Maharashtra CEO Raises Questions On ECINET: निर्वाचन आयोग में अनबन की आई रिपोर्ट के बाद एक और मामला सामने आया है. बीते सप्ताह आई रिपोर्ट में कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कई फैसले पर अपनी आपत्ति जताई थी. इसके बाद आयोग की तरफ से उनकी चिंताओं को दूर करने की बात कही गई. इस बीच इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने मंगलवार को एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) एस. चोकालिंगम की ओर से आयोग को एक चिट्ठी लिखने की बात कही गई है. इस चिट्ठी में चोकालिंगमन ने वही सवाल उठाए हैं जो मुख्य रूप से दोनों चुनाव आयुक्तों ने उठाए थे. उन्होंने अपने पत्र में ईसीआईनेट को लेकर सवाल उठाया है. इसमें उन्होंने चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट में चार बदलाव करने की सिफारिश की है. ऐसे में उनके पत्र के बाद मीडिया में चुनाव आयोग के भीतर अनबन की रिपोर्ट फिर से चर्चा में आ गई है.
कौन हैं एस. चोकालिंगम
एस. चोकालिंगम महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी हैं. महाराष्ट्र के आधिकारिक मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की वेबसाइट पर उन्हें अतिरिक्त मुख्य सचिव और मुख्य निर्वाचन अधिकारी बताया गया है. वह महाराष्ट्र में मतदाता सूची और चुनाव से जुड़ी पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारी हैं. महाराष्ट्र इस समय विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर चल रहा है. ऐसे में मतदाता सूची से जुड़े काम में राज्य के सीईओ की भूमिका काफी अहम है. चोकालिंगम हाल के महीनों में महाराष्ट्र की एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर लगातार सार्वजनिक रूप से जानकारी भी देते रहे हैं. अब उनकी ओर से चुनाव आयोग को भेजी गई चिट्ठी इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि इसमें वही बुनियादी सवाल उठते दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें दो चुनाव आयुक्त पहले ही दर्ज करा चुके थे.
पत्र में क्या कहा गया
चोकालिंगम ने 24 सितंबर को चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भेजकर ईसीआईनेट में कई बदलाव करने का सुझाव दिया. उनका मूल सवाल यह था कि जिन मामलों में कानून चुनाव पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ को फैसला लेने का अधिकार देता है, वहां सॉफ्टवेयर में भी उसे उस अधिकार का इस्तेमाल करने की सुविधा मिलनी चाहिए.
- पहला मामला सुनवाई का है. नियमों के मुताबिक ईआरओ को यह तय करने का अधिकार है कि किसी मतदाता को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाना जरूरी है या नहीं. चोकालिंगम ने ईसीआईनेट में ऐसा विकल्प देने की मांग की, जिससे अगर मतदाता ने संतोषजनक दस्तावेज दे दिए हैं तो ईआरओ सुनवाई से छूट दे सके. खासकर बुजुर्गों, दिव्यांगों और दूसरे संवेदनशील समूहों को इससे राहत मिल सकती है.
- दूसरा मुद्दा दस्तावेजों का है. आयोग की ओर से बताए गए दस्तावेजों की सूची को चोकालिंगम ने अंतिम सूची नहीं माना. उन्होंने ईसीआईनेट में ‘अन्य दस्तावेज’ का विकल्प देने की बात कही, ताकि ऐसे लोग भी अपनी स्थिति साबित कर सकें जिनके पास सूची में दिए दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं.
- तीसरा सवाल यह है कि कुछ मामलों में अगर ईआरओ को उपलब्ध सबूतों से संतुष्टि हो जाती है तो वह खुद फैसला क्यों न कर सके. चोकालिंगम ने सॉफ्टवेयर में ऐसी सुविधा देने का सुझाव दिया.
- इसके अलावा उन्होंने कुछ मामलों में पुराने एसआईआर के रिकॉर्ड की प्रति अपलोड करने की अनिवार्यता को खत्म करने और ईआरओ के लिए लिखित दिशा-निर्देश तथा अक्सर पूछे जाने वाले सवाल यानी एफएक्यू उपलब्ध कराने की भी मांग की.
