कोडरमा: झुमरी तिलैया शहर के गांधी स्कूल रोड में सड़क किनारे स्थित रामेश्वर शनि देव पवन पुत्र मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. खासकर शनिवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. सरसों और तिल के तेल से जलाए गए दीपकों से पूरा मंदिर परिसर जगमगा उठता है. शनिवार को यहां का नजारा ऐसा दिखाई देता है, मानो मंदिर परिसर में दीपावली मनाई जा रही हो.
इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी कहानी भी काफी खास है. चंदन कुमार वर्णवाल ने बताया कि वर्ष 2011 में उन्होंने अपनी माता द्रौपदी देवी के साथ मंदिर की आधारशिला रखी थी. मंदिर निर्माण में उनके भाइयों और परिवार के अन्य सदस्यों का भी भरपूर सहयोग रहा. उन्होंने बताया कि जिस स्थान पर आज मंदिर स्थापित है. वहां पहले एक पीपल का पेड़ हुआ करता था. इसी स्थान पर बाद में मंदिर का निर्माण कराया गया.
शनिवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
कम समय में ही यह मंदिर शहर और जिले के लोगों के बीच आस्था का केंद्र बन गया. शनिवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. लोग शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करने के साथ तेल के दीपक भी जलाते हैं. मंदिर परिसर में एक साथ जलते सैकड़ों दीप श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहते हैं.
इस मंदिर के पुजारी हरीश कुमार भार्गव ने बताया कि श्रद्धालु अपनी पीड़ा और कष्टों से निवारण की कामना के साथ शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाते हैं. उन्होंने बताया कि शनिदेव किसी का बुरा नहीं करते. लोग शनिदेव से डरते हैं, लेकिन उन्हें शत्रु नहीं, बल्कि मित्र के रूप में देखना चाहिए. शनिदेव व्यक्ति को संघर्ष के बीच जीवन जीने की सीख देते हैं. वे न्यायप्रिय देवता माने जाते हैं और कर्म के अनुसार फल देने के कारण उन्हें कर्मफल दाता भी कहा जाता है.
मन्नत पूरी होने पर लोग चढ़ाते हैं नारियल
उन्होंने बताया कि मंदिर में लोग अपनी मनोकामना लेकर भी पहुंचते हैं. श्रद्धालु लाल चुनरी में नारियल बांधकर उसे काले धागे से मंदिर परिसर में बांधते हैं. मान्यता के अनुसार मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु नारियल की गांठ खोलकर उसका हवन-पूजन कराते हैं. पुजारी ने बताया कि संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले कई दंपती भी मंदिर पहुंचते हैं और मन्नत मांगते हैं. मनोकामना पूरी होने के बाद वे मंदिर में बंधे नारियल को खोलकर हवन-पूजन कराते हैं.
तीन पीढ़ियों से शनिदेव की सेवा
हरीश कुमार भार्गव ने बताया कि उनका परिवार मूल रूप से राजस्थान का रहने वाला है, किन उनकी तीन पीढ़ियां कोडरमा में रह रही है. उनके दादा सुखदेव भार्गव राजस्थान से कोडरमा आकर बसे थे. इसके बाद उनके पिता पूषाराम भार्गव ने भी यहां शनिदेव की पूजा की. स्थानीय लोग उन्हें शनि बाबा के नाम से जानते थे. उन्होंने बताया कि उनके दादा और पिता लंबे समय तक राजगढ़िया रोड स्थित खुले स्थान पर शनिदेव की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करते थे. यहां वर्ष 1980 में प्रतिमा स्थापित की गई थी.
शनिवार को खीर का चढ़ता है महामहाप्रसाद
मंदिर में शनिवार को महामहाप्रसाद के रूप में खीर का भोग लगाया जाता है. अन्य दिनों में श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया जाता है. उन्होंने बताया कि करीब 50 किलो खीर तैयार करने के लिए श्रद्धालुओं से लगभग 5 हजार रुपये सहयोग राशि ली जाती है. मंदिर परिसर में ही खीर बनाने की सुविधा उपलब्ध है. इसके अलावा मंदिर में लोगों की कुंडली तैयार करने और शनिदेव से जुड़े पूजा-अनुष्ठान भी कराए जाते हैं.