भारतीय शेयर बाजार को किसकी लगी नजर, समझिए धंधे का असली खेल – why india share market plunge what role america bond yields paly business economy explain

भारतीय शेयर बाजार को किसकी लगी नजर, समझिए धंधे का असली खेल – why india share market plunge what role america bond yields paly business economy explain


सौ बात की एक बात: सौ बात की एक बात ये कि ये बॉन्ड क्या होते हैं? भारत का शेयर बाजार क्यों गिरे जा रहा है? एक्सपर्ट लोग कह रहे हैं कि अमेरिका के बॉन्ड पर ब्याज बढ़ गया इसलिए भारत का शेयर बाजार गिर रहा है. भारत ही नहीं दुनिया भर में जो शेयरों की कीमत गिरे जा रही है उसकी एक बड़ी वजह ये बताई जा रही है कि अमेरिका के बॉन्ड पर ब्याज ज्‍यादा हो गया है. अब बाकी दुनिया का तो बाकी दुनिया जाने, पब्लिक तो भारत के शेयर बाजार में शेयर के दाम गिरने की वजह जानना चाहती है. तो ईरान में युद्ध हो गया, होर्मुज गलियारा खुलने के आसार कभी दिखते हैं कभी नहीं दिखते, तो ये सब वजहें तो समझ में आती हैं कि अनिश्चितता का माहौल है और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ेगा, और उनका मुनाफा आगे चल कर कम होने की आशंका है इसलिए उनके शेयर के दाम गिर जाएं ये तो समझ में आता है. लेकिन ये जो हाल के दिनों की लगातार गिरावट चल रही है उसमें ये भी कहने लग गए हैं कि अमेरिका में बॉन्ड पर यील्ड बढ़ रही है उसकी वजह से भारत का शेयर बाजार गिर रहा है, ये वाली बात ज़्यादातर पब्लिक को समझ में नहीं आ रही. लेकिन ये समझना बहुत ज़रूरी है. सिर्फ उनके लिये ही नहीं जिन्होंने शेयर बाजार में निवेश किया हुआ है. सबके लिए जानना ज़रूरी है.

शेयर बाजार क्यों गिर रहा है? क्योंकि शेयरों के दाम गिर रहे हैं. दाम क्यों गिर रहे हैं? उसी वजह से, जिस वजह से किसी भी चीज के दाम गिरते हैं. जब किसी चीज के खरीदार ज़्यादा होते हैं और बेचने वाले कम होते हैं तो उस चीज की बाजार में कमी हो जाती है और खरीदार ज़्यादा पैसे देने को तैयार होते हैं और उस चीज के दाम बढ़ जाते हैं. इसी तरह से अगर किसी चीज को बेचने वाले ज़्यादा हो जाते हैं और खरीदने वाले उतने नहीं होते तो उस चीज की मांग कम हो जाती है और बेचने वालों को सस्ते में बेचने पड़ती है और उस चीज के दाम गिरने शुरू हो जाते हैं. तो मतलब ये कि भारतीय शेयरों को बड़ी संख्या में बेचा जा रहा है, इसलिए उनके दाम गिरते जा रहे हैं. तो क्यों बेचा जा रहा है भारतीय शेयरों को? और कौन बेच रहा है? इसकी बहुत सारी वजहें बताई जाती हैं जैसे कि कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी, डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती क़ीमत वगैरह. लेकिन साथ में बड़ी वजह ये बताई जा रही है कि विदेशी निवेशक भारत की कंपनियों के शेयरों में बड़ी तादाद में बेच कर अपना पैसा ले कर निकल रहे हैं. और क्यों बेच कर निकल रहे हैं भारत से वो लोग? भारत में तो सरकार कह रही है कि 7.8% ग्रोथ हुई है अर्थव्यवस्था में, तो भारत की कंपनियों को तो आगे और मुनाफ़े की उम्मीद होनी चाहिए. तो उनके शेयर की क़ीमत तो बढ़नी चाहिए. विदेशी निवेशक क्या वो मुनाफा नहीं कमाना चाहते? या उनको भरोसा नहीं कि भारतीय कंपनियों को मुनाफा होगा और भारतीय व्यवस्था आगे भी ऐसे ही बढ़ती रहेगी. या उनको अभी ये जो आंकड़े दिए हैं सरकार ने उनपर ही भरोसा नहीं इसलिए यहां से बेच-बेच कर निकल रहे हैं.

