़ाना जरूरी है. इससे आलू हरे नहीं होते. खेत में पानी जमा न होने दें. पत्तियां पीली पड़ने पर सही पहचान कर दवा छिड़कें. कीटों की नियमित निगरानी करें. समेकित प्रबंधन से फसल सुरक्षित रहेगी.

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पलामूः पलामू में आलू की खेती का समय चल रहा है. आलू की खेती में बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी से लेकर बुआई और सिंचाई तक विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी है. सामान्य तौर पर किसान सितंबर से अक्टूबर के बीच आलू की बुआई करते हैं. क्षेत्र और किस्म के अनुसार 70 से 90 दिनों में तैयार होने वाली किस्मों का चयन किया जा सकता है. देर से बुआई करने पर मौसम में बदलाव और बादल छाए रहने जैसी परिस्थितियों से फसल पर रोग का खतरा बढ़ सकता है.

दो बार करें मिट्टी चढ़ाने का काम
पलामू जिले क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ० अखिलेश शाह ने बताया कि आलू की खेती में पौधों पर सही समय पर मिट्टी चढ़ाना महत्वपूर्ण माना जाता है. किसानों को फसल में सामान्य तौर पर दो बार मिट्टी चढ़ाने का काम करना चाहिए. इससे पौधों के आसपास मिट्टी की अच्छी परत बनती है और जमीन के अंदर बनने वाले आलू को पर्याप्त जगह मिलती है. मिट्टी चढ़ाने से आलू के जमीन से बाहर आने और हरे होने की समस्या को भी कम करने में मदद मिलती है. इससे फसल की बढ़वार और उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है.

पटवन का रखें विशेष ध्यान
आगे कहा कि आलू की फसल में सिंचाई का प्रबंधन भी बेहद जरूरी है. खेत में जरूरत के अनुसार समय पर पटवन करना चाहिए, लेकिन खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए. अधिक नमी और लंबे समय तक बादल छाए रहने की स्थिति में फसल में फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए किसानों को खेत की नमी और मौसम की स्थिति को देखते हुए ही सिंचाई करनी चाहिए.

पत्तियां पीली पड़ें तो रहें सतर्क
उन्होंने बताया कि आलू की फसल में पत्तियों का पीला पड़ना कई तरह की समस्या का संकेत हो सकता है. ऐसी स्थिति में किसान खेत का निरीक्षण करें और रोग की सही पहचान के बाद ही उपचार करें. फफूंदजनित रोग की स्थिति में किसान कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित फफूंदनाशक का इस्तेमाल कर सकते हैं. दिए गए सुझाव के अनुसार इंडोफिल एम-45 को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की बात कही गई है. दवा का प्रयोग हमेशा लेबल और कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार करना चाहिए.

कीट दिखने पर भी करें निगरानी
उन्होंने बताया कि आलू की फसल में कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर भी किसान तुरंत पहचान करें. किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल बिना रोग या कीट की पुष्टि के नहीं करना चाहिए. जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित दवा का छिड़काव करें. दोबारा छिड़काव की जरूरत हो तो दवा के लेबल पर दिए अंतराल का पालन करना जरूरी है.

उत्पादन बढ़ाने के लिए समेकित प्रबंधन
आगे बताया कि किसानों को समय पर बुआई, दो बार मिट्टी चढ़ाना, संतुलित पटवन, रोग-कीट की नियमित निगरानी और जरूरत के अनुसार उपचार अपनाकर किसान आलू की फसल को बेहतर तरीके से बचा सकते हैं. हालांकि 15–17 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि और 200–250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन का दावा खेत, किस्म, मौसम और प्रबंधन के अनुसार बदल सकता है, इसलिए इसे निश्चित उत्पादन मानकर नहीं चलना चाहिए.



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