जिस शेरशाह ने ग्रैंड ट्रंक रोड बनाया, रुपया चलाया, मुगलों को हराया, आज उसी के मकबरे की ईंटें झड़ रही हैं. हाल में ही सासाराम में शेरशाह सूरी के मकबरे से पत्थर गिरने की खबर आई है. साफ है कि सासाराम में शेरशाह सूरी का मकबरा दरक रहा है. याद दिलाता है कि समय के साथ मजबूत से मजबूत इमारतें भी कमजोर पड़ सकती हैं, और वक्त की यही ताकत इतिहास की निशानियों में भी दिखाई देती है.
बिहार के सासाराम में शेरशाह सूरी के मकबरे के गुंबद से 9 अगस्त 2026 को पत्थर टूटकर गिरने की खबर है.
इसी कड़ी में एक और तस्वीर भारतीय क्रिकेट जगत से भी सामने आई. पूर्व क्रिकेटर विनोद कांबली का एक वीडियो चर्चा में आया, जिसमें वे एक वृद्धाश्रम में दिखाई दिए और उनकी आवाज में कुछ लड़खड़ाहट और भावुकता भी सुनाई दी. ये वही विनोद कांबली हैं जिनके दोहरे शतक पर पूरा स्टेडियम झूमता था और देश आनंद में डूब जाता था. कभी मैदान पर अपनी बल्लेबाजी से सुर्खियां बटोरने वाले कांबली भी वक्त के साथ बदलती परिस्थितियों की याद दिलाते हैं.
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व बल्लेबाज विनोद कांबली वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं.
क्लासरूम में खड़े हैं रामकृपाल, बैठे हैं सम्राट
और अब तीसरी तस्वीर बिहार की राजनीति से है… शनिवार 26 सितंबर 2026 को सामने आई इस तस्वीर में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एक सरकारी स्कूल की कक्षा में आयोजित अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी में मौजूद हैं. ब्लैकबोर्ड पर “अभिभावक शिक्षक संगोष्ठी” और “निपुण पथ: पढ़ना, लिखना और गिनना” लिखा है. मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठकर माइक से बोल रहे हैं. उनके पास शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी और कुछ शिक्षिकाएं बैठी दिखाई दे रहीं हैं, जबकि कैबिनेट सहयोगी रामकृपाल यादव उनके बगल में हाथ बांधे खड़े हैं.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बाटागंज दानापुर के राजकीय मध्य विद्यालय में आयोजित अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी-2026 में सम्मिलित होकर संवाद किया.
रामकृपाल यादव का राजनीतिक सफर
रामकृपाल यादव का राजनीतिक सफर कई दौर से गुजरा है. पटना के मेयर से लेकर राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के करीबी नेताओं में उनकी पहचान रही. वे आरजेडी से तीन बार सांसद बने. 2014 में पार्टी छोड़कर भाजपा में आए और पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से मीसा भारती को हराया. इसके बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में 2014 से 2019 तक ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रहे. 2019 में भी लोकसभा चुनाव जीता, लेकिन 2024 में मीसा भारती से हार गए. 2025 में दानापुर से विधायक बने और अब सम्राट चौधरी सरकार में सहकारिता मंत्री हैं.
उम्र का अंतर, अनुभवों का अलग दौर
उम्र और राजनीतिक अनुभव की दृष्टि से भी दोनों नेताओं की पृष्ठभूमि अलग है. रामकृपाल यादव का जन्म 12 अक्टूबर 1957 को हुआ, जबकि सम्राट चौधरी का जन्म 1968 में बताया जाता है. इस हिसाब से रामकृपाल यादव उम्र में करीब दस साल बड़े हैं. दूसरी ओर, सम्राट चौधरी बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और नीतीश कुमार की सरकार में उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं. बीते 15 अप्रैल 2026 को वे बिहार के मुख्यमंत्री बने. यानी दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा और मौजूदा भूमिकाएं अलग-अलग दौर और अनुभवों से बनी हैं.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अगले वर्ष से सभी सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य करने की दिशा में संबंधित अधिकारियों को योजना बनाने के निर्देश दिए.
