आज रखा जा रहा जीवित्पुत्रिका व्रत, पंडित जी से जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
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Jiutiya Vrat 2026: जीवित्पुत्रिका यानी जीउतिया व्रत शनिवार को रखा जाएगा. पूजा का समय शाम 4:52 से 6:20 बजे तक बताया गया है. इस दौरान जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा सुनने की परंपरा है. व्रत का पारणा रविवार सुबह 7:27 बजे के बाद किया जाएगा.
जीवित्पुत्रिका व्रत 2026 पूजा मुहूर्त और पारणा समय (Image-AI generated)
Jiutiya Vrat 2026: माताओं के लिए जीवित्पुत्रिका यानी जीउतिया व्रत आस्था और संकल्प से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है. इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं. इस बार व्रत की तारीख को लेकर कई लोगों के मन में सवाल है कि इसे किस दिन करना उचित रहेगा. ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पाण्डेय के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि शनिवार को यानी पड़ रही है.
इसी आधार पर उन्होंने शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत करना श्रेष्ठ बताया है. व्रत के दौरान पूजा का समय, पूजन सामग्री, जीमूतवाहन की पूजा और अगले दिन पारणा का समय भी जानना जरूरी है.
शनिवार को रखा जाएगा जीवित्पुत्रिका व्रत
ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पाण्डेय के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि में किया जाता है. निर्णयसिंधु में भी प्रदोष काल में अष्टमी तिथि मिलने पर जीमूतवाहन की पूजा का उल्लेख मिलता है. इस आधार पर इस बार जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार को करना श्रेष्ठ माना गया है.
शाम 4:52 से 6:20 बजे तक पूजा
जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा शनिवार को शाम 4:52 बजे से 6:20 बजे तक करने की बात बताई गई है. इस दौरान आर्द्रा नक्षत्र रहेगा. व्रत रखने वाली महिलाएं इसी अवधि में विधि-विधान से जीमूतवाहन का पूजन कर सकती हैं. यह व्रत माताएं अपने पुत्र की रक्षा, दीर्घायु, आरोग्य और कल्याण की कामना से करती हैं. पारंपरिक मान्यता के अनुसार व्रत और पूजा श्रद्धा के साथ पूरी करने से संतान के सुख और समृद्धि की कामना की जाती है.
एक दिन पहले से शुरू होती है तैयारी
जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में एक दिन पहले ब्रह्ममुहूर्त में जल, अन्न और फल ग्रहण करने की बात कही गई है. इसके बाद अष्टमी तिथि में महिलाएं पूरे दिन और रात निर्जला व्रत रखती हैं. यानी व्रत के दौरान पानी भी ग्रहण नहीं किया जाता.
ऐसे होती है जीमूतवाहन की पूजा
- शाम के समय जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा की पूजा की जाती है.
- पूजन में जल, पंचामृत, रक्षासूत्र, चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य जैसी सामग्री अर्पित की जाती है.
- जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाई जाती है.
- इन प्रतिमाओं के माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है.
- इसके बाद विधि के अनुसार पूजा पूरी की जाती है.
पूजा के बाद सुनी जाती है व्रत कथा
पूजन के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने की परंपरा है. व्रत कथा में राजा जीमूतवाहन से जुड़ी कथा सुनाई जाती है. माताएं अपने पुत्र और पौत्रों की लंबी उम्र तथा उनके कल्याण की कामना के साथ श्रद्धापूर्वक कथा सुनती हैं. पारंपरिक मान्यता में पूजा और कथा के बाद ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने का भी महत्व बताया गया है. धार्मिक विश्वास के अनुसार इससे पुत्र सुख और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है. इसे आस्था और परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
रविवार को होगा व्रत का पारणा
जीवित्पुत्रिका व्रत का पारणा अगले दिन यानी रविवार सुबह 7:27 बजे के बाद करना श्रेयस्कर बताया गया है. व्रत रखने वाली महिलाएं पारणा का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार भी एक बार जांच सकती हैं.