मचान विधि से किसान कर रहे खीरे की खेती, 2 बीघा में रोजाना एक कुंतल उत्पादन, दिल्ली-कानपुर तक हो रही सप्लाई

मचान विधि से किसान कर रहे खीरे की खेती, 2 बीघा में रोजाना एक कुंतल उत्पादन, दिल्ली-कानपुर तक हो रही सप्लाई


लखीमपुर खीर: जिले में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ सब्जियों की खेती की ओर भी रुख कर रहे हैं. कम समय में तैयार होने वाली सब्जियों में खीरे की खेती किसानों के लिए आमदनी का एक जरिया बन रही है. जिले के बांकेगंज, मोहम्मदी और बरवर क्षेत्र में किसान बड़े पैमाने पर खीरे की खेती कर रहे हैं. अच्छी देखभाल और अनुकूल मौसम मिलने पर बुवाई के करीब 45 से 60 दिन बाद खीरे की तुड़ाई शुरू हो जाती है.

खीरे की खासियत यह है कि फसल तैयार होने के बाद एक साथ पूरी उपज खेत से नहीं निकालनी पड़ती. फल की गुणवत्ता और आकार के अनुसार नियमित अंतराल पर तुड़ाई की जाती है. इससे किसान लगातार बाजार में खीरा भेज सकते हैं. स्थानीय बाजार के साथ आसपास के बड़े शहरों में भी खीरे की मांग रहने से किसानों को अपनी उपज बेचने का बाजार मिल जाता है.

मचान विधि से भी करें खीरे की खेती

खीरे की बेल जमीन पर फैलने के बजाय मचान पर चढ़ाकर भी उगाई जा सकती है. मचान विधि में पौधों को ऊपर चढ़ने के लिए रस्सी, तार, बांस या अन्य सहारे दिए जाते हैं. बेलों को ऊपर चढ़ाने से फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, जिससे फल अपेक्षाकृत साफ रहते हैं. साथ ही खेत में निराई-गुड़ाई, निगरानी और तुड़ाई करने में भी सुविधा होती है. मचान तैयार करने में किसान अपनी सुविधा और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार बांस, तार और रस्सी का इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि इसकी लागत खेत के आकार और इस्तेमाल होने वाली सामग्री के अनुसार अलग-अलग होती हैं. खीरे की फसल को पर्याप्त नमी की जरूरत होती है, लेकिन खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहना पौधों के लिए नुकसानदायक हो सकता है. तराई क्षेत्र में बारिश के दौरान जलभराव की स्थिति बनने पर किसानों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.

गर्म मौसम में फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई कितने अंतराल पर करनी है, यह मिट्टी, तापमान, मौसम और फसल की अवस्था पर निर्भर करता है. बारिश होने की स्थिति में खेत की नमी देखकर ही सिंचाई करें. खेत में अतिरिक्त पानी जमा होने पर उसकी निकासी की व्यवस्था करना जरूरी है.

रोज तोड़ते हैं दो कुंतल खीरा

खीरे की खेती करने वाले किसान रामाअसरे ने बताया कि वह पिछले दो वर्षों से लगातार करीब दो बीघा जमीन में खीरे की खेती कर रहे हैं. उनके अनुसार इस समय खेत से प्रतिदिन करीब एक कुंतल से अधिक खीरे का उत्पादन हो रहा है. वर्तमान में उन्हें खीरे का भाव करीब 25 से 30 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा है. किसान का कहना है कि बाजार भाव और उत्पादन अच्छा रहने पर खीरे की खेती से बेहतर आमदनी प्राप्त की जा सकती है. हालांकि खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, मचान और परिवहन समेत कई तरह की लागत भी आती है. इसलिए वास्तविक मुनाफा लागत और बाजार भाव के आधार पर ही तय होता है.

दिल्ली और कानपुर तक भेजा जा रहा खीरा

व्यापारी आशीष गुप्ता बताते हैं कि लखीमपुर खीरी जिले के बांकेगंज, मोहम्मदी और बरवर क्षेत्र में इस समय बड़े पैमाने पर खीरे की खेती हो रही है. यहां तैयार होने वाला खीरा स्थानीय बाजारों के अलावा दूसरे शहरों तक भी भेजा जा रहा है. उन्होंने बताया कि किसानों की उपज को ट्रांसपोर्ट के माध्यम से दिल्ली और कानपुर समेत अन्य बाजारों तक पहुंचाया जा रहा है. मांग के अनुसार बड़ी मात्रा में खीरा बाहर भेजे जाने से किसानों को स्थानीय बाजार के साथ बड़े बाजारों में भी अपनी उपज बेचने का अवसर मिल रहा है.



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