कुर्सी, व्यवस्था और प्रोटोकॉल का सवाल
तस्वीर में मुख्यमंत्री के पास कुर्सियों पर कुछ लोग बैठे दिखाई देते हैं, जबकि रामकृपाल यादव खड़े हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह कार्यक्रम की व्यवस्था और प्रोटोकॉल का हिस्सा था, या फिर यहां व्यक्तिगत शिष्टाचार की भी कोई गुंजाइश थी? तस्वीर में दिख रहे दृश्य से इतना तो कहा जा सकता है कि बैठने की व्यवस्था अलग-अलग थी, लेकिन इसके पीछे की वजह स्पष्ट नहीं है. यहां दिख रहा है कि रामकृपाल यादव सीएम के सामने हाथ बाधे खड़े रहे.
वरिष्ठता और सम्मान की परंपरा का सवाल
‘कौन बैठे और कौन खड़े रहे’- सवाल सिर्फ इतना नहीं है. यह तस्वीर राजनीतिक जीवन में पद, वरिष्ठता और बदलती परिस्थितियों के बीच संबंध पर भी सोचने का मौका देती है. भारतीय सामाजिक व्यवहार में वरिष्ठों को बैठने की जगह देना सम्मान का एक सामान्य संकेत माना जाता है. ऐसे में, खासकर विद्यालय जैसे सार्वजनिक स्थान पर, प्रोटोकॉल के साथ व्यक्तिगत शिष्टाचार की भूमिका पर चर्चा स्वाभाविक है. सवाल यह कि प्रोटोकॉल के हिसाब से अगर दो कुर्सियां और थीं तो क्या तीसरी कुर्सी मंगाई जा सकती थी?
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी-2026 में माह के प्रेरक अभिभावक के लिए प्रशंसा पत्र दिए.
क्या साबित नहीं होता? यह भी जानिए
हालांकि, तस्वीर से यह पता नहीं चलता कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने रामकृपाल यादव को बैठने के लिए कुर्सी की पेशकश की थी या नहीं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि रामकृपाल यादव ने स्वयं बैठने से मना किया था या कार्यक्रम की व्यवस्था ही ऐसी थी. इसलिए इस दृश्य को अपमान या जानबूझकर की गई उपेक्षा कहना उचित नहीं होगा. लेकिन तस्वीर सवाल जरूर उठाती है कि औपचारिक प्रोटोकॉल के बीच व्यक्तिगत शिष्टाचार की जगह कितनी है?
पद की गरिमा और व्यक्ति का सम्मान
राजनीति में पद बदलते हैं, सत्ता के केंद्र बदलते हैं और नेताओं की भूमिकाएं भी बदलती रहती हैं. आज कोई मंत्री है, तो कल विपक्ष में हो सकता है. लेकिन सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक योगदान करने वाले नेताओं का अनुभव और योगदान भी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा होता है. पद की गरिमा बनाए रखते हुए व्यक्तिगत सम्मान दिखाना दोनों को साथ लेकर चलने का तरीका हो सकता है.
इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बगल में बैठे दिख रहे हैं मंत्री रामकृपाल यादव और मिथिलेश तिवारी.
मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी का उदाहरण
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के संबंधों का जिक्र करते हुए बताया था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी डॉ. सिंह अपनी कैबिनेट के वरिष्ठ सहयोगी प्रणब मुखर्जी के प्रति निजी तौर पर संजीदा और गरिमापूर्ण व्यवहार रखते थे. इस उदाहरण का महत्व यही है कि पद की औपचारिकता और निजी सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. बिहार की इस तस्वीर में शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी भी बैठे दिखाई देते हैं, जो रामकृपाल यादव जी के समकक्ष और राजनीति में अपेक्षाकृत काफी नये हैं. यहां इस उदाहरण का महत्व यही है कि पद की औपचारिकता और निजी सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते.
रामकृपाल यादव का अंदाज भी एक मैसेज है…
शेरशाह सूरी का मकबरा हो, विनोद कांबली का वीडियो या बिहार की राजनीति की यह तस्वीर- तीनों अपने-अपने संदर्भ में वक्त के असर की याद दिलाते हैं. रामकृपाल यादव और सम्राट चौधरी की तस्वीर का अर्थ क्या है, यह तय करने से पहले उसकी पूरी परिस्थिति जानना जरूरी है. लेकिन यह दृश्य एक सवाल जरूर छोड़ता है- राजनीति में पद की गरिमा के साथ व्यक्ति के सम्मान और शिष्टाचार की जगह कितनी होनी चाहिए? क्योंकि वक्त के साथ पद और समीकरण बदलते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में व्यवहार की छाप भी रह जाती है. रामकृपाल यादव और सम्राट चौधरी की तस्वीर को भी इसी कसौटी पर देखने का अवसर है.