कौन है राजा वीरप्पा? औरंगजेब को ‘चप्पल’ से सिखाया था सबक, अब NCERT पढ़ाएगी
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NCERT की 9वीं क्लास की नई किताब ‘अंडस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में आरंगजेब की चप्पल और मदुरै के राजा वीरप्पा नायक की कहानी भी पढ़ाई जाएगी. इस किताब में 1000-1700 ईस्वी का जिक्र है कि लोगों ने ‘बाहरी हमलों’ का प्रितरोध कैसे किया. मुगल सम्राट औरंगजेब ने विभिन्न राज्यों के साथ अपनी चप्पल भेजने की प्रथा अपनाई थी.
कौन है राजा वीरप्पा? औरंगजेब को ‘चप्पल’ से सिखाया था सबक
एनसीईआरटी अब 9वीं क्लास के बच्चों को मदुरै के राजा वीरप्पा की कहानी के बारे में पढ़ाने जा रही है. राजा वीरप्पा वहीं हैं, जिन्होंने औरंगजेब को एक ‘चप्पल’ से सबक सिखाया था. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT ने 9वीं क्लास की पाठ्यपुस्तकों में नई किताब जोड़ी है. सामाजिक विज्ञान की ये किताब ‘अंडस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ के टाइटल से प्रकाशित हुई है. इस किताब में 1000-1700 ईस्वी का जिक्र है कि लोगों ने ‘बाहरी हमलों’ का प्रितरोध कैसे किया. इसी चेप्टर में रंगकृष्ण मुथु वीरप्पा नायक का भी जिक्र आता है, जिन्होंने औरंगजेब के घमंड को मसल दिया था.
रामायण में इस बात का जिक्र है कि कैसे श्रीराम के वनवास के बाद राजा भरत अपने बड़े भाई की चरण पादुका को सिंहासन पर रखकर आयोध्या के राजा बने थे. लेकिन जहां ये कथा भाइयों के प्रेम और परस्पर सम्मान की कहानी दिखाती है. वहीं दूसरी तरफ मुगलों के समय में भारत में उनके द्वारा अलग तरह की प्रथा चलती थी. ऐसी कथाएं प्रचलित हैं कि मुगल सम्राट अलग-अलग राज्यों में अपनी चप्पल भेजा करते थे. जिस राज्य में ये चप्पल पहुंचती थी, उनसे उम्मीद की जाती थी कि उस राज्य के मंत्री और राजा उस चप्प्ल के सामने झुकें. लेकिन राजा वीरप्पा ने ऐसा नहीं किया.
औरंगजेब राजाओं के पास भेजता था अपनी चप्पल
‘द मदुरा कंट्री: ए मैनुअल’ नामक किताब लिखने वाले जे.एच. नेल्सन ने अपनी इस पुस्तक में औरंगजेब की इस चप्पल और इस कहानी का जिक्र किया है. किताब बताती है कि मुगल सम्राट औरंगजेब ने विभिन्न राज्यों के साथ अपनी चप्पल भेजने की प्रथा अपनाई थी. पहले मंत्री इस चप्पल के सामने झुकते और फिर सम्मान से इसे सिंहासन पर रखते थे. यही औरंगजेब के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका था. लेकिन मदुरै के राजा रंगकृष्ण मुथु वीरप्पा नायक ने न केवल प्रथा को चुनौदी दी, बल्कि चप्पल लाने वाले सम्राट के दूतों को मौत के घाट भी उतार दिया.
द मदुरा कंट्री: ए मैनुअल’ नामक किताब लिखने वाले जे.एच. नेल्सन ने अपनी इस पुस्तक में औरंगजेब की इस चप्पल और इस कहानी का जिक्र किया है.
हाथी पर सवार, ढोल के साथ आती थी चप्पल
तमिलनाडु अभिलेखागार और ऐतिहासिक अनुसंधान विभाग की पुनः प्रकाशित नियमावली के अनुसार, औरंगजेब की ये चप्पल शाही हाथी पर बड़े धूमधाम और भव्यता के साथ लाया गया था. इस चप्पल के साथ कई सैनिक और ढोल-नताशे बजाने वाले भी चल रहे थे. जब ये ‘शाही चप्पल’ तिरुचि के उत्तर में स्थित सीमा तक पहुँची, तो युवा राजा रंगकृष्ण मुथु वीरप्पा नायक को इसके बारे में जानकारी मिल गई. ये सुनकर वो काफी गुस्से में आ गए और अपने सैनिकों के माध्यम से ये संदेश भेज दिया कि वो काफी बीमारी हैं और चप्पल देखने के लिए बाहर नहीं आ पाएंगे. बादशाह के सैनिक पहले तो भड़के लेकिन फिर तिरुचि के किले में अंदर जाने के सिवाए उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा.
राजा वीरप्पा नायक को देख दूत रह गए भौंचक्के
ऐसा कहा गया है कि औरंगजेब के दूतों तो अंदर गए पर सेना बाहर ही रही. जबरदस्ती इंतजार करवाने और काफी अनादर करने के बाद इन दूतों को राजा वीरप्पा के सामने ले जाया गया. लेकिन दरबार का माहौल देख इन दूतों की आंखें फटी रह गईं. जिस राजा के बीमार होने की बात सुनी थी, वो भव्य सिंहासन पर विराजमान हैं, बेहद भव्य वस्त्रों और चमकदार गहनों से सजे हुए. आसपास कई दरबारी उन्हें घेरे हुए हैं. ये दूत बिना कुछ सोचे आगे सिंहासन की तरफ बढ़े और चप्पल राजा की तरफ फेंक दी. ताकि वो उसके सामने झुकें.
नेल्सन अपनी किताब में आगे लिखते हैं, ‘राजा गद्दी से उठे और गरजते हुए चप्पल जमीन पर रखने का आदेश दिया. घबराए नवाबों ने तुरंत वहीं किया. राजा वीरप्पा ने चप्पल में अपना पैर डाला और दमदार अवाज में पूछा, ‘दूसरी चप्पल कहां हैं?’ औरंगजेब के दूत हैरान थे. उन्हें शायद इसकी उम्मीद नहीं थी. ऐसा बताया गया है कि बाद में इन नवाबों को बैंत से पीटा गया और किले से बाहर निकला दिया गया. सिर्फ इन दूतों को ही नहीं, बल्कि वीरप्पा नायक ने औरंगजेब की इस सेना पर भी आक्रमण कर उन्हें अपने राज्य से खदेड़ दिया था.
हालांकि सीपीआई (एम) सांसद और मदुरै पर आधारित उपन्यास ‘कावल कोट्टम’ के लेखक सु. वेंकटेशन मानते हैं कि इतने सबूत नहीं है कि इस कहानी को सही माना जाए. वहीं खुद नेल्सन भी अपनी किताब में इस कहानी को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. उनका कहना है कि ‘परिस्थितिजन्य समानता और निरंतरता इसे विश्वस्नीय बनाती है.’