समुद्र के नीचे दबा था चोलों का फॉरेन मार्केट, 2000 साल पुराने पोर्ट से मिला ऐसा सबूत, खुल गया राज

समुद्र के नीचे दबा था चोलों का फॉरेन मार्केट, 2000 साल पुराने पोर्ट से मिला ऐसा सबूत, खुल गया राज


तमिलनाडु के समुद्र किनारे आज एक सामान्य-सा इलाका दिखाई देता है, लेकिन करीब 2000 साल पहले यही जगह समुद्र के रास्ते होने वाले बड़े कारोबार का केंद्र हुआ करती थी. नाम था पूम्पुहार, जिसे पुराने समय में कावेरीपूम्पट्टिनम कहा जाता था. अब समुद्र के अंदर हुई ताजा खुदाई में एक ऐसा मिट्टी के बर्तन का टुकड़ा मिला है, जिसे वेस्‍ट एश‍िया का टॉरपीडो जार माना जा रहा है. इसके साथ चार पुराने रिंग वेल और 250 से ज्यादा सिरेमिक टुकड़े भी मिले हैं. सवाल है कि आखिर एक विदेशी बर्तन तमिलनाडु के समुद्र तक कैसे पहुंचा? इसका जवाब चोलों के उस पुराने समुद्री कारोबार में छिपा है, जिसकी पहुंच भारत से बहुत दूर तक थी.

पूम्पुहार तमिलनाडु के मौजूदा मयिलादुथुराई जिले में कावेरी नदी के समुद्र में मिलने वाली जगह के पास बसा था. यानी एक तरफ नदी और दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी. पुराने जमाने में व्यापार के लिए इससे बेहतर जगह मुश्किल थी. जैसे आज कोई मंडी ऐसी जगह बनाई जाती है जहां आसपास के गांवों से सामान आसानी से पहुंचे और वहां से ट्रक दूसरे शहरों में चले जाएं, वैसे ही उस समय पूम्पुहार में नदी के रास्ते माल आता और जहाजों से दूर-दूर के इलाकों में जाता था. तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग के मुताबिक यह चोलों के दौर का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और शुरुआती चोल सत्ता का प्रमुख शहर था.

चोलों से इसका कनेक्शन क्या है?

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यही है. पूम्पुहार सिर्फ कोई पुराना शहर नहीं था, बल्कि चोलों की समुद्री ताकत और ट्रेड का सेंटर प्‍वाइंट था. प्राचीन तमिल साहित्य में इसका जिक्र मिलता है. शहर को अलग-अलग हिस्सों में बांटे जाने का भी उल्लेख मिलता है. समुद्र के पास व्यापार और बंदरगाह से जुड़ा इलाका था, जबकि अंदर की तरफ शहर और बाजार थे.

पुरातात्‍व‍िक दस्‍तावेजों से पता चलता है कि यहां भारत के अलग-अलग हिस्सों से व्यापारी आते थे. श्रीलंका से खाने-पीने का सामान, गंगा क्षेत्र से दूसरी वस्तुएं और साउथ-ईस्‍ट एशिया से मसाले पहुंचते थे. यानी पूम्पुहार उस समय की ऐसी जगह थी जहां अलग-अलग देशों और क्षेत्रों का सामान आकर मिलता था.

अब म‍िला सबसे बड़ा सुराग-टॉरपीडो जार

खुदाई में मिला टॉरपीडो जार इसी का ह‍िस्‍सा है. नाम सुनकर आपको मिसाइल जैसा लग सकता है, लेकिन यह हथियार नहीं था. यह एक लंबा, बेलनाकार मिट्टी का बर्तन होता था, जिसका इस्तेमाल समुद्री यात्रा के दौरान तरल सामान रखने के लिए किया जाता था.

ऐसे बर्तनों में शराब, तेल और दूसरे तरल पदार्थ ले जाए जाते थे. इसकी बनावट भी ऐसी थी कि जहाज में इन्हें रखने और समुद्री यात्रा में इस्तेमाल करने में आसानी हो. पूम्पुहार में मिला टुकड़ा वेस्‍ट एश‍िया से जुड़ा माना जा रहा है. यानी हजारों साल पहले पश्चिम एशिया में बना कोई सामान समुद्री रास्ते से तमिलनाडु तक पहुंचा था.

यही टुकड़ा इतना महत्वपूर्ण क्यों?