बॉन्‍ड होता क्‍या है?

इस सब पर भी बहुत सारे विश्लेषक अपनी-अपनी राय दे रहे हैं. और इन सब तर्कों का अपना वजन बिलकुल है. लेकिन एक बड़ा तर्क जो दिया जा रहा है वो ये भी है कि अमेरिका में बॉन्ड की यील्ड बढ़ रही है तो विदेशी निवेशकों को भारत से ज़्यादा वहां फायदा होने की उम्मीद दिख रही है इसलिए यहां से बेच-बेच कर निकले जा रहे हैं. ये बॉन्ड क्या होता है? बॉन्ड मतलब एक तरह से ऐसे समझ लो जैसे उधार की रसीद. मान लो आपने किसी को दस हजार रुपये उधार दिए. और वो एक कागज पर लिखकर दे कि इतने पैसे लिए, दो साल बाद लौटाऊंगा, और हर साल इतना ब्याज भी दूंगा. वही कागज जो है वो होता है बॉन्ड. मतलब बॉन्ड एक रसीद है, एक सबूत है कि उसने उधार लिया है और उधार पर इतना ब्याज देने का वादा किया है. फर्क बस इतना है कि ये रसीद आप किसी और को भी बेच सकते हो.

अमेरिकी बॉन्‍ड पर ज्‍यादा कमाई की वजह से निवेशक USA की तरफ रुख कर रहे हैं. (फोटो: AP)

अगर सरकार ही बॉन्‍ड दे तो फिर क्‍या होगा?

और अगर ये बॉन्ड किसी सरकार ने ही दिया हो तो समझिए उसकी वैल्यू कितनी हो जाती होगी. मतलब सरकार ही उधार ले रही है आप से. और सरकार ही वादा कर रही है. तो सरकार के बॉन्ड से पक्की रसीद क्या होगी? और वो अमेरिका की सरकार हो तो सोचिए. तो ये जो कहते हैं कि अमेरिका के बॉन्ड की कीमत बढ़ गई है उसका मतलब है कि अमेरिका की सरकार को उधार दो तो इतना ब्याज मिल रहा है. बाज़ार में इस तरह के बॉन्ड की क़ीमत रोज बदलती रहती है, जबकि असली उधार की रकम और ब्याज का वादा तो कागज पर जस का तस रहता है. मतलब जिसने सरकार को ब्याज दिया उसके पास जो रसीद है उस रसीद को वो बेच रहा है और उस रसीद की कीमत ही मांग के हिसाब से ऊपर नीचे होती रहती है. तो जब लोग कहते हैं की अमेरिकी बॉन्ड महंगा या सस्ता हो गया, तो वो उस रसीद की बाजार वाली कीमत की बात कर रहे होते हैं. मतलब बॉन्ड असल में एक उधार का कागज होता है. जब किसी को पैसे की जरूरत होती है और वो बैंक से नहीं, सीधे लोगों से उधार लेना चाहता है, तो वो एक वादा लिखकर देता है. उसी वादे को बॉन्ड कहते हैं. कागज पर लिखा होता है कि इतने रुपये मैंने लिए, इतने समय बाद लौटाऊंगा, और बीच-बीच में या आखिर में इतना ब्याज भी दूंगा. जो यह कागज खरीदता है, वो उधार देने वाला बन जाता है. जो कागज जारी करता है, वो उधार लेने वाला बन जाता है.

बॉन्ड मतलब एक तरह से ऐसे समझ लो जैसे उधार की रसीद. मान लो आपने किसी को दस हजार रुपये उधार दिए. और वो एक कागज पर लिखकर दे कि इतने पैसे लिए, दो साल बाद लौटाऊंगा, और हर साल इतना ब्याज भी दूंगा. वही कागज जो है वो होता है बॉन्ड. मतलब बॉन्ड एक रसीद है, एक सबूत है कि उसने उधार लिया है और उधार पर इतना ब्याज देने का वादा किया है. फर्क बस इतना है कि ये रसीद आप किसी और को भी बेच सकते हो.

