500 साल पुराना अनोखा शनि मंदिर! साल में 4 महीने पानी में डूबा रहता है, चरण छूते ही उतरने लगता है जल

500 साल पुराना अनोखा शनि मंदिर! साल में 4 महीने पानी में डूबा रहता है, चरण छूते ही उतरने लगता है जल


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छतरपुर का प्राचीन शनि मंदिर 4 महीने रहता है पानी में डूबा, जानें इसकी मान्यता

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छतरपुर जिले के मऊसहानिया गांव में जगत सागर तालाब के बीचों-बीच स्थित एक प्राचीन शनि मंदिर हर साल 4 महीने पानी में डूबा रहता है. मान्यता है कि तालाब का पानी भगवान के चरणों को छूने के बाद ही कम होता है.

मप्र के छतरपुर जिले में एक ऐसा भी मंदिर है जो साल में 4 महीने पानी में डूबा रहता है. दरअसल, जिले से लगभग 17‌ किमी दूर मऊसहानिया गांव में जगत सागर तालाब के बीचों-बीच एक ऐसा शनि मंदिर है, जो हर साल 4 महीने के लिए पानी में डूब जाता है. मान्यता है कि तालाब का पानी भगवान के चरणों को छूने के बाद ही कम होता है. जिसके बाद ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है.

शनि मंदिर के पुजारी अजय चंदोरिया बताते हैं कि वह इस मंदिर की देखरेख साल 2008 से कर रहे हैं.‌ हर साल ही मंदिर में तालाब का पानी भर जाता है. कलेक्टर के आदेश के बाद श्रद्धालुओं को यहां आने से रोकते हैं. जब पक्की सड़क नहीं बनी थी तो पहले 6 महीने के लिए भी ये मंदिर बंद हो जाता था. हालांकि, अब तालाब के बीच से पक्की सड़क बनी है. इसलिए श्रद्धालु मंदिर परिसर तक तो आ जाते हैं लेकिन मेन मंदिर में 3 फीट की गहराई तक पानी घुसा है. इसलिए श्रद्वालुओं के लिए अंदर जाना मना है. सुबह-शाम हम ह पानी में उतरकर पूजा करने जाते हैं.

पिछले 2 सालों से अधिक बारिश हो रही
वहीं मंदिर से जुड़े छोटू रिछारिया बताते हैं कि पिछले 2 सालों से अधिक बारिश हो रही है. पिछले साल तो इतनी बारिश हुई थी कि ये मंदिर 8 महीने तक बंद रहा. श्रद्धालुओं को इतने महीनों तक दर्शन ही नहीं मिले. फिलहाल 1 महीने से मंदिर में जलभराव है. आगे ये पानी और बढ़ सकता है. इसलिए रैलिंग भी लगा रहे हैं ताकि श्रद्धालु गहरे पानी में न उतरे.

500 साल पुराना मंदिर
पुजारी के मुताबिक ये मंदिर करीब 500 साल पुराना है. पांच सौ सालों से यहां का माहौल भक्तिमय रहता है. इस प्राचीन धार्मिक स्थल की खास बात यह है कि यह मंदिर जगत तालाब के बीचों-बीच बना हुआ है, और श्रद्धालुओं को पानी के बीच से गुजर कर इस मंदिर तक पहुंचना पड़ता है. महाराज छत्रसाल के पुत्र जगत सिंह ने मंदिर और तालाब का निर्माण कराया था.

अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित
पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में अष्टधातु की शनि देव प्रतिमा के साथ-साथ नौ ग्रहों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, इसलिए इसे शनि नवग्रह मंदिर कहा जाता है. नौ ग्रहों की प्रतिमाएं भक्तों की आस्था को और मजबूत बनाती हैं साथ ही उन्हें भगवान और आस्था से जोड़े रखती हैं. साथ ही शनि शिला रुप में रूद्र अवतार में भी स्थापित हैं जिनकी स्थापना साल 2008 में हुई थी.

तालाब का पानी चरणों को छूने आता
पुजारी बताते हैं कि इस बार बरसात अधिक होने की वजह से इस मंदिर के प्रांगण में तालाब का पानी अभी तक भरा हुआ है, हालांकि भक्तों को यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क की सुविधा भी उपलब्ध है. हर साल ही बारिश होती है और ये पानी शनि भगवान के चरणों को धुलने के बाद ही कम होता है. तालाब का पानी हर साल शनि भगवान के चरणों को छूने जाता है. तालाब और मंदिर दोनों ही 500‌ साल से ज्यादा पुराने हैं. तालाब का पानी जब तक शनि भगवान के चरणों को धुलता नहीं है जब तक पानी का स्तर कम नहीं होता है. शनि भगवान से जुड़ी ये मान्यता सालों पुरानी है.‌ हालांकि, मंदिर परिसर से मोटरों से पानी बाहर करते हैं लेकिन जब पानी चरणों को छू लेता है तो स्वत: ही उतरने लगता है.



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