257000 सैनिक, अरबों के हथियार, फिर भी हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रही सऊदी अरब की सेना: Saudi Arabia VS Yemen Houthi War

257000 सैनिक, अरबों के हथियार, फिर भी हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रही सऊदी अरब की सेना: Saudi Arabia VS Yemen Houthi War


Saudi Arabia VS Houthi News:  सऊदी अरब के पास अरबों डॉलर के हथियार हैं, आधुनिक लड़ाकू विमान हैं, मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं और अमेरिका समेत पश्चिमी देशों का सैन्य सहयोग भी है. 2 लाख 57 हजार सैनिक हैं, फिर भी यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक दशक से ज्यादा लंबी लड़ाई में वह निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पाया. अब सितंबर में एक बार फिर हूतियों और सऊदी के बीच युद्ध शुरू हो गया है. हूतियों की नई बढ़त ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर इतनी ताकतवर होने के बाद भी सऊदी की सेना लड़ाई में बार-बार क्यों उलझ जाती है.

हथियारों का पहाड़, लेकिन जमीन पर मुश्किल

सऊदी अरब दुनिया के बड़े हथियार खरीदारों में शामिल है. उसके पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम हैं. लेकिन किसी देश के पास महंगे हथियार होना और लंबे गुरिल्ला युद्ध को जीत पाना दो अलग चीजें हैं. यमन में समस्या यही है. हूती लड़ाके खुले मैदान में खड़े होकर सऊदी सेना से कोई सीधी लड़ाई नहीं लड़ते हैं. वे पहाड़ों, गुफाओं और मुश्किल भौगोलिक इलाकों का इस्तेमाल करते हैं. उनके हथियारों और मिसाइल ठिकानों का बड़ा हिस्सा छिपा हुआ हो सकता है. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के मुताबिक, हूतियों ने पहाड़ी इलाकों में हथियार छिपाने और जरूरत के मुताबिक उन्हें बाहर निकालने की क्षमता विकसित की है. यानी सऊदी अरब के पास आसमान पर बढ़त हो सकती है, लेकिन जमीन पर दुश्मन को खोजकर उसके कब्जे वाले इलाके को लंबे समय तक नियंत्रित करना पूरी तरह अलग चुनौती है. इसके अलावा हूतियों के पास सबसे बड़ा हथियार बाब अल मंदेब स्ट्रेट है. यह एशिया को यूरोप से जोड़ने का रास्ता है. अगर हूतियों ने इसे बंद कर दिया तो दुनिया भर के जहाजों को लंबा रूट तय करना होगा.

सिर्फ बम गिराने से हूती नहीं टूटेंगे

सऊदी अरब ने 2015 में यमन के गृहयुद्ध में सैन्य हस्तक्षेप किया था. मकसद था हूतियों को पीछे धकेलना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को मजबूत करना. लेकिन वर्षों के हवाई हमलों के बावजूद हूती खत्म नहीं हुए खत्म नहीं हुआ. यही गुरिल्ला युद्ध में सबसे बड़ी मुसीबत है. किसी मिसाइल लॉन्चर या हथियार के गोदाम को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन पहाड़ों में फैले लड़ाकों के नेटवर्क, स्थानीय समर्थन और उनके कमांड सेंटर को सिर्फ हवाई हमलों से खत्म करना मुश्किल होता है. एक सवाल यह भी आता है कि क्या वह बड़े पैमाने पर अपने सैनिकों को यमन के अंदर भेजकर लंबी जमीनी लड़ाई लड़ना चाहता है? ऐसी लड़ाई में सैनिकों की जान का खतरा रहेगा, भारी खर्च होगा और राजनीतिक कीमत तीनों बढ़ जाते हैं.

हूती कमजोर नहीं और खतरनाक हुए

हूतियों की शुरुआत एक स्थानीय विद्रोही आंदोलन के तौर पर हुई थी, लेकिन पिछले वर्षों में उनकी सैन्य क्षमता काफी बदली है. ईरान से हथियार, टैक्नोलॉजी और सैन्य सहायता मिलने से उनके पास मिसाइल और ड्रोन की क्षमता बढ़ी है. हालांकि ईरान हूतियों को कितनी मदद देता है, इसकी सटीक जानकारी नहीं है. लेकिन हाल के वर्षों में एक बात साफ हो गई है. वह ये कि हूती अब सिर्फ हल्के हथियारों से लड़ने वाला ग्रुप नहीं रहा. उन्होंने लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाकर ये दिखा दिया है कि वह पूरी जियोपॉलिटिक्स को हिला सकते हैं. 2023 के बाद उनके हमलों ने अंतरराष्ट्रीय जहाजों को प्रभावित किया. अमेरिका-ब्रिटेन ने जवाबी हमले किए, इसके बावजूद उनकी क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

हूतियों से यमन में लड़ना कैसे होता है मुश्किल?

यमन की लड़ाई में सऊदी अरब अकेला नहीं था. उसके साथ स्थानीय सरकार और अलग-अलग यमनी गुट थे. लेकिन ये सभी गुट एक-दूसरे के साथ पूरी तरह एकजुट नहीं रहे. यही वह जगह है जहां सऊदी की रणनीति कमजोर होती है. अगर जमीन पर लड़ने वाली स्थानीय ताकतों की कमान बंटी हो, उनके हित अलग-अलग हों और उनके बीच तालमेल कमजोर हो, तो ऊपर से मिले आधुनिक हथियार भी सिर्फ लोहा बनकर रह जाते हैं. हालिया घटनाक्रम में यएक बार फिर यह देखने को मिला. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, हूतियों की बढ़त के दौरान सऊदी के समर्थन वाले यमनी बल रणनीतिक इलाकों से पीछे हटे.

हूती के हमले से ज्यादा नुकसा सऊदी को होगा

सऊदी और हूतियों की लड़ाई का एक दिलचस्प गणित भी है. हूती सस्ते ड्रोन और मिसाइल का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उन्हें रोकने के लिए सऊदी अरब को बेहद महंगे एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल करना पड़ता है. यानी हमला करने वाला कम खर्च करता है और बचाव करने वाले पर ज्यादा खर्च आता है. अगर यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहे तो आर्थिक रूप से ज्यादा ताकतवर देश भी दबाव में आ सकता है.

अमेरिका क्यों नहीं उतरा पूरी तरह?

सऊदी अरब के पास सिर्फ अपने हथियारों का विकल्प नहीं है. अमेरिका लंबे समय से उसका प्रमुख सुरक्षा साझेदार रहा है. लेकिन हाल के दिनों में सऊदी हर बार अमेरिका से सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं करा पाया है. सितंबर 2026 में रिपोर्ट सामने आई कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी थी, लेकिन अमेरिका ने सीधे हमले की मंजूरी नहीं दी. इसके बजाय खुफिया और लक्ष्य संबंधी मदद जारी रखने की बात सामने आई.



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