रूस में आगे भी डीजल एक्सपोर्ट पर रहेगा बैन, ट्रंप भी लेने वाले हैं फैसला, भारत को इसका फायदा या नुकसान?

रूस में आगे भी डीजल एक्सपोर्ट पर रहेगा बैन, ट्रंप भी लेने वाले हैं फैसला, भारत को इसका फायदा या नुकसान?


रूस ने डीजल एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदी अक्टूबर के आखिर तक बढ़ा दी है. यानी दुनिया के बड़े डीजल निर्यातकों में शामिल रूस फिलहाल अपने यहां से डीजल की सप्लाई बढ़ाने की स्थिति में नहीं है. ऐसे समय में यह फैसला आया है, जब ईरान युद्ध और यूक्रेन के हमलों के कारण दुनिया के ऊर्जा बाजार में पहले से ही उथल-पुथल है. अमेरिका में डीजल की कीमत 6.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंचने और यूरोप में डीजल महंगा होने से चिंता बढ़ गई है. अब सवाल है कि रूस के इस फैसले से भारत को फायदा होगा या महंगे ईंधन की मार झेलनी पड़ेगी?

रूस की सरकार ने बुधवार को साफ किया कि डीजल एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध अक्टूबर के अंत तक जारी रहेगा. सरकार के मुताबिक, घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को काबू में रखने और खेती के सीजन में बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए यह फैसला लिया गया है. यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस की कई तेल रिफाइनरियों का काम भी प्रभावित हुआ है. इससे ईंधन उत्पादन और सप्लाई पर दबाव पड़ा है. रूस पहले भी पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर पाबंदियां लगा चुका है. कुछ देशों को सरकारी समझौतों के तहत छूट दी गई है, लेकिन कुल मिलाकर रूस की ओर से वैश्विक बाजार में उपलब्ध डीजल की सप्लाई पर दबाव बना हुआ है.

दुनिया में डीजल की किल्लत, कीमतों में आग का खतरा

रूस का यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में डीजल की उपलब्धता और कीमतें चिंता का विषय बन गई हैं. अमेरिका में डीजल 6.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच चुका है. यूरोप में भी कच्चे तेल और डीजल के बीच कीमत का अंतर काफी बढ़ गया है. फरवरी के आखिर में यूरोप में यह अंतर करीब 28 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब लगभग 82 डॉलर तक पहुंच गया है. इसका मतलब है कि कच्चे तेल को डीजल में बदलने के बाद मिलने वाले उत्पाद की कीमत पर भारी दबाव है. ईरान से जुड़े युद्ध और यूक्रेन के हमलों ने सप्लाई की मुश्किलें बढ़ाई हैं. अगर रूस की पाबंदी के साथ दूसरे देशों से सप्लाई भी प्रभावित होती है, तो डीजल महंगा होने का खतरा और बढ़ सकता है.

भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए इसका जवाब सीधा नहीं है. रूस का डीजल एक्सपोर्ट घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई कम हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं. अगर ऐसा होता है, तो भारत में डीजल खरीदने वाली कंपनियों और ईंधन की लागत पर दबाव पड़ सकता है. दूसरी ओर, भारत खुद भी रिफाइनिंग क्षमता वाला बड़ा देश है और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है. अगर भारतीय रिफाइनरियों के पास पर्याप्त कच्चा तेल और उत्पादन क्षमता है, तो वे कुछ बाजारों में सप्लाई बढ़ाने का अवसर तलाश सकती हैं. लेकिन इसका फायदा तभी होगा, जब भारत को कच्चा तेल सही कीमत पर मिले और निर्यात की लागत व घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बना रहे. इसलिए रूस के फैसले को भारत के लिए अपने आप में फायदा नहीं माना जा सकता.

भारत के पेट्रोल-डीजल पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, रुपये-डॉलर की विनिमय दर, टैक्स और तेल कंपनियों की लागत जैसे कई कारक असर डालते हैं. रूस के डीजल निर्यात पर प्रतिबंध से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल महंगा होता है, तो परिवहन, ट्रक संचालन, खेती और माल ढुलाई की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है. इसका असर आगे चलकर खाद्य पदार्थों और दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, केवल रूस की पाबंदी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे. इसके लिए कच्चे तेल की कीमत, भारतीय रिफाइनरियों की सप्लाई और घरेलू मूल्य निर्धारण की स्थिति भी देखनी होगी.

ट्रंप भी डीजल एक्‍सपोर्ट पर रोक लगाने की सोच रहे

दुनिया के ऊर्जा बाजार में दबाव इतना बढ़ा है कि अमेरिका में भी ईंधन निर्यात पर रोक लगाने की चर्चा हो रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह ईंधन निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. अमेरिका में डीजल की ऊंची कीमतें घरेलू राजनीति के लिए भी चुनौती बन रही हैं. अगर अमेरिका भी निर्यात रोकता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध डीजल की मात्रा और घट सकती है. यूरोप के लिए यह विशेष रूप से मुश्किल स्थिति होगी, क्योंकि वहां डीजल की कीमत पहले ही तेजी से बढ़ी है. कुछ अनुमानों के मुताबिक, अमेरिकी ईंधन निर्यात पर रोक लगने की स्थिति में यूरोप में डीजल की कीमतों में 50 फीसदी तक उछाल का जोखिम हो सकता है. यह अनुमान है, तय नतीजा नहीं.

भारत के लिए असली खतरा क्या है?

भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल और कच्चे तेल की कीमतें कितनी देर तक ऊंची रहती हैं. रूस की पाबंदी अक्टूबर के आखिर तक जारी रहने से बाजार को तुरंत अतिरिक्त सप्लाई मिलने की उम्मीद कम हो सकती है. अगर ईरान से जुड़े संघर्ष और यूक्रेन के हमले भी जारी रहते हैं, तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है. भारतीय रिफाइनरियों को कुछ निर्यात अवसर जरूर मिल सकते हैं, लेकिन महंगा कच्चा तेल और महंगे पेट्रोलियम उत्पाद घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं.



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