देहरादून: 2 अक्टूबर की तारीख आते ही उत्तराखंड राज्य आंदोलन से जुड़े लोगों की आंखों के सामने करीब 30 साल पुरानी वो मनहूस रात फिर से घूमने लगती है. ये रात थी रामपुर तिराहा कांड की ख़ौफनाक रात, जो उत्तराखंड राज्य आंदोलन का ऐसा दर्दनाक अध्याय है, जिसे याद करना आज भी आंदोलनकारियों के लिए आसान नहीं है. उस दिन अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों के काफिले में शामिल लोग यह सोचकर निकले थे कि जंतर-मंतर पहुंचकर अपनी आवाज उठाएंगे. लेकिन मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर जो हुआ, उसने कई परिवारों से उनके अपने छीन लिए.
राज्य आंदोलनकारी अंबुज शर्मा भी उस काफिले का हिस्सा थे. करीब 30 साल बाद उस रात को याद करते हुए उनकी आवाज में वही दर्द सुनाई देता है. वह बताते हैं कि 2 अक्टूबर 1994 को उत्तराखंड के अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. अलग-अलग गाड़ियों में लोग भरकर दिल्ली के लिए निकल रहे थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि रास्ते में उन्हें ऐसा मंजर देखने को मिलेगा, जिसे वह पूरी जिंदगी नहीं भूल पाएंगे.
सुबह 3:30 से 4 बजे पहुंचे, तब तक चल चुकी थीं गोलियां
अंबुज शर्मा बताते हैं कि वह सुबह करीब 3:30 से 4 बजे के आसपास रामपुर तिराहे पहुंचे थे. वहां पहुंचते ही हालात देखकर उनके होश उड़ गए. तब तक गोलियां चल चुकी थीं और शव वहां लाए जा रहे थे. उन्हें यह तक पता नहीं था कि ये शव किसके हैं. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आंदोलनकारी वहां पहुंच रहे थे और हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था. वह बताते हैं कि उस समय किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या न करें. आंदोलनकारी अपने साथियों को ढूंढ रहे थे. इसी बीच एक घायल व्यक्ति उनके सामने आया, जिसे गोली लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल ले जाने का फैसला किया गया.
एंबेसडर कार में घायल को लेकर अस्पताल पहुंचे
अंबुज शर्मा बताते हैं कि उस समय उनके पास एंबेसडर कार थी. उन्होंने गोली लगे व्यक्ति को उसमें बैठाया और नजदीकी अस्पताल लेकर पहुंचे. डॉक्टरों ने उसकी हालत देखते हुए उसे चंडीगढ़ रेफर कर दिया. सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि उसके साथ न कोई रिश्तेदार था और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जो उसे पहचानता हो. उसकी जेब से एक छोटा सा कागज मिला. उस पर उसका नाम और बस का नंबर लिखा था. इसके बाद उस बस में सफर कर रहे लोगों से संपर्क करने की कोशिश की गई. काफी तलाश के बाद एक व्यक्ति से संपर्क हुआ, लेकिन घायल को बचाया नहीं जा सका. वह भी आंदोलन में शहीद हो गया.
अस्पताल पहुंचे तो घायल साथियों का दर्द सामने था
इसके बाद अंबुज शर्मा मुजफ्फरनगर के अस्पताल पहुंचे. वहां उनके कई साथी घायल हालत में थे. वह बताते हैं कि उस समय हर तरफ अपनों को खोजने की बेचैनी थी. कोई अपने साथी को ढूंढ रहा था तो कोई किसी घायल के बारे में जानकारी लेने की कोशिश कर रहा था. उस रात का दर्द आज भी उनके मन में है.
कॉलेज का साथी था रविंद्र गोलू रावत
अंबुज शर्मा के लिए इस घटना का दर्द इसलिए भी गहरा है, क्योंकि उन्होंने अपना करीबी साथी खोया था. वह बताते हैं कि रविंद्र गोलू रावत, जिन्हें वह गोलू के नाम से जानते थे, उनके छोटे भाई जैसे थे. दोनों ने कॉलेज में साथ पढ़ाई की थी और आंदोलन में भी साथ शामिल हुए थे. वह बताते हैं कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिन लोगों के साथ वह अलग राज्य का सपना लेकर निकले हैं, उन्हीं साथियों को इस तरह खोना पड़ेगा. उनका कहना है कि सभी लोग काफिले में साथ निकले थे, लेकिन घर वापस लौटते समय वही काफिला पहले जैसा नहीं था.
साथ निकले थे, लेकिन घर लौटते समय कई साथी नहीं थे
अंबुज शर्मा ने बताया कि जब वह घर से निकले थे तो काफिले में सभी साथी साथ थे. लेकिन वापस लौटते समय कई साथी उनके साथ नहीं थे. कुछ शहीद हो चुके थे और कुछ घायल थे. करीब तीन दशक बीत जाने के बाद भी रामपुर तिराहे की वह रात उनके लिए बीती हुई कहानी नहीं है. साथियों को खोने का दर्द आज भी उनके सीने में है. उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में रामपुर तिराहा कांड की बरसी हर साल उन लोगों की याद दिलाती है, जिन्होंने अलग राज्य के आंदोलन में अपनी जान गंवाई.