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Jehanabad Dharohar: बिहार का जहानाबाद जिला ऐतिहासिक जिला कहा जाता है. यहां की धरती पर अनेकों ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जो आपको अतीत से रूबरू करवाते हुए नजर आएंगे. इस जिले की मिट्टी पर सम्राट अशोक के अस्तित्व भी मिले तो मुग़ल काल का भी निशान नजर आया. इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध की भी मूर्तियां इसकी ऐतिहासिकता को जीवंत करती हैं. इन सभी ऐतिहासिक जगहों में से एक है गंधार मठ. गंधार मठ, जहानाबाद जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी की दूरी पर है. इस मठ का आर्किटेक्चर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह मठ एक किला जैसा है.
पुराने लोग गंधार मठ को 800 वर्ष पुराना बताते हैं. मठ के अंदर एक नेम प्लेट बना हुआ है, जिस पर यह अंकित है कि कितने साधु संत ने मठ में सेवा दी है. नेम प्लेट में दर्ज रिकॉर्ड के अनुसार, अब तक 12 संत सेवा दे चुके हैं और उनका निधन भी हो चुका है. वहीं, बाबा महेशनाथ को इस मठ का स्थापना कर्ता बताया जाता है.
यह महंत बहुत सिद्धि वाले थे. इस मठ की बनावट भले ही बहुत पुरानी शैली में आपको दिखाई पड़ रहा हो, लेकिन बहुत मजबूत है. बहुत ही अलग ढंग से मठ के मुख्य द्वार, चहारदीवारी और उस पर बनी कलाकृतियां के साथ मंदिर का निर्माण का भी निर्माण हुआ है. इसे देखकर आपको यह समझ आ जाएगा कि उस दौर में भी इंजीनियर कमाल के होते थे.
स्थानीय सह पुजारी राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि गंधार मठ का 800 साल पुराना इतिहास है. इस मठ में कुल 7 आंगन था, जो आज भी आपको देखने को मिल जाएगा. हालांकि, वो देख रेख के अभाव में जंगल झाड़ में तब्दील हो चुका है. इसके अलावा यहां कई सौ बीघा में मठ की खुद की जमीन थी. मंदिर के साथ -साथ कुआं और रहने का आवास भी बना हुआ था. इसकी स्थापना बाबा महेशनाथ ने की थी.
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वह आगे कहते हैं कि बाबा के बारे में कहानी हमारे पूर्वज बताते हैं. जो इस प्रकार है. गंधार मठ से कुछ किमी दूर देवरा मठ है. वहां के बाबा, गंधार मठ के बाबा महेशनाथ से मिलने को आ रहे थे. बाघ की सवारी कर पहुंचने वाले थे. जब इसकी सूचना गंधार मठ के महंत को मिली तो वो उस वक्त दातून कर रहे थे.
जिस स्थान पर बाबा बैठकर दातुन कर रहे थे, उसी बीच यह सूचना मिली तो यह सोच में पड़ गए कि अब हम कैसे पहुंचेंगे. मिलन का स्थान तय किया हुआ बंधुगंज हाई स्कूल के बगल का इलाका था. यहां से बाबा महेशनाथ जिस स्थान पर बैठे थे, वही स्थान उठकर चल पड़ा. इस प्रकार दोनों का मिलन महेशगंज में हुआ. तब से उस इलाके का नाम महेशगंज पड़ गया, जो आज भी सर्वे रिकॉर्ड में दर्ज है.
वहीं, राजेंद्र प्रसाद का कहना है कि इसकी ऐतिहासिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहीं से कुछ समय पहले ही पांडुलिपि भी प्राप्त हुई है. यह पांडुलिपि करीब 400 साल पुराना है, जिस पर अंकित भाषा पता नहीं लग पाता है. इसकी सूचना जिला प्रशासन को भी दी गई है और कुछ सूचना लेकर टीम गई भी है. यहां शिवरात्रि में भव्य पूजा आयोजित किया जाता है.