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Kota: कोटा के किशोर सागर तालाब की पाल पर स्थित 1745 में बनी ऐतिहासिक बारहद्वारी आज युवाओं का प्रमुख हॉटस्पॉट बन चुकी है. इसका निर्माण कोटा के तत्कालीन महाराव ने उदयपुर की राजकुमारी महारानी ब्रज कंवर की इच्छा पर करवाया था. कभी राजपरिवार के पिकनिक और आराम के लिए बनी यह बारहद्वारी 1989 से मूर्ति विसर्जन का मुख्य केंद्र भी है. खूबसूरत जगमंदिर, हरियाली और ठंडी हवाओं के कारण यह स्थान आज वॉक, फोटोशूट और सुकून भरे पल बिताने के लिए शहरवासियों की पहली पसंद है.
Kota Kishore Sagar Barahdwari History: राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा में किशोर सागर तालाब की पाल पर स्थित 12 स्तंभों वाला ऐतिहासिक मंडप यानी बारहद्वारी आज युवाओं और पर्यटकों के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाना बन चुका है. कभी राजघरानों के आराम करने, एकांत में ठंडी हवा का आनंद लेने और सूर्यास्त के विहंगम दृश्य को निहारने के लिए बनाई गई यह राजपूताना धरोहर अब शहर का प्रमुख हॉटस्पॉट बन चुकी है. चारों तरफ लहराता किशोर सागर तालाब का पानी, बीच में स्थित जगमंदिर, आसपास घने हरे-भरे पेड़ और ऐतिहासिक बारहद्वारी का शांत वातावरण शाम ढलते ही शहरवासियों और युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है.
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के विशेषज्ञ मुकेश कुमार के अनुसार, किशोर सागर तालाब की बारहद्वारी और बीच तालाब में स्थित जगमंदिर का निर्माण वर्ष 1745 के आसपास हुआ था. इसका इतिहास कोटा और मेवाड़ के ऐतिहासिक रिश्तों से गहराई से जुड़ा हुआ है. जब कोटा के तत्कालीन महाराव का विवाह मेवाड़ (उदयपुर) की राजकुमारी ब्रज कंवर के साथ हुआ, तब महारानी ने कोटा में अपने पीहर उदयपुर की तर्ज पर बनी खूबसूरत झीलों और जलमहलों की इच्छा व्यक्त की थी. महारानी ब्रज कंवर की इसी खास पसंद और इच्छा को ध्यान में रखते हुए कोटा महाराव ने किशोर सागर तालाब के बीचों-बीच जगमंदिर महल और उसकी पाल पर सुंदर बारहद्वारी का निर्माण करवाया था.
रियासत काल का शाही पिकनिक स्पॉट
रियासत काल के दौरान यह बारहद्वारी और जगमंदिर कोटा राजपरिवार के लिए एक प्रमुख शाही पिकनिक और मनोरंजन का स्थान हुआ करता था. दशहरा, दिवाली, गणगौर जैसे पारंपरिक धार्मिक त्योहारों और स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर यहां राजपरिवार के लिए विशेष झूले लगाए जाते थे और भव्य सांस्कृतिक आयोजन होते थे. इसके साथ ही धार्मिक आयोजकों और साधु-संतों द्वारा यहां विशाल हवन और अनुष्ठान भी संपन्न किए जाते थे. समय के बदलाव के साथ-साथ इस ऐतिहासिक स्थान की भूमिका में भी कई महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं.
1989 के बाद मूर्ति विसर्जन का प्रमुख केंद्र
1989 से पहले कोटा शहर में गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं का प्रमुख विसर्जन चंबल नदी के तट पर किया जाता था. हालांकि 1989 के बाद सुरक्षा और धार्मिक जुलूसों की सुलभता को देखते हुए प्रतिमाओं का विसर्जन किशोर सागर तालाब की इसी पाल और बारहद्वारी के पास किया जाने लगा. इसके अलावा, वर्तमान समय में यह स्थान रोजाना शाम को वॉक करने आने वाले लोगों, युवाओं के प्री-वेडिंग व सोशल मीडिया फोटोशूट के लिए पहली पसंद बन गया है. नए कोटा में कई आधुनिक निर्माण हुए हैं, लेकिन पुराने शहर की इस बारहद्वारी जैसी प्राकृतिक सुंदरता और सुकून किसी अन्य स्थान पर देखने को नहीं मिलता.
संरक्षण और संवर्धन के प्रयास
स्थानीय प्रशासन और कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) के सहयोग से पुरातत्व विभाग इस ऐतिहासिक विरासत के मूल स्वरूप को संवारने और संरक्षित करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है. तालाब के पानी से टकराकर आने वाली ठंडी हवाएं और चारों ओर फैली हरियाली शाम होते ही लोगों को एक अलग ही सुकून प्रदान करती हैं. इतिहास के पन्नों को समेटे हुए यह 280 साल पुरानी राजपूताना धरोहर आज की युवा पीढ़ी के लिए इतिहास से जुड़ने और सुकून के कुछ पल बिताने का सबसे सुंदर जरिया बन चुकी है.