सब साख की बात

और सबसे आम तरह के जो बॉन्ड होते हैं वो सरकार के बॉन्ड होते हैं. तो जैसे अमेरिका की सरकार को जब अपना खर्चा चलाने या पुराना कर्ज चुकाने के लिए पैसे चाहिए होते हैं तो वो ये बॉन्ड जारी करती है. सभी सरकारें ऐसा करती हैं. भारत की सरकार भी बॉन्ड जारी करती है. कंपनियां भी बॉन्ड जारी करती है. जैसे अगर किसी कंपनी को फैक्टरी लगानी है या कोई पुराना कर्ज चुकाना है तो वो भी बाजार से पैसा उधार लेने के लिए बॉन्ड जारी करती है. फर्क बस इतना है कि सरकार का वादा ज्यादा पक्का माना जाता है, किसी कंपनी का वादा उसकी अपनी साख और वित्तीय हालत पर निर्भर करता है. सरकारों का भी ऐसा ही है. जिस सरकार की वित्तीय हालत जितनी ज्‍यादा अच्छी होती है उसको उतने कम ब्याज पर उधार मिल जाता है. जिसने बॉन्ड खरीदा, उसे तय ब्याज मिलता रहता है और समय पूरा होने पर मूल रकम भी वापस मिल जाती है.

बॉन्‍ड शेयर से कैसे अलग?

शेयरों में ऐसा कोई वादा नहीं होता. जिस कंपनी का शेयर होता है वो कंपनी जैसा मुनाफा कमाए वैसी शेयर की कीमत ऊपर-नीचे होती है. बॉन्ड में तो फ़िक्स्ड होता है कि टाइम खत्म होने पर इतना पैसा देने का वादा है. वादा छपा होता है, रकम लिखी होती है, तारीख तय होती है. गारंटी का तो ऐसा है कि अगर बॉन्ड जारी करने वाला ही डूब जाए तो पैसा भी डूब जाता है. इसलिए अमेरिका जैसी सरकार के बॉन्ड की मांग किसी ऐसी सरकार के बॉन्ड से जाहिर सी बात है ज्यादा रहती है जिसकी अर्थव्य्वस्था के भविष्य का कुछ ठिकाना ही ना हो.

कोई क्यों आएगा भारत में निवेश करने जब अमेरिका की सरकार को ही उधार दे कर वहां 5% से ज़्यादा की कमाई हो रही होगी? वो भी डॉलर में? वो तो तभी यहां पैसा लगाएगा ना जब यहां कंपनियों की कमाई इतनी ज़्यादा होने की उम्मीद हो कि बाकी देशों से ज़्यादा मुनाफ़ा भी हो जाए और रुपये की क़ीमत गिरने से जो नुकसान हो उसकी भी भरपाई हो जाए. मगर जब तक अमेरिका की सरकार की गारंटी वाले कागज पर इतना मोटा और सुरक्षित रिटर्न मिल रहा है, भारत के शेयर बाजार को चढ़ने के लिए अर्थव्यवस्था को और ज्‍यादा मजबूत होना होगा.

यील्ड का मतलब क्या?

अब आ जाइए यील्ड पर. यील्ड का मतलब क्या? मान लीजिए आपने ऐसा बॉन्ड खरीदा जो साल में 5 रुपये ब्याज देता है. और बाजार में ब्याज दरें और बढ़ जाएं. और बाद में नए बॉन्ड जारी हों जिनपर 7 रुपये ब्याज मिलने लगे. तो आपका पुराना बॉन्ड तो कम कमाई करके देने लगता है. आप चाहोगे कि वो पैसा निकाल कर नए बॉन्ड में डाल दूं और ज्‍यादा ब्याज क्यों ना कमाऊं? तो आप उसको बेचने निकलते हो और अब लोग उसे सस्ते में ही खरीदेंगे. क्योंकि बेचने वाले ज्‍यादा आ जाते हैं बाजार में. कीमत गिरेगी. कीमत गिरेगी, भाव घटेगा, बॉन्ड सस्ता होगा. मतलब आपने अगर 100 रुपये का बॉन्ड लिया था, और 5 रुपये ब्याज मिलना था तो अभी बेचने पर उसके 98 ही मिलेंगे क्योंकि अब 5 रुपये ब्याज 98 पर ही मिलने लगेगा. ब्याज तो फ़िक्स है. लेकिन अब वो कम रकम पर ही मिलेगा. इसको कहते हैं कि यील्ड बढ़ गई. पहले 100 रुपये पर 5 रुपये मिल रहे थे अब 98 पर ही 5 रुपये मिल रहे हैं. यानी रिटर्न ज़्यादा हो गई. इसको कहते हैं यील्ड ज़्यादा हो गई.

