MP के ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर मंदिर के शिखर और नंदी से जुड़े हैं कई अद्भुत रहस्य, जानिए पूरी कहानी

MP के ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर मंदिर के शिखर और नंदी से जुड़े हैं कई अद्भुत रहस्य, जानिए पूरी कहानी


मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर मंदिर की बनावट को लेकर श्रद्धालुओं में सबसे ज्यादा कौतूहल गर्भगृह से जुड़ा है. आमतौर पर मंदिरों में गर्भगृह के ठीक ऊपर शिखर दिखाई देता है, लेकिन ओंकारेश्वर मंदिर को लेकर स्थानीय तौर पर यह बात कही जाती है कि यहां गर्भगृह के ठीक ऊपर सामान्य मंदिरों जैसा शिखर नजर नहीं आता. मंदिर के अंदर ज्योतिर्लिंग के स्थान और आसपास बने दूसरे गर्भगृहों को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. इसी वजह से मंदिर की संरचना भक्तों के लिए हमेशा जिज्ञासा का विषय रही है.

ओंकारेश्वर मंदिर की एक और खास बात यहां विराजमान नंदी से जुड़ी है. सामान्य तौर पर शिव मंदिरों में नंदी को भगवान शिव के ठीक सामने स्थापित किया जाता है, लेकिन ओंकारेश्वर में नंदी की स्थिति अलग बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, नंदी को सुरक्षा की दृष्टि से शिवलिंग के ठीक सामने न रखकर एक ओर स्थापित किया गया था. यही वजह है कि मंदिर में आने वाले कई भक्त नंदी की इस अलग स्थापना को देखकर इसके पीछे की कहानी जानना चाहते हैं.

नर्मदा के बीच बना पूरा मांधाता द्वीप दिखता है ॐ के आकार का
ओंकारेश्वर का सबसे बड़ा आकर्षण सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि मांधाता द्वीप भी है. नर्मदा नदी इस क्षेत्र में दो धाराओं में बहती है और इनके बीच बनी भूमि को ऊपर से देखने पर ॐ के आकार जैसा बताया जाता है. इसी वजह से इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है. श्रद्धालु यहां ओंकार पर्वत की परिक्रमा भी करते हैं. स्थानीय धार्मिक परंपरा में करीब सात किलोमीटर की इस परिक्रमा को विशेष महत्व दिया जाता है. देशभर से श्रद्धालु ओंकारेश्वर पहुंचकर ज्योतिर्लिंग दर्शन के साथ नर्मदा और मांधाता क्षेत्र की परिक्रमा करते हैं.

राजा मान्धाता की तपस्या से जुड़ी है ज्योतिर्लिंग की कथा
ओंकारेश्वर से जुड़ी प्रमुख धार्मिक कथा राजा मान्धाता की तपस्या से जुड़ी हुई है. धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में बताया जाता है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धाता ने इस क्षेत्र में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और राजा की प्रार्थना पर इसी क्षेत्र में ‘ओंकार’ रूप में निवास करने का वरदान दिया. इसी कथा को ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है.

यहां पांच शिवलिंगों का भी मिलता है उल्लेख
ओंकारेश्वर क्षेत्र से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में पांच शिवलिंगों का उल्लेख भी मिलता है. इनमें ओंकारेश्वर, महाकालेश्वर, सिद्धनाथ, गुप्तेश्वर और ध्वजेश्वर महादेव के नाम बताए जाते हैं. मंदिर और आसपास के धार्मिक क्षेत्र में इनसे जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं सुनने को मिलती है. यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ओंकारेश्वर सिर्फ एक ज्योतिर्लिंग के दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि कई धार्मिक परंपराओं और कथाओं से जुड़ा पूरा तीर्थ क्षेत्र है.

एक दीपक से जुड़ी भी खास धार्मिक मान्यता
मंदिर से जुड़ी स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में एक दीपक का भी उल्लेख मिलता है. बताया जाता है कि एक ही दीपक में ब्रह्मा, विष्णु और महेश से जुड़ी तीन ज्योतियों की मान्यता है. यह धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है, जिसे मंदिर से जुड़े लोग और श्रद्धालु अलग महत्व के साथ देखते हैं. ऐसी मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं.

रात में भगवान शिव के विश्राम की परंपरा
ओंकारेश्वर मंदिर की सबसे अलग परंपराओं में भगवान शिव के रात्रि विश्राम से जुड़ी मान्यता भी बताई जाती है. मंदिर के पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित के अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि रात में भगवान शिव ओंकारेश्वर में विश्राम करते हैं. इसी मान्यता के चलते रात में मंदिर के कपाट बंद होने से पहले भगवान के विश्राम के लिए चौसर-पासे, झूला और पालना सजाने की परंपरा बताई जाती है. हालांकि विशेष अवसरों और भ्रमण काल के दौरान इन परंपराओं में अस्थायी बदलाव या विराम भी रहता है.

ओरहस्य, आस्था और परंपरा का संगम है ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर मंदिर से जुड़ी इन बातों में कई बातें धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं. मंदिर की अनोखी बनावट, नंदी की अलग स्थापना, मांधाता द्वीप का ॐ जैसा आकार, ओंकार पर्वत की परिक्रमा और भगवान शिव के रात्रि विश्राम से जुड़ी परंपरा भक्तों के बीच हमेशा चर्चा का विषय रहती है. यही वजह है कि ओंकारेश्वर आने वाला श्रद्धालु सिर्फ ज्योतिर्लिंग के दर्शन ही नहीं करता, बल्कि इस पूरे क्षेत्र से जुड़ी धार्मिक कथाओं और परंपराओं को भी जानने की कोशिश करता है.

नर्मदा के तट पर बसा यह ज्योतिर्धाम आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. यहां मंदिर की हर परंपरा के पीछे एक कहानी सुनने को मिलती है और यही कहानियां ओंकारेश्वर को धार्मिक आस्था के साथ-साथ कौतूहल और रहस्य से जोड़ती हैं.



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