Bageshwar News : महात्मा गांधी ने कासौनी ने क्यों कहा भारत का स्विट्जरलैंड? कुलियों की क्रांति खींच लाई यहां

Bageshwar News : महात्मा गांधी ने कासौनी ने क्यों कहा भारत का स्विट्जरलैंड? कुलियों की क्रांति खींच लाई यहां


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Kuli Begar Movement : आज गांधी जयंती (2 अक्टूबर) है. बापू भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे रहे. बागेश्वर का भी स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा रिश्ता रहा है. 1929 में महात्मा गांधी कुमाऊं आए थे. उनकी इस यात्रा में कौसानी और बागेश्वर भी शामिल रहे. कौसानी के जिस डाक बंगले में गांधीजी ठहरे, वो आज अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है. गांधीजी की कुमाऊं यात्रा का एक उद्देश्य बागेश्वर आना भी था. यहां 1921 में सरयू नदी के बगड़ में कुली बेगार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन हुआ. गांधी इस कुली बेगार आंदोलन से बेहद प्रभावित थे.

बागेश्वर. उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा रिश्ता रहा है. वर्ष 1929 में महात्मा गांधी कुमाऊं की यात्रा पर पहुंचे. इस यात्रा में कौसानी और बागेश्वर उनके प्रवास के पड़ाव रहे. गांधीजी वर्ष 1921 में बागेश्वर में हुए ऐतिहासिक‌ कुली बेगार आंदोलन से बेहद प्रभावित थे. उन्होंने इस अहिंसक जनआंदोलन के प्रभाव को रक्तहीन क्रांति के रूप में सराहा. बागेश्वर के बबलू नेगी लोकल 18 से बताते हैं कि गांधीजी 22 जून 1929 को कौसानी पहुंचे और 2 जुलाई तक वहां रहे. ऐतिहासिक विवरण उनके प्रवास को करीब 14 दिन का बताते हैं. कौसानी में जिस डाक बंगले में गांधीजी ठहरे, वो आज अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है. प्रवास के दौरान उन्होंने गीता पर आधारित अपने चिंतन और अनासक्ति योग से संबंधित लेखन पर काम किया.

सरयू में बहा दी कुली रजिस्टर 

कौसानी की हिमालयी सुंदरता से गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि इसे भारत का स्विट्जरलैंड कहा. भारत सरकार के पर्यटन स्रोत भी इस प्रसिद्ध संबोधन को गांधीजी से जोड़ते हैं. आज अनासक्ति आश्रम में गांधीजी से जुड़ी तस्वीरें, पुस्तकें और दूसरी स्मृतियां संरक्षित हैं. गांधीजी की कुमाऊं यात्रा का एक उद्देश्य बागेश्वर आना भी था. यहां वर्ष 1921 में उत्तरायणी के अवसर पर सरयू नदी के बगड़ में कुली बेगार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन हुआ. बद्री दत्त पांडे समेत स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में लोगों ने अंग्रेजी शासन की जबरन बेगार प्रथा का विरोध किया और कुली रजिस्टर सरयू में प्रवाहित कर बेगार नहीं करने का संकल्प लिया.

इसी आंदोलन की सफलता ने बागेश्वर को स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में विशेष पहचान दिलाई. गांधीजी ने बाद में इस आंदोलन के प्रभाव को रक्तहीन क्रांति कहा. यानी बिना हिंसा और बड़े रक्तपात के जनता ने अंग्रेजी शासन की एक शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संगठित होकर विरोध दर्ज कराया. बागेश्वर में गांधीजी की यात्रा से जुड़ी सबसे प्रमुख ऐतिहासिक निशानियों में स्वराज भवन शामिल है. नुमाइशखेत क्षेत्र में गांधीजी ने इसके शिलान्यास से जुड़े कार्यक्रम में हिस्सा लिया. स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसी दौरान उन्होंने जनसभा को संबोधित कर कुली बेगार आंदोलन की सफलता की सराहना की थी.

आध्यात्मिक ठहराव

बागेश्वर में गांधीजी की स्मृतियां केवल स्वराज भवन तक सीमित नहीं हैं. नुमाइशखेत, स्वराज भवन और बोरगांव के चरखे से भी उनकी यात्रा की यादें जुड़ी हैं. बोरगांव के जीत सिंह टंगड़िया द्वारा गांधीजी को चरखा भेंट किए जाने का उल्लेख भी स्थानीय इतिहास में मिलता है. कौसानी गांधीजी के लिए जहां हिमालय की शांति, प्रकृति और आत्मचिंतन का स्थान बना, बागेश्वर ने उन्हें संगठित जनशक्ति और अहिंसक आंदोलन की मिसाल दिखाई. आज अनासक्ति आश्रम और स्वराज भवन दोनों ही बागेश्वर जिले में गांधीजी की यात्रा और स्वतंत्रता आंदोलन की जीवंत ऐतिहासिक स्मृतियों के रूप में मौजूद हैं.



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