पितृ विसर्जन अमावस्या: पिंडदान-तर्पण से मिलेगा पूर्वजों का आशीर्वाद
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Pitru Paksha: धर्मनगरी हरिद्वार में इस बार पितृ विसर्जन अमावस्या पर पूर्वजों की शांति और मोक्ष के लिए दुर्लभ संयोग बन रहा है. यदि आप पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या अज्ञात पूर्वजों की तिथि ज्ञात नहीं है, तो मोक्षदायिनी मां गंगा के पावन तट पर किया गया तर्पण और पिंडदान पितृ दोष से सदा के लिए मुक्ति दिला सकता है.
हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार को मोक्ष का द्वार कहा गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार मां गंगा गोमुख से निकलकर पहाड़ों के दुर्गम रास्तों से होते हुए समतल क्षेत्र हरिद्वार में सबसे पहले प्रवेश करती हैं, जहां गंगा की दिव्यता कई गुना बढ़ जाती है. राजा सगर के 60 हज़ार पुत्रों का उद्धार भी गंगा की इसी पवित्र धारा ने किया था. समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश से अमृत की बूँदें भी हरिद्वार के ‘हर की पौड़ी’ पर छलकी थीं.
पितृ विसर्जन अमावस्या का पावन अवसर
पितृ विसर्जन अमावस्या इस साल 10 अक्टूबर को होगी. यह तिथि पूर्वजों की विदाई का प्रतीक है, साथ ही जाने-अनजाने में छूटे हुए पितृ ऋण से मुक्ति पाने और अतृप्त आत्माओं को शांति दिलाने का सबसे दुर्लभ और कल्याणकारी अवसर भी माना जाता है. इसकी जानकारी देते हुए पंडित हरीश जोशी ने कहा कि मां गंगा के गोमुख से निकलकर समतल क्षेत्र हरिद्वार में सबसे पहले प्रवेश करने के कारण यहां गंगा स्नान और पितृ कर्म का फल कई गुना बढ़ जाता है. हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड के ब्रह्मा की तपस्थली होने के कारण इसका महत्त्व शास्त्रों में वर्णित है. हर की पौड़ी पर तर्पण करने का विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है.
अज्ञात पितरों के लिए सर्वोत्कृष्ट दिन
पंडित हरीश जोशी ने बताया कि पितृ पक्ष के दिनों में यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश अपने पितरों-पूर्वजों का श्राद्ध न कर पाए या जिन अज्ञात पितरों की तिथि मालूम न हो, उनकी शांति के लिए पितृ विसर्जन अमावस्या का दिन सर्वश्रेष्ठ होता है. अमावस्या के दिन गंगा की अविरल धारा में तर्पण करने से पितृ तृप्त होकर अपने लोक लौट जाते हैं.
प्रमुख घाट और अनुष्ठान का फल
पंडित हरीश जोशी ने आगे जानकारी दी कि हरिद्वार के गंगा घाटों कुशावर्त घाट, ब्रह्मकुंड घाट, अस्थि विसर्जन घाट और प्राचीन नारायणी शिला पर पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन पिंडदान, तर्पण, देव-पितृ हवन और दीपदान करने से अधोगति गए पितरों और प्रेत योनि में भटकी आत्माओं को सद्गति मिलती है. शास्त्रों के अनुसार जो पूर्वज किसी कारणवश नाराज़ हो जाते हैं, उनका अमावस्या की तिथि पर श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान आदि करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं. विधि-विधान से संपन्न इस अनुष्ठान के बाद जातक को जाने-अनजाने में हुए दोषों से भी मुक्ति मिल जाती है और पितृ अपने वंशजों को अखंड सौभाग्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि आदि का आशीर्वाद देकर विदा हो जाते हैं.