जेल में बंद कैदियों के लिए जीवनदान बनी गांधी जयंती, बिहार की सम्राट सरकार रिहा करेगी 44 कैदी

जेल में बंद कैदियों के लिए जीवनदान बनी गांधी जयंती, बिहार की सम्राट सरकार रिहा करेगी 44 कैदी


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गांधी जयंती को खास बनाने के लिए बिहार की सम्राट सरकार ने इस मौके पर एक बेहतरीन पहल किया है. उन्होंने जेल में लंबे समय से बंद बुजुर्ग हो गए और बीमार कैदियों को रिहा करने का फैसला लिया है. बिहार में यह कोई पहला प्रयास नहीं है. इससे पहले साल 2018 में भी कई कैदियों को गांधी जयंती के मौके पर रिहा किया गया था. हालांकि, अब सम्राट सरकार ने एक बार फिर इस पहल को आगे बढ़ाया है.

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एआई जेनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर

पटना: बिहार में सीएम सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार ने मानवीय दृष्टिकोण से इस बार गांधी जयंती के मौके पर अलग-अलग जेलों में बंद 44 कैदियों को रिहा करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है. इससे पहले वर्ष 2018 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर 43 कैदियों को जेलों से मुक्त किया गया है. आठ वर्ष बाद फिर से इस वर्ष गांधी जयंती पर बंदियों को रिहाई दी जा रही है. इसके अलावा 2 अक्टूबर को अपराध से पीड़ित परिवारों के परिजनों को भी आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी. लगभग 1 हजार 820 लाभार्थी परिवारों के बीच करीब 3 करोड़ 86 लाख रुपये की राशि वितरित की जाएगी.

जिन लोगों को जेलों से रिहा किया जाएगा उनमें लंबे समय से जेलों में सजा काट रहे और वृद्ध हो चुके कैदियों की संख्या ज्यादा है. इनमें 2 बंदी 90 वर्ष से अधिक आयु के हैं. 8 कैदी 80 वर्ष से अधिक आयु और 20 बंदी 70 से 80 वर्ष की आयु वर्ग के हैं. इसके अलावा गंभीर रोग से पीड़ित एक बंदी को भी मानवीय आधार पर कारामुक्त किया जा रहा है.

कारामुक्त होने वाले बंदियों में एक महिला बंदी भी शामिल हैं, जिन्होंने पूर्णिया जेल में लगभग 20 वर्ष की सजा पूरी की है. कारामुक्त किए जाने वाले बंदियों में रोहतास जेल से मुक्त होने वाले रामबृक्ष कोइरी (उम्र 93 वर्ष), मधेपुरा से योगेश्वर यादव, हरिवंश राम (उम्र 84 वर्ष), रामाशीष यादव (उम्र 82 वर्ष) के अलावा सत्यनारायण सिंह और पंकज गुप्ता शामिल हैं. इनमें सत्यनारायण सिंह और पंकज गुप्ता गंभीर रोग से पीड़ित हैं. ये सभी बंदी लंबे समय तक कारावास की सजा भुगत चुके हैं.

राज्य बंदी परिहार कमेटी की अनुशंसा के आधार पर इन सभी को कारामुक्त किया जा रहा है. राज्य सरकार का यह निर्णय मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक पुनर्वास और जनकल्याण की भावना को ध्यान में रखते हुए लिया गया है. इन वृद्ध और लाचार कैदियों को अपने परिवार और समाज के बीच वापस लौटने का अवसर मिलेगा.



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