असल कहानी तो डॉलर और रुपये की

इसलिए जब खबर आती है कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5.3% पर पहुंच गई, तो उसका सीधा मतलब ये होता है कि अमेरिका की सरकार के वादे की वैल्यू कम हो रही है. नया बॉन्ड खरीदने वाले को पहले से मोटा ब्याज मिल रहा है. यानी अब अमेरिका की सरकार को बाजार से उधार चाहिए तो ज़्यादा पैसा देना पड़ रहा है. और जो अमेरिका की सरकार को पैसा उधार दे रहा है उसको 5.3% की कमाई हो रही है. तो ये वजह बताई जा रही है कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल कर अमेरिका की सरकार के बॉन्ड में लगाए जा रहे हैं. तो क्या भारत से उनको 5% कमाई की उम्मीद भी नहीं दिख रही? ये है असली कहानी. ये है असली समझने वाली बात. कि अमेरिका में 5% पर पैसा उधार देने निकल पड़े हैं, यहां पर क्या 5% भी नहीं कमाएंगे? तो वो क्या है कि यहां कमा भी लेंगे तो वो कमाई तो होगी रुपयों में. वहां 5% भी कमाई होगी तो वो कमाई होगी डॉलरों में. पहले अमेरिका के बॉन्ड पर कमाई चल रही थी 1-2% की. तो भारत में शेयर बाज़ार में ज़्यादा कमाई दिख रही थी तो वो यहां आ रहे थे. अब वहां कमाई दिख रही है 5% से भी ज़्यादा की. 5.3% भी हो गया आंकड़ा. और वो भी डॉलरों में. तो वो ज़्यादा फ़ायदेमंद दिख रहा है.

धंधे वालों को तो बस मुनाफा चाहिए

धंधे वाला तो मुनाफ़ा देखता है. वहां ज्‍यादा दिख रहा है तो वहां भाग रहे हैं. एक तो वो सरकार का बॉन्ड है. अमेरिका की सरकार का बॉन्ड है. यहां शेयर बाजार में कभी ऊपर कभी नीचे का हिसाब चलता है. वहां सरकार का पक्का वादा है. और यहां रुपये की क़ीमत ही गिरती जाती है. सोचिए कई एक डॉलर लेकर आया. उसने यहां शेयर खरीदे. तो एक डॉलर के उसे मिले 90 रुपये. उसने 90 रुपये के शेयर खरीदे. और शेयर की कीमत चढ़ कर हो गई 95 रुपये. तो उसको 5 रुपये का फ़ायदा होना चाहिए. लेकिन वो जब बेचने जाए तो एक डॉलर की क़ीमत हो गई 95 रुपये. तो उसको 95 रुपये पर शेयर बेचने के बाद भी वापस मिलेगा एक ही डॉलर. एक ही डॉलर लेकर आया था, मुनाफा होने के बाद भी एक ही डॉलर ले कर जाएगा. तो काहे का मुनाफ़ा हुआ? खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारा आना? कोई क्यों आएगा भारत में निवेश करने जब अमेरिका की सरकार को ही उधार दे कर वहां 5% से ज़्यादा की कमाई हो रही होगी? वो भी डॉलर में? वो तो तभी यहां पैसा लगाएगा ना जब यहां कंपनियों की कमाई इतनी ज़्यादा होने की उम्मीद हो कि बाकी देशों से ज़्यादा मुनाफ़ा भी हो जाए और रुपये की क़ीमत गिरने से जो नुकसान हो उसकी भी भरपाई हो जाए. मगर जब तक अमेरिका की सरकार की गारंटी वाले कागज पर इतना मोटा और सुरक्षित रिटर्न मिल रहा है, भारत के शेयर बाजार को चढ़ने के लिए अर्थव्यवस्था को और ज्‍यादा मजबूत होना होगा. नहीं तो वहां का बॉन्ड ही असली बॉन्ड बना रहेगा. सौ बात की एक बात.



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