Pakistan Balochistan Fight : जिसे पाकिस्तान ने बनाया ‘सौतेला बेटा’, वो गरीब बलूचिस्तान कैसे पालता है अपना पेट, क्या है ‘गोल्डन क्रेसेंट’ वाला श्राप?

Pakistan Balochistan Fight : जिसे पाकिस्तान ने बनाया ‘सौतेला बेटा’, वो गरीब बलूचिस्तान कैसे पालता है अपना पेट, क्या है ‘गोल्डन क्रेसेंट’ वाला श्राप?


पाकिस्तान ने जिस बलूचिस्तान को हमेशा ‘सौतेले बेटे’ की तरह देखा, वहां के लोग आज अपना पेट पालने के लिए किस हद तक मजबूर हैं, ये बात किसी से छिपी नहीं है. प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद ये इलाका गरीबी, बेरोजगारी और सरकारी अनदेखी की मार झेल रहा है. जब जीने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो इंसान भूख मिटाने के लिए गलत रास्तों को चुनने पर मजबूर हो जाता है. बलूचिस्तान के आम लोगों के साथ भी ठीक यही हुआ है. बलूचिस्तान ने गरीबी-भुखमरी से लड़ने के लिए ‘गोल्डन क्रेसेंट’ वाले श्राप को सहारा बना लिया. ये इलाका दुनिया के सबसे बदनाम ड्रग्स रूट में से एक है, जो अब यहां के लोगों के लिए रोजी-रोटी का जरिया बन चुका है.

अमेरिकी बंदूकों से लेकर हेरोइन तक: बलूचिस्तान में कैसे चलता है धंधा?

बलूचिस्तान के बॉर्डर इलाकों में फैली इस काली दुनिया की हकीकत साल 2021 से जुड़ी है. जब अमेरिकी सेना अचानक अफगानिस्तान छोड़कर निकली, तो वहां आधुनिक हथियारों का ढेर लग गया. वहां ऐसी बर्बादी फैली थी कि लोगों के पास खाने तक को कुछ नहीं था, बस मेड इन अमेरिका असॉल्ट राइफलें थीं, जिन्हें बेचकर लोग अपने परिवार के लिए कुछ पैसे कमा सकते थे. लेकिन जब इन हथियारों को बेचने बाजार में उतरा, तो उसे कोई खरीदार ही नहीं मिला.

वजह ये थी कि बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के बॉर्डर पर हथियारों की बाढ़ आ चुकी थी. यहां के नेटवर्क में अब सिर्फ तालिबानी होना या सामान होना काफी नहीं रह गया था. इस धंधे में टिकने के लिए असली चीज है ‘पहुंच और सांठगांठ’. बलूचिस्तान के चेक पोस्टों पर उसी का कब्जा चलता था जिसके पास बड़े अफसरों की सेटिंग, राजनीतिक संरक्षण और पर्याप्त साधन हों. बिना ऊंचे संपर्कों के आप बॉर्डर पार एक राइफल भी नहीं भेज सकते थे.

क्या है ‘गोल्डन क्रेसेंट’ का श्राप?

बलूचिस्तान का भूगोल ऐसा है कि ये अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान की सीमाओं को आपस में जोड़ता है. इसी त्रिकोण को दुनिया भर में ‘गोल्डन क्रेसेंट’ यानी सुनहरा अर्धचंद्र कहा जाता है, जो पूरी दुनिया में नशे की तस्करी का सबसे बड़ा और कुख्यात अड्डा है. जिस जगह पर राज्य सरकारें लोगों को शिक्षा, अस्पताल और रोजगार न दे सकें, वहां स्मगलिंग ही जीवन जीने की कला बन जाती है. बलूच समुदाय के लिए ये अंतरराष्ट्रीय सीमाएं कोई रुकावट नहीं हैं, बल्कि जिंदा रहने का जरिया हैं.

