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How DGP Appointed: बिहार के डीजीपी विनय कुमार के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस (VRS) लेने के बाद बिहार का अगला पुलिस कप्तान कौन होगा, इसको लेकर चर्चा जारी है. वर्तमान प्रभारी पुलिस महानिदेशक प्रीता वर्मा के अतिरिक्त इस नाम के लिए बी श्रीनिवासन, जितेंद्र सिंह गंगवार से कुंदन कृष्णन तक के नाम रेस में हैं. अब सबको इंतजार यूपीएससी के पैनल का है जो यह तय करेगा कि बिहार के डीजीपी कौन होंगे. इसी कड़ी में आइए हम जानते हैं कि किसी भी राज्य के डीजीपी का चयन कैसे होता है.
डीजीपी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया जानिए.
किसी भी प्रदेश का पुलिस मुखिया यानी पुलिस महानिदेशक अर्थात डीजीपी कैसे बनते हैं. क्या राज्य सरकार किसी भी आईपीएस अधिकारी को डीजीपी बना सकती है. इसको लेकर प्राय: आम लोगों के मन में सवाल उठते हैं. आम लोगों को यह लगता है कि राज्य सरकार चाहे तो किसी भी आइपीएस अधिकारी को पुलिस महकमे का मुखिया बना सकती है. लेकिन, क्या ऐसा ही होता है और यह संभव भी है क्या? बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 3 जुलाई 2018 को प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के मामले की सुनवाई करते हुए किसी भी प्रदेश में डीजीपी की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं. इसके बाद से इसी गाइडलाइन के आधार पर अब देश के किसी भी राज्य में डीजीपी की नियुक्ति होती है.
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार, राज्य सरकारों को वर्तमान डीजीपी के रिटायर होने से कम से कम 3 महीने पहले पात्र सीनियर आइपीएस अधिकारियों की सूची संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी को भेजनी होगी. इसके बाद यूपीएससी अधिकारियों की सीनियरिटी, सेवा रिकॉर्ड और अनुभव के आधार पर 3 अधिकारियों का पैनल तैयार कर राज्य को भेजेगा. राज्य सरकार यूपीएससी के सुझाए गए इसी पैनल से किसी एक अधिकारी को डीजीपी को नियुक्त करेगी. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से स्पष्ट है कि राज्य सरकार अपनी मर्जी से पैनल के बाहर के किसी अधिकारी को डीजीपी नहीं बना सकती. लेकिन, इसकी एक सुनिश्चित प्रक्रिया है जो हर राज्य सरकार को पालन करना होता है.
2 साल का अनिवार्य कार्यकाल मिलेगा
किसी भी राज्य के डीजीपी को कम से कम 2 साल का निश्चित कार्यकाल मिलेगा. यह नियम इसलिए बनाया गया था, ताकि डीजीपी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर सकें. सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश में कहा गया है कि यदि नियुक्ति के बाद सेवा निवृत्ति की तारीख भी आ जाती है, तब भी उनका कार्यकाल 2 साल पूरा होने तक विस्तारित रहेगा. यानी पुलिस महानिदेशक बनने के बाद अधिकारी को 2 साल तक पद पर बने रहना है, चाहे उनकी रिटायरमेंट की उम्र बीच में ही क्यों न आ जाए. इसका सीधा अर्त यह कि डीजीपी की नियुक्ति के बाद अधिकारी की सेवानिवृत्ति की तारीख आ जाती है, तब भी निर्धारित दो साल का कार्यकाल पूरा होने तक सेवा विस्तार का प्रावधान लागू हो सकता है.
कार्यवाहक DGP नहीं बना सकते
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कार्यवाहक या प्रभारी डीडीपी जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. राज्य सरकारें नियमित प्रक्रिया को टालने के लिए किसी अधिकारी को अस्थायी प्रभार नहीं दे सकती हैं. ऐसे में प्राय: देखा जाता था कि राज्य सरकारें मनपसंद अधिकारी को प्रभारी डीडीपी बनाकर लंबे समय तक चलाती थीं, इस पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह नियम बनाया था. अब हर राज्य को नियमित डीजीपी की नियुक्ति करनी ही होगी. इसका उद्देश्य डीजीपी की नियुक्ति में निर्धारित प्रक्रिया और जवाबदेही बनाए रखना है.
कार्यकाल समाप्त होने से पहले हटाने के नियम
डीडीपी को 2 वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही पद से हटाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 3 स्थितियां बताईं हैं. पहला, गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी बनाए जाने पर. दूसरा, भ्रष्टाचार या गंभीर अनुशासनहीनता के मामलों में दोषी या निलंबित होने पर. तीसरा, शारीरिक या मानसिक रूप से कर्तव्य निभाने में असमर्थ होने पर. इन कारणों के अलावा सरकार 2 साल से पहले डीजीपी को नहीं हटा सकती.