नई दिल्ली. जब 20s में सच्चा प्यार होता है, तो उसका असर एसीटोन की एक बूंद जैसा होता है- शुरू में यह ठंडा और सुकून देने वाला लगता है, लेकिन फिर पलक झपकते ही गायब हो जाता है. पीछे रह जाती हैं जिंदगी की कड़वी सच्चाई, करियर की चिंताएं और खुद को जमाने का प्रेशर. अपनी नई फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ में डायरेक्टर अपूर्व सिंह कार्की आज की यंग जेनरेशन की इन साइकोलॉजिकल उलझनों और इमोशनल उतार-चढ़ाव को मजेदार, देसी और मजेदार तरीके से दिखाते हैं. तो आइए, जानते हैं कि वीर पहाड़िया और आफिया सैयद स्टारिंग यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर कैसे खरी उतरती है.
कहानी
यह फिल्म विशाल (वीर पहाड़िया) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक आम इंडियन परिवार का एक सीधा-सादा लड़का है. विशाल का दिल आसानी से बहक जाता है, लेकिन हर बार उसकी लव स्टोरी अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाती है. इसी बीच सुहानी (आफिया सैयद) उसकी जिंदगी में आती है. सुहानी, विशाल की बेफिक्र दुनिया से बिल्कुल अलग है. वह एक समझदार लड़की है जो अपने करियर, जिंदगी के गोल्स और अपने भविष्य को लेकर पूरी तरह क्लियर है. विशाल मानता है कि सुहानी उसकी सोलमेट है, लेकिन असली रुकावट यह है कि सुहानी ने अपने लाइफ पार्टनर के लिए कुछ क्राइटेरिया और जरूरतें तय कर रखी हैं. विशाल का बेफिक्र और ढीला-ढाला रवैया सुहानी की चेकलिस्ट में बिल्कुल भी फिट नहीं बैठता. रंजीत (अपारशक्ति खुराना) की एंट्री के साथ कहानी एक नया मोड़ लेती है. रंजीत न सिर्फ फाइनेंशियली स्टेबल है बल्कि अच्छे व्यवहार वाला भी है, जो सुहानी के सभी क्राइटेरिया पर पूरी तरह से फिट बैठता है. हालांकि, फिल्म एक ट्रेडिशनल लव ट्रायंगल से बचती है, क्योंकि सुहानी ऐसी चीज नहीं है जिसे दो लोग जीत सकें. आखिरी फैसला उसी का है. इस बीच विशाल अपने US वीजा, अपने करियर के भविष्य और अपने माता-पिता की उम्मीदों के लीगल प्रोसेस से बोझिल है. विशाल को धीरे-धीरे एहसास होने लगता है कि बड़ा होना सिर्फ अपनी मर्जी से करने के बारे में नहीं है, बल्कि अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने के बारे में भी है.
एक्टिंग
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदारों की नेचुरल और स्पॉन्टेनियस परफॉर्मेंस है:
वीर पहाड़िया (विशाल): वीर पहाड़िया ने विशाल का लीड रोल बिना किसी हीरो वाले अंदाज के आसानी से निभाया है. वह एक सीधे-सादे पड़ोस के लड़के के शरारती अंदाज को जिंदा कर देता है. दोस्तों के साथ उसकी मस्ती-मजाक जितनी बेफिक्र है, सुहानी के आस-पास उसकी घबराहट भी उतनी ही प्यारी और असली लगती है.
आफिया सैयद (सुहानी): अपने डेब्यू रोल में आफिया सैयद बहुत कॉन्फिडेंट और रिफ्रेशिंग लगती हैं. उनके चेहरे की मासूमियत और किरदार पर उनकी कमांड तारीफ के काबिल है. वीर और आफिया के बीच की केमिस्ट्री कोई जबरदस्ती का ड्रामा नहीं लगती, बल्कि यह शुरुआती मुलाकातों की उसी मीठी झिझक को दिखाती है जो देखने वाले के चेहरे पर मुस्कान ले आती है.
अपारशक्ति खुराना (रंजीत): अपारशक्ति खुराना इस फिल्म का असली सरप्राइज पैकेज हैं. वह किसी घिसे-पिटे विलेन की तरह बर्ताव नहीं करते, बल्कि उनकी शानदार कॉमिक टाइमिंग पूरे थिएटर को रोक देती है. खासकर जब वह सुहानी के पिता (राकेश बेदी) को इम्प्रेस करने के लिए अलग-अलग ट्रिक्स अपनाते हैं, तो हंसी रुकने का नाम नहीं लेती.
निखिल विजय और दूसरे सपोर्टिंग एक्टर्स: विशाल के रूममेट के तौर पर निखिल विजय अपने शार्प और मजेदार वन-लाइनर्स से शो चुरा लेते हैं. प्यार और रिश्तों पर उनकी फिलॉसफी, ‘अगर आप किसी लड़की को टाइम देते हैं, तो आपको पैसे चाहिए… अगर आप उसे पैसे देते हैं, तो आपको टाइम चाहिए और अगर आप उसे दोनों देते हैं, तो आपको स्पेस चाहिए…’ सीधे ऑडियंस की तालियों और हंसी से जुड़ जाती है. वहीं, राकेश बेदी अपने खास स्टाइल में शानदार परफॉर्मेंस देते हैं.
डायरेक्शन
अपूर्व सिंह कार्की का डायरेक्शन इस फिल्म को खास बनाता है. वह आज के युवाओं की मुश्किलों को बहुत आसानी से दिखाते हैं, न कि कोई भारी-भरकम, उपदेश देने वाला टोन इस्तेमाल करते हैं. दीपक किंगरानी का स्क्रीनप्ले और डायलॉग इतने जमीन से जुड़े हैं कि हर मिडिल-क्लास परिवार के दर्शक खुद को इससे जुड़ा हुआ पाएंगे. फिल्म में पिता-बेटे के रिश्ते को बारीकी से दिखाया गया है, जो दिल को छू लेने वाला है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म का कैमरावर्क और सिनेमैटोग्राफी काफी रियलिस्टिक है. इसमें फालतू की बनावटी चमक-दमक या ग्लैमरस लोकेशन थोपने की कोई कोशिश नहीं की गई है. कैमरामैन ने कॉलेज हॉस्टल के बिखरे हुए कमरों, तंग गलियों और युवाओं की रोजाना की भीड़-भाड़ को बहुत ही असली तरीके से कैप्चर किया है. क्लोज-अप शॉट्स में एक्टर्स के चेहरे के एक्सप्रेशन, खासकर विशाल की घबराहट और सुहानी का कॉन्फिडेंस, बहुत अच्छी डिटेल के साथ कैप्चर होते हैं. विजुअल्स इतने क्लियर और सुकून देने वाले हैं कि देखने वाला पूरी तरह से कहानी के माहौल में डूब जाता है.
म्यूजिक
सचेत-परंपरा और दूसरे कंपोजर्स का बनाया साउंडट्रैक फिल्म का मूड फ्रेश रखता है. ‘कहो तो’, ‘तू मेरा रायो’ और ‘इश्क का गुलाम’ जैसे गाने फिल्म के नैरेटिव फ्लो में रुकावट नहीं डालते, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं. गाने के बोल आज की जेनरेशन की आम भाषा के करीब हैं, जिससे वे यंग लोगों के लिए तुरंत यादगार बन जाते हैं. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत कंपोज्ड है, हंसी-मजाक वाले पलों में हल्का म्यूजिक बजता है और इमोशनल पलों में म्यूजिक धीरे से दिल को छू जाता है.
कमियां
अपनी खूबियों के बावजूद ‘प्रेम कीटाणु’ में कुछ छोटी-मोटी कमियां हैं. इंटरमिशन के बाद, कहानी थोड़ी देर के लिए अपनी रिदम खो देती है और थोड़ी धीमी हो जाती है. कहानी का बेसिक स्ट्रक्चर काफी जाना-पहचाना लगता है, जिससे ऑडियंस अंदाजा लगाती रहती है कि आगे क्या होने वाला है. करियर और वीजा की उलझन को और डिटेल में दिखाया जा सकता था, लेकिन ऐसा लगता है कि इसे थोड़ी जल्दबाजी में सुलझाया गया है.
अंतिम फैसला
सभी छोटी-मोटी कमियों को छोड़ दें, तो ‘प्रेम कीतनु’ कोई सीरियस फिल्म नहीं है जिसमें बहुत ज्यादा ज्ञान या भारी दुख भरी कहानियां हों. यह एक मजेदार, कूल और सुकून देने वाली फिल्म है जो प्यार के जरिए बड़े होने की असली मुश्किलों को सादगी और ह्यूमर के साथ दिखाती है. वीर और आफिया की रिफ्रेशिंग जोड़ी, अपारशक्ति की बेजोड़ कॉमेडी और एक मिडिल-क्लास परिवार के जाने-पहचाने पल मिलकर इसे 2 घंटे 18 मिनट की एक बेहतरीन एंटरटेनर बनाते हैं. अगर आप वीकेंड पर अपने दिमाग से सारा स्ट्रेस दूर करना चाहते हैं और एक हल्की-फुल्की और दिल को छू लेने वाली लव स्टोरी देखना चाहते हैं, तो ‘प्रेम कीटाणु’ आपके चेहरे पर जरूर एक सुकून देने वाली मुस्कान ला देगी. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.