  • सब कुछ बिकता है: यहां सिर्फ नशा ही नहीं, बल्कि नकली सामान, सस्ता डीजल, सोना और हथियार सब कुछ स्मगल होता है.
  • बाड़ में सुराख और रिश्वत: सीमा पर लगी कंटीली तारों के सुराखों से सामान पार कराया जाता है.
  • टैक्स के नाम पर वसूली: बड़े-बड़े ट्रकों के काफिले आधिकारिक बॉर्डर क्रॉसिंग से गुजरते हैं, जहां अनौपचारिक ‘टैक्स’ यानी रिश्वत लेकर अवैध सामान को अनदेखा कर दिया जाता है.

मुजाहिद्दीन और सोवियत संघ के युद्ध के दौर में जो हेरोइन लैब और ट्रांसपोर्टरों का ढांचा तैयार हुआ था, वही नेटवर्क आज भी बलूचिस्तान में फल-फूल रहा है.

तालिबान का दोहरा खेल: दुनिया के सामने सफाई, पर्दे के पीछे कमाई

दूसरी तरफ, काबुल की सत्ता पर काबिज तालिबान दुनिया के सामने अपनी छवि बदलने की पूरी कोशिश कर रहा है. साल 2025 में रूस ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दे दी, जबकि चीन और खाड़ी देशों ने उनके राजनयिकों को स्वीकार कर लिया है. बीजिंग से लेकर इस्तांबुल तक की विदेशी कंपनियां खनिजों के सौदे कर रही हैं. तालिबान विदेशी सरकारों को वही सुना रहा है जो वे सुनना चाहती हैं, जैसे अफीम पर बैन और आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा. लेकिन बलूचिस्तान के बॉर्डर पर जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.

  1. दिखावे की कार्रवाई: तालिबान दावा करता है कि उसने अफीम की खेती और हथियारों की तस्करी रोक दी है, लेकिन ये कार्रवाई सिर्फ छोटे किसानों और गरीब स्मगलरों तक सीमित है.
  2. बड़े तस्करों को छूट: बड़े ड्रग माफिया और तालिबान के शीर्ष कमांडरों के करीबी तस्कर आज भी बेरोक-टोक अपना धंधा चला रहे हैं.
  3. खेती की नई जगहें: हेलमंद और कंधार में अफीम की खेती कम जरूर हुई, लेकिन ये उत्तर-पूर्वी इलाकों और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में शिफ्ट हो गई. इसके अलावा, मेथामफेटामिन और हेरोइन की तस्करी लगातार जारी है.

जब जुर्म ही बन जाए बलूचिस्तान की राजनीति

बलूचिस्तान में आज अपराध कोई अलग से होने वाली गतिविधि नहीं है, बल्कि यही वहां का असली राजनीतिक और आर्थिक ढांचा बन चुका है. स्थानीय कबीलाई सरदार, तालिबानी बिचौलिए और सीमा पार के तस्कर मिलकर एक ऐसा नेटवर्क चलाते हैं, जिसे सरकार और अधिकारियों का मौन समर्थन हासिल है. ये लोग कंधार और काबुल के तालिबानी आकाओं और स्थानीय जनता के बीच तालमेल बिठाते हैं.

इस पूरे खेल में नुकसान सिर्फ आम बलूच जनता का हो रहा है. उनकी जमीन के प्राकृतिक संसाधनों को लूटा जा रहा है, उनसे सस्ती मजदूरी कराई जाती है और उनकी तकलीफों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. तालिबान की सुरक्षा सेना में 30 फीसदी कटौती के बाद कई लोग बेरोजगार हो गए हैं.

इस श्राप और दलदल से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

बलूचिस्तान की कहानी तालिबान के दोहरे रवैये और पाकिस्तान की ऐतिहासिक अनदेखी का सबसे बड़ा सबूत है. एक तरफ दुनिया को स्थिरता और सख्त कानून का झांसा दिया जाता है, तो दूसरी तरफ इसी गैर-कानूनी स्मगलिंग के पैसों से सत्ता की जड़ों को मजबूत किया जाता है. जब तक बलूचिस्तान के आम नागरिकों को बराबरी का हक और ईमानदारी से पेट भरने के मौके नहीं मिलेंगे, तब तक ‘गोल्डन क्रेसेंट’ का ये श्राप इस इलाके का पीछा नहीं छोड़ेगा.



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