मान लीजिए आज दिल्ली में किसी दुकान की जमीन खोदते समय दुबई में बनी कोई पुरानी बोतल मिलती है. बोतल अकेले यह साबित नहीं करती कि पूरा शहर दुबई से कारोबार करता था, लेकिन अगर उसी इलाके में दूसरे विदेशी सामान, पुराने गोदाम, बाजार और व्यापार से जुड़े सबूत भी मिलें तो तस्वीर मजबूत हो जाती है.

पूम्पुहार के मामले में भी यही बात है. यहां पहले से विदेशी सिरेमिक, दूसरी जगहों की मिट्टी के बर्तन और समुद्री व्यापार से जुड़े पुरातात्विक सबूत मिलते रहे हैं. अब वेस्‍ट एश‍िया टारपीडो जार का टुकड़ा इस पुराने कनेक्शन को समझने के लिए एक और भौतिक सबूत देता है.

मतलब क्या चोल सीधे वेस्‍ट एश‍िया जाते थे?

जार मिलने का मतलब यह नहीं है कि चोल राजा खुद वेस्‍ट एश‍िया जाकर व्यापार करते थे. इतिहास में ट्रेड नेटवर्क कई पड़ावों से चलता था. एक जहाज एक बंदरगाह तक आता, वहां सामान उतरता, फिर दूसरा व्यापारी या दूसरा जहाज उसे आगे ले जाता.

पुरानी रिसर्च में पूम्पुहार को अरब, रोम और दक्षिण-पूर्व एशिया जाने वाले समुद्री रास्तों से जोड़ा गया है. इंड‍ियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने मरीन आर्कियोलॉज‍िकल स्‍टडीज में यह उल्लेख मिलता है कि तमिल क्षेत्र के बंदरगाहों से जहाज दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब और रोम की दिशा में जाते थे. इसलिए टॉरपीडो जार को एक बड़े समुद्री व्यापार नेटवर्क की कड़ी के तौर पर समझना ज्यादा सही है, न कि अकेले किसी एक देश के साथ सीधे व्यापार का अंतिम प्रमाण.

चोलों का व्यापार कितना बड़ा था?

पूम्पुहार से मिलने वाले सबूत बताते हैं कि यह सिर्फ मछुआरों का छोटा तटीय गांव नहीं था. यहां बाजार थे, सामान का आना-जाना था और बंदरगाह की गतिविधियां थीं. कुछ ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक यहां आने वाले सामान पर चोल क्षेत्र से जुड़े बाघ के निशान की मुहर लगाई जाती थी.

आज जैसे किसी कंपनी के सामान पर ब्रांड या सरकारी जांच की मुहर होती है, वैसे ही उस समय सामान की पहचान और नियंत्रण के लिए प्रतीकों का इस्तेमाल होता था. इसका मतलब यह भी है कि व्यापार केवल सामान लाने-ले जाने तक सीमित नहीं था. उसके पीछे प्रशासन, कर वसूली, बाजार और बंदरगाह व्यवस्था जैसी चीजें भी थीं.

समुद्र में चार कुएं मिले, यही बात और चौंकाती है

अब खुदाई के दूसरे बड़े सबूत पर आइए. शोधकर्ताओं को समुद्र के अंदर चार टेराकोटा रिंग वेल मिले हैं. ये गोल आकार के कुएं होते हैं, जिनमें मिट्टी के गोल छल्लों को एक के ऊपर एक रखकर कुआं बनाया जाता था.

सवाल है कि समुद्र के अंदर कुआं कैसे पहुंच गया?

इसका संभावित जवाब है कि जहां आज समुद्र है, वहां कभी जमीन थी. रिंग वेल आम तौर पर जमीन पर ताजा पानी हासिल करने के लिए बनाए जाते थे. इसलिए समुद्र के नीचे इनकी मौजूदगी यह संकेत दे सकती है कि वहां कभी नदी की पुरानी धारा या बस्ती वाला इलाका था. इसे पुरातत्व की भाषा में पैलियोकैनल यानी पुरानी नदी की धारा कहा जाता है.

तो क्या पूरा शहर समुद्र में डूब गया था?

पूम्पुहार की कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा यही है. आज का पूम्पुहार उस पुराने शहर का पूरा रूप नहीं है. पुरातात्विक खोजों से संकेत मिले हैं कि प्राचीन बस्ती का एक हिस्सा वर्तमान समुद्र तट से आगे तक फैला हुआ था.

शहर के डूबने को लेकर अलग-अलग मत हैं. कुछ अध्ययनों में तटीय कटाव, समुद्र के स्तर में बदलाव और बड़ी बाढ़ जैसे कारणों की बात की गई है. कुछ आर्कियोलॉज‍िकल स्‍टडीज ने तीसरी शताब्दी के आसपास बड़े सुनामी जैसी घटना की संभावना भी जताई है. वहीं कुछ पुराने तमिल साहित्य में शहर के समुद्र में समा जाने की कथा अलग तरीके से बताई गई है. यानी शहर के डूबने की एक ही वजह पर इतिहासकारों की पूरी सहमति नहीं है.

कहानी और विज्ञान में भी फर्क

तमिल साहित्य में पूम्पुहार के समुद्र में समाने की एक प्रसिद्ध कथा मिलती है. इसके मुताबिक राजा ने एक महत्वपूर्ण उत्सव नहीं मनाया और इसके बाद समुद्र ने शहर को निगल लिया. यह साहित्यिक-धार्मिक परंपरा का हिस्सा है.

लेकिन पुरातत्व इससे अलग सवाल पूछता है. वैज्ञानिकों को जमीन की परतें, मिट्टी, समुद्र का स्तर, पुराने नदी मार्ग, इमारतों और बर्तनों के अवशेष देखने होते हैं. इसलिए आज की खुदाई का उद्देश्य यह पता लगाना है कि शहर वास्तव में कितना बड़ा था, समुद्र के अंदर कितना हिस्सा गया और वहां व्यापार कैसे चलता था.

अभी सिर्फ 10 फीसदी समुद्री इलाका खोजा गया

यह जानकारी इस खोज को और दिलचस्प बनाती है. तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के अधिकारी के मुताबिक अभी समुद्र के अंदर प्रस्तावित इलाके का करीब 10 फीसदी हिस्सा ही खोजा गया है. सितंबर 2026 में हुई तीसरी चरण की खोज करीब 18 दिन चली और इसमें लगभग दो वर्ग किलोमीटर के समुद्री क्षेत्र में काम किया गया. इसके बाद विभाग ने आगे भी खोज जारी रखने की योजना बताई है.

इसका मतलब यह है कि अभी जो मिला है, वह पूरी कहानी नहीं है. आगे और बर्तन, इमारतों के हिस्से, जहाजों के अवशेष या व्यापार से जुड़े दूसरे सामान मिल सकते हैं. लेकिन हर नई वस्तु को उसके संदर्भ के साथ जांचना जरूरी होगा.

पूम्पुहार में आज जिस समुद्र के नीचे मिट्टी और पानी दिखाई देता है, वहां कभी चहल-पहल वाला शहर था. वहां बाजार था, कुएं थे, सामान रखने की जगहें थीं और बंदरगाह था. कावेरी नदी के रास्ते सामान यहां पहुंचता था और समुद्री जहाज उसे दूर-दूर तक ले जाते थे.

वेस्‍ट एश‍िया का टॉरपीडो जार यह दिखाता है कि पूम्पुहार केवल स्थानीय बाजार नहीं था. वहां पहुंचने वाला माल ऐसे समुद्री नेटवर्क का हिस्सा था जो भारत को वेस्‍ट एश‍िया, भूमध्यसागरीय दुनिया और साउथ-ईस्‍ट एशिया जैसे दूर के क्षेत्रों से जोड़ता था.

चोलों की कहानी सिर्फ तलवार और मंदिरों की नहीं थी

चोलों का नाम आते ही अक्सर बड़े मंदिर, राजा और युद्ध याद आते हैं. लेकिन पूम्पुहार की खुदाई चोल इतिहास का एक दूसरा चेहरा दिखाती है व्यापार, जहाज, बंदरगाह और समुद्री संपर्क.

यही इस खोज की सबसे बड़ी बात है. समुद्र के अंदर मिला एक छोटा-सा मिट्टी का टुकड़ा हजारों साल पुरानी अर्थव्यवस्था की कहानी खोल सकता है. चार रिंग वेल बताते हैं कि वहां कभी जमीन और बस्ती थी. सैकड़ों सिरेमिक टुकड़े लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और व्यापार की तरफ इशारा करते हैं. और वेस्‍ट एश‍ियन टॉरपीडो जार बताता है कि इस बंदरगाह की कहानी स्थानीय सीमा से कहीं आगे जाती थी.



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