दिल्ली का रावण मार्केट तैयार, कारीगर बोले- महंगाई ने फीकी की दशहरे की चमक
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Delhi Dussehra Ravan Effigy News: दिल्ली में दशहरे की तैयारियां तेज हैं, लेकिन टैगोर गार्डन के रावण कारीगर महंगाई, बढ़ती मजदूरी और घटती मांग से परेशान हैं. 50 सालों से रावण बना रहे महेंद्र पाल राय ने बताया कि प्रदूषण और बढ़ती लागत से उनका रोजगार ठप्प हो गया है. आइये जानते हैं दुकानदारों से.
नई दिल्ली: दशहरे में अब सिर्फ 19 दिन बाकी हैं. 20 अक्टूबर को बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देते हुए दशहरा मनाया जाएगा. इस दिन रावण का दहन किया जाता है. यही वजह है कि दिल्ली में दशहरे की तैयारियां तेज हो चुकी हैं. दिल्ली का सबसे बड़ा रावण मार्केट टैगोर गार्डन सजकर तैयार है. यहां दूर-दूर तक खड़े रावण के विशाल पुतले लोगों का ध्यान खींच रहे हैं, लेकिन इन पुतलों को अपने हाथों से आकार देने वाले उन कारीगरों के चेहरों पर खुशी नहीं, बल्कि मायूसी नजर आ रही है. जो पिछले 50 सालों से इस कारोबार से जुड़े हैं. कभी दशहरे का त्योहार इन कारोबारियों के लिए सालभर की मेहनत का सबसे बड़ा फल लेकर आता था, लेकिन अब महंगाई, बढ़ती मजदूरी और घटती मांग ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. दिल्ली के टैगोर गार्डन में पिछले 50 सालों से रावण बना रहे महेंद्र पाल राय से जब बात की गई तो उनका दर्द सामने आया.
प्रदूषण और महंगाई की पड़ रही मार
50 सालों से रावण बना रहे महेंद्र पाल राय ने बताया कि उनके अधीन लगभग 10 मजदूर काम कर रहे हैं. यूपी और बिहार से लेकर अलग-अलग राज्यों की ये मजदूर हैं. उनके लिए खाने की व्यवस्था सुबह-शाम वह खुद करते हैं. मजदूर वर्ग यहीं पर रहता है. अभी 20 अक्टूबर तक सब लोग यहीं पर टैगोर गार्डन पर रहेंगे. दिन-रात काम करेंगे. उन्होंने बताया कि मजदूरों को उनकी मेहनत का पैसा भी देना होता है. इन सब के बीच अब ऐसा लगने लगा है कि जैसे मानो रावण बनाने का कारोबार अब मुश्किल में है.
बता दें कि दिल्ली एनसीआर में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है. जब रावण दहन होता है, तब और प्रदूषण बढ़ जाता है और महंगाई भी ज्यादा हो गई है. पहले जो रावण 150 रुपए में तैयार हो जाता था, अब वह 3000 रुपए में तैयार हो रहा है. पहले कम पैसों में रावण तैयार होता था, लेकिन मुनाफा ज्यादा होता था. क्योंकि बिक्री ज्यादा होती थी. अब सिर्फ 25 से 30 रावण ही वह बना रहे हैं. क्योंकि अब रावण बनाना महंगा हो गया है और उस हिसाब से अब बिक्री भी नहीं होती है.
लोग नहीं देखते मेहनत
महेंद्र पाल राय ने यह भी बताया कि लोग जब रावण खरीदने आते हैं, तो कहते हैं कि हमें घर ले जाकर इसे जला देना है. ऐसे में इतना महंगा पैसा क्यों देंगे. वह इसे बनाने के पीछे की मेहनत नहीं देखते हैं. बल्कि सस्ता करके ही लेकर जाते हैं. मजबूरी की वजह से रावण कम कीमतों में देना पड़ता है. उन्होंने बताया कि हर साल यह होता है कि जब दशहरे में एक या दो तीन बचें होते हैं, तब बारिश भी हो जाती है जिससे भारी नुकसान हो जाता है. उन्होंने बताया कि टैगोर गार्डन के आसपास कुछ संदिग्ध लोग भी रहते हैं. जो रात में उनके रावण चोरी करके भी लेकर जाते हैं.
ऐसे में बारिश और चोरी की वजह से भी काफी नुकसान झेलना पड़ रहा है. आने वाले वक्त में यह कारोबार पूरे देश भर में कम ही लोग करेंगे. उन्होंने बताया कि रावण को वैसे असम की जो बांस की लकड़ी से बनाया जाता है. लोग उसमें पटाखे लगा देते हैं, जिस वजह से रावण दहन के वक्त प्रदूषण ज्यादा हो जाता है. इस लकड़ी से प्रदूषण ज्यादा नहीं होता है.