यानी इन सुझावों का मूल सवाल एक ही है- कानून ने ईआरओ को जो अधिकार दिया है, क्या ईसीआईनेट उसे वास्तव में इस्तेमाल करने की पूरी सुविधा दे रहा है?
चुनाव आयुक्त डॉ. खुसबीर सिंह संधू और विवेक जोशी. फोटो- ईसीआई
दोनों चुनाव आयुक्तों ने क्या कहा था
यही वह बिंदु है जहां चोकालिंगम की चिट्ठी को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की पहले की आपत्तियों से जोड़कर देखा जा रहा है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने ईआरओ और दूसरे स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका तथा ईसीआईनेट के केंद्रीय नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए थे. संधू ने अगस्त में लिखा था कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी और ईआरओ शिकायत कर रहे हैं कि उनकी जिम्मेदारियां निभाने की क्षमता प्रभावित हो रही है और ईआरओनेट का नियंत्रण महानिदेशक-आईटी स्तर पर केंद्रीकृत हो गया है.
यहां असली विवाद सिर्फ किसी एक सॉफ्टवेयर के विकल्प का नहीं है. मामला यह है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने-हटाने का कानूनी अधिकार किस स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है.
ईसीआईनेट को लेकर क्या है पूरा विवाद
मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी कानून के तहत ईआरओ की होती है. ईआरओ दावे और आपत्तियां सुनता है और तय करता है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं. लेकिन ईसीआईनेट इसी प्रक्रिया को डिजिटल तरीके से चलाने वाला तंत्र है. विवाद यह है कि अगर सॉफ्टवेयर में किसी फैसले का विकल्प ही उपलब्ध नहीं है तो कागज पर मिला अधिकार व्यवहार में कितना इस्तेमाल किया जा सकता है.
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ इसका एक उदाहरण है. इसका मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति मतदाता नहीं है. यह उस समय सामने आने वाली गड़बड़ी है जब ईसीआईनेट किसी मतदाता की जानकारी को पुराने एसआईआर रिकॉर्ड से मिलाते समय कोई अंतर पकड़ता है. मसलन, माता-पिता के नाम में अंतर, उम्र में असामान्य अंतर या पुराने और नए रिकॉर्ड के बीच जानकारी का मेल न होना.
ऐसे मामलों में ईआरओ को नोटिस और दस्तावेजों के आधार पर फैसला करना होता है. लेकिन अगर सॉफ्टवेयर उसे हर मामले में एक जैसी प्रक्रिया अपनाने के लिए बाध्य करता है तो यहीं से अधिकार और तकनीकी व्यवस्था के बीच टकराव का सवाल पैदा होता है.
इसी वजह से महाराष्ट्र के सीईओ की चिट्ठी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. वह सीधे तौर पर आयोग के दो आयुक्तों की तरह प्रशासनिक अनबन का आरोप नहीं लगाते, बल्कि सॉफ्टवेयर में बदलाव की जरूरत बताते हैं. लेकिन उनके सुझाए बदलावों का संबंध उसी मुद्दे से है यानी स्थानीय चुनाव अधिकारियों को अपने कानूनी अधिकार इस्तेमाल करने की कितनी स्वतंत्रता है.
आयोग ने क्या फैसला लिया
चोकालिंगम की चिट्ठी के दो दिन बाद 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने ईसीआईनेट से जुड़े कुछ बदलावों पर फैसला किया. आयोग ने ईआरओ को यह अधिकार देने पर सहमति जताई कि संतोषजनक दस्तावेज मिलने पर कुछ मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट दी जा सकती है. इसके बाद एसआईआर नोटिस प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया और बीएलओ को मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज लेने तथा उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करने की व्यवस्था बताई गई.
आयोग ने यह भी कहा कि पोर्टल में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से मिले सुझावों के आधार पर समय-समय पर बदलाव किए जाते रहे हैं और अगर जमीनी स्तर के अधिकारियों को आगे भी किसी तरह की अतिरिक्त सुविधा की जरूरत होगी तो उसे लागू किया जाएगा.