Ajab Gajab: यहां इंसानों से ज्यादा हिरणों की होती है खातिरदारी, गांव पहुंचते ही साथ खेलेंगे और चना-बाजरा भी खाएंगे

Ajab Gajab: यहां इंसानों से ज्यादा हिरणों की होती है खातिरदारी, गांव पहुंचते ही साथ खेलेंगे और चना-बाजरा भी खाएंगे


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Barmer Deer Village: थार के रेगिस्तान में बसे बाड़मेर के कातरला गांव की पहचान सिर्फ रेत और गर्मी से नहीं, बल्कि हिरणों के साथ इंसानों के अनोखे रिश्ते से भी है. साल 2020 में गांव के युवाओं ने अमृता देवी वन्यजीव संस्थान की शुरुआत की. यहां शिकार, आवारा कुत्तों के हमले, बीमारी या सड़क हादसों में घायल वन्यजीवों को लाकर उपचार दिया जाता है. 125 से ज्यादा हिरण यहां इंसानों के इतने करीब हैं कि उनके हाथ से चना-बाजरा तक खा लेते हैं. यहां हिरणों के अलावा खरगोश, नीलगाय, मोर, कबूतर और कछुओं का भी उपचार किया जाता है. यह जगह वन्यजीव संरक्षण की अनोखी मिसाल बन रही है.

बाड़मेर. थार की तपती रेत, दूर तक फैला मरुस्थल और उसके बीच दौड़ते हिरण… यह दृश्य राजस्थान के रेगिस्तान की पहचान है. लेकिन बाड़मेर के कातरला गांव में हिरणों से रिश्ता सिर्फ उन्हें दूर से देखने तक सीमित नहीं है. यहां हिरणों को वन्यजीव से बढ़कर परिवार का हिस्सा माना जाता है. राजस्थान की धरती पर यूं तो रेगिस्तान, किलों और रंग-बिरंगी संस्कृति की अपनी अलग पहचान है लेकिन इसी धरती पर एक ऐसी जगह भी है जहां पहुंचते ही इंसानों से ज्यादा हिरणों की मौजूदगी आपका ध्यान खींच लेती है. सबसे खास बात यह है कि ये हिरण इंसानों के उछल कूदकर मस्ती करते है.

थार के तपते रेगिस्तान में एक गांव ऐसा भी है, जहां इंसान और हिरण के बीच का रिश्ता शब्दों का मोहताज नहीं है. बाड़मेर के कातरला गांव में अगर कोई हिरण घायल मिल जाए तो ग्रामीण उसे यूं ही जंगल के भरोसे नहीं छोड़ते है बल्कि उसे अपने घर लाते हैं, जख्मों पर मरहम लगाते हैं और तब तक उसकी सेवा करते हैं जब तक वह फिर से दौड़ने लायक न हो जाए. इतना ही बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, जालौर सहित प्रदेशभर से लोग यहां हरिणों के संग मस्ती करने के लिए आते है.

अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में 125 से ज्यादा हिरण हैं

अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर के सेवादार रामजीवन बताते है कि इस यहां हरिण के पास बैठकर उनकी आंखों में आंखे डालकर आप मुस्कुरा सकते है. दुलार को तैयार 125 से अधिक हरिण भी इंसान को देखकर डरते नहीं हैं बल्कि उनके पास आते हैं. यदि आप हरिण को चना-बाजरा देंगे तो आपके हाथ से खाएंगे और फिर उछलकर कमर तक आकर खड़े भी हो जाएंगे. दरअसल साल 2020 में कातरला के युवाओं ने मिलकर अमृता देवी वन्यजीव संस्थान शुरु की थी. शिकार और स्वानों के आतंक से बचाने के साथ घायल, बीमार और दुर्घटना की चपेट में आने वाले हरिणों को यहां लाकर इनका इलाज करते हैं.

जानवर और पक्षी दोनों का होता है यहां इलाज

इतना ही इस वन्यजीव संस्थान में खरगोश, नीलगाय, कबूतर, मोर, कछुए और अन्य का भी इलाज के लिए लाए जाते हैं. कई लोग इन पलों को कैमरे में कैद करते हैं लेकिन असली खूबसूरती उस पल में महसूस होती है जब इंसान कुछ देर के लिए मोबाइल भूलकर प्रकृति को अपनी आंखों से देखता है. सेवादार रामजीवन बताते हैं कि हमारे लिए ये सिर्फ हिरण नहीं हैं ये हमारे परिवार का हिस्सा है. इनके लिए हमारे घर में भी उतनी ही चिंता रहती है जितनी किसी अपने के